Monthly archive

July 2008

चैनल से भिड़ने के मूड में आ ही गई बीजेपी

अपन ने पिछले दो दिन सीएनएन-आईबीएन पर लिखा। सीएनएन-आईबीएन ने सांसदों की खरीद-फरोख्त का स्टिंग आपरेशन किया। पर दिखाया नहीं। अपन ने तीस जुलाई को बताया था- 'चैनल दगा दे गया। अब तीनों सांसदों का चैनल दफ्तर के बाहर धरने का इरादा।' अपना अंदाज सौ फीसदी सही निकला। अभी धरने का ऐलान तो नहीं हुआ। पर बीजेपी चैनल से दो-दो हाथ करने पर आमादा। गुरुवार को बीजेपी ने चैनल के बायकाट का ऐलान कर दिया।

बमों के तार कहीं दाऊद इब्राहिम से तो नहीं जुड़े

गुजरात में बमों का मिलना अभी जारी। बुधवार रात तक सूरत में सत्ताईस बम मिल चुके। हैरानी की बात। अहमदाबाद के सभी बम फट गए। सूरत का एक भी नहीं फटा। बुधवार को अपने नरेंद्र भाई मोदी सूरत पहुंचे। वह लबेश्वर चौक गए। जहां मंगलवार को अच्छे-खासे बम मिले। मोदी बड़ोदा प्रेसटीज मार्किट से सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे। जहां बुधवार को भी बम मिला। अपन गुजरात में आतंकवाद की जड़ में जाएं। उससे पहले जरा सांसदों की खरीद-फरोख्त का आतंकवाद देख लें।

आतंकियों को अपनी सी लगती है यूपीए सरकार

अपन ने कल सुषमा की आतंकी थ्योरी बताई थी। जिसमें उनने केंद्र सरकार को घसीटा था। सद्दाम हुसैन ने अपनी कुर्सी के लिए हजारों कुर्दो को मरवाया था। अपनी यूपीए सरकार सद्दाम हुसैन के रास्ते पर तो नहीं चलेगी। सो सुषमा की बात किसी के गले नहीं उतरी। एनडीए के बाकी दलों के गले भी नहीं उतरी। गले उतरने वाली बात ही नहीं थी।  सुषमा ने आतंकवाद को सांसदों की खरीद-फरोख्त से जोड़ा। बोली- 'विस्फोट लोकसभा में विश्वासमत के फौरन बाद हुए। विश्वासमत में सरकार खरीद-फरोख्त से नंगी हुई।

संसद के बाद भारत की जम्हूरियत पर हमला

एनडीए-यूपीए में अब दोहरी जंग। पहली जंग कैश फॉर वोट के मोर्चे पर। दूसरी जंग आतंकवाद के मोर्चे पर। अपन दो दिन की छुट्टी पर गए। इसी बीच बंगलुरु-अहमदाबाद में बम धमाके हो गए। अब आतंकवाद पर कांग्रेस-बीजेपी में छीछालेदर। अपन छीछालेदर की बात बाद में करेंगे। पहले बात कैश फॉर वोट के मोर्चे पर यूपीए-एनडीए जंग की। अपने दिग्गी राजा ने आरोप लगाया था- 'एक करोड़ रुपया इंदौर के बैंक से निकाला गया। सीएम शिवराज की पत्नी के पार्टनर के खाते से पैसा निकला।

एटमी करार पर सहमति नहीं है विश्वासमत

यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि भारत के संसद में एटमी करार पर सहमति दे दी है। यूपीए लोकसभा के विश्वासमत को एटमी करार पर सहमति बताकर प्रचारित कर रहा है। यह संसद के साथ धोखे के सिवा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी संसद के अंदर और बाहर कई बार कह चुके हैं कि विदेशों के साथ होने वाले करारों को संसद की मंजूरी का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। इन दोनों नेताओं ने वामपंथी दलों के साथ चली नौ महीने की बातचीत में भी यही तर्क पेश किया था।

तीसरे मोर्चे की हवा का निकलना

मायावती विश्वास मत के बाद खुद के प्रधानमंत्री बनने या कम से कम तीसरे मोर्चे की नेता के तौर पर स्थापित होने का ख्वाब देख रही थीं, लेकिन विश्वास मत में पिटने के बाद तीसरे मोर्चे का गठन ही खटाई में पड़ गया है।

हर बार की तरह इस बार भी तीसरे मोर्चे में पार्टियां और नेता ज्यादा हैं, जमीनी आधार और कार्यकर्ता कम हैं। मनमोहन सरकार विश्वास मत में हार जाती तो उसका श्रेय इसी तीसरे मोर्चे को मिलता जो लोकसभा में मात खाने के बाद फिलहाल बनते-बनते रुक गया है। तीसरे मोर्चे के नेताओं ने मनमोहन सरकार गिराने के लिए भारतीय जनता पार्टी की मदद लेने में कोई गुरेज नहीं किया, लेकिन अब सरकार नहीं गिरी तो उस पर गुर्राने में भी कोई वक्त नहीं लगाया।

काली भेड़ें बर्खास्त हुई तो सरकार फिर अल्पमत में

विपक्ष ने अपनी काली भेड़ों की पहचान कर ली। आठ काली भेड़ें बीजेपी की निकली। सोमाभाई पटेल-बृजभूषण का तो बीजेपी को पहले से पता था। कबूतरबाजी वाले बाबूभाई कटारा पहले से सस्पेंड थे। बीजेपी वोट के लिए सस्पेंशन खत्म करने को तैयार हुई। तब तक कबूतर उड़ चुका था। सो काली भेड़ बने काले कबूतर ने साफ कह दिया- 'मैं तो यूपीए को वोट दूंगा।' अपनी याददाश्त इतनी कमजोर भी नहीं।

सरकार बची, साख गई, खुली खरीद-फरोख्त की पोल

अपन ने बीस जुलाई को लिखा था- 'सरकार बची तो बीजेपी के कारण ही बचेगी।' आखिर वही हुआ। बीजेपी के 127 वोट पड़ने थे। वाजपेयी समेत चारों बीमार स्टेचर पर आए। पर बीजेपी खेमे से वोट पड़े 121 ही। तीन और यूपीए के खेमे में चले गए। एक आकर एबस्टेन कर गया। दो ठीक वोटिंग के समय गायब हो गये। अपन की लिस्ट 268-268 की थी। पर यूपीए को मिले 275 वोट। विपक्ष में पड़े 256 वोट।

बसपा-भाजपा-लेफ्ट में गिनती के लिए तार जुड़े

दोनों खेमों ने किया बहुमत का दावा, असल में दोनों 268-268 पर

नई दिल्ली, 21 जुलाई। बसपा प्रमुख मायावती के खास सिपहसालार सतीश मिश्र ने आज वामपंथी और भाजपा नेताओं से मुलाकात कर स्थिति का आकलन किया। बाद में इस संवाददाता से बातचीत करते हुए सतीश मिश्र ने इन अफवाहों को मनघढ़ंत बताया कि भाजपा सरकार गिराने में गंभीर नहीं है। मायावती के प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट होने से भाजपा में खलबली को भी बसपा नेता ने कांग्रेस और मीडिया की उड़ाई हुई अफवाह बताकर खारिज किया।

बागियों का खुलासा आज रात को होगा

संसद के सेंट्रल हाल में बरसों बाद इतना रश देखा। सांसदों की भीड़ का असर कंटीन पर भी पड़ा। दूध से बने खाने-पीने वाले सामानों वाले काउंटर पर भी। दूध के बने खाने-पीने वाले काउंटर की बात चली। तो अपन आपकी जानकारी के लिए बता दें- सेंट्रल हाल से पुरानी लाइब्रेरी में घुसने वाले रास्ते में दो काउंटर। एक तरफ चाय का काउंटर। तो दूसरी तरफ उसके सामने दूध-दही-घी से बनी चीजों का काउंटर।  अंग्रेजों के जमाने में जब संसद बनी। तो यहां बियर बार हुआ करता था। अंग्रेज चले गए।

देशभक्ति नहीं होगा हार-जीत का पैमाना

मनमोहन सिंह को पहले ही पता था कि लोकसभा में उनकी सरकार के भाग्य का फैसला एटमी करार से देश को नफे-नुकसान के आधार पर नहीं होगा, अलबत्ता जोड़तोड़ और नए गठबंधन ही सरकार के भाग्य का फैसला करेंगे।

लोकसभा में मनमोहन सरकार के भाग्य का फैसला करते समय सांसद जब वोट डालेंगे, तो देशभक्ति पैमाना नहीं होगा। वैसे एटमी करार पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही देशभक्ति की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन दस फीसदी सांसदों ने भी गहराई में जाकर करार को समझने की कोशिश नहीं की। संभवत: दोनों पक्षों के पचास के करीब सांसद ही ऐसे निकलेंगे, जिन्होंने भारत-अमेरिका एटमी करार से जुड़े 1954 के अमेर

सत्ता संतुलन अब बागियों के हाथ में

नई दिल्ली, 20 जुलाई। सत्ता संतुलन अब देवगौड़ा, अजित सिंह और शिबू सोरेन के हाथ से निकलकर बागियों और पूर्वोत्तर के सांसदों के हाथ में आ गया है। बगावत अब सभी पार्टियों में शुरू हो गई। कांग्रेस के कुलदीप विश्नोई और अरविंद शर्मा के विपक्षी खेमे में जाने के बाद अब भाजपा और जनता दल के दो-दो सांसद टूटकर यूपीए में चले गए हैं। भाजपा के गुजरात से सोमाभाई पटेल और उत्तर प्रदेश से बृजभूषण सरन सिंह टूटे हैं, तो जद यू के रामस्वरूप प्रसाद और कोया ने यूपीए को वोट का ऐलान किया है।

पोलित ब्यूरो करेगा दादा का फैसला

राष्ट्रपति के चुनाव में यूपीए से वोट तो नहीं मिले। एनडीए के अपने ही टूट गए थे। अपन को अबके विश्वासमत पर भी वैसा होने की आशंका। इसीलिए अपन ने इतवार को लिखा- 'सरकार बची तो बीजेपी के कारण ही बचेगी।' हू-ब-हू वही होता दिखने लगा। इतवार को ही बीजेपी के दो सांसद टूट गए। दो जनता दल यू के भी टूट गए। एक शिवसेना का भी टूट गया। अपन इस बहस में नहीं जाते- बीजेपी का सोमाभाई सस्पेंड था। बीजेपी का दूसरा बृजसरन दागी था। बीजेपी से दो ही घटते। तो गनीमत था। धर्मेन्द्र और कांतप्पा बिस्तर पर। दोनों के आने की अब बीजेपी को उम्मीद नहीं। पर बीजेपी को ममता बनर्जी के आने की उम्मीद। पर बात एनडीए से टूटने वालों की। जनता दल य

पल-पल बदलता मनमोहन का चेहरा

नई दिल्ली, 19 जुलाई। मनमोहन सिंह का चेहरा पल-पल बदल रहा है। शिबू सोरेन और अजित सिंह खेमों से आई खबर चेहरे पर संतोष का भाव ला देती है, तो मुलायम के खेमे में मची भगदड़ मनमोहन के चेहरे की रौनक घटा देती है। शनिवार शाम होते-होते दोनों ओर 268-268 सांसद साफ दिखाई दे रहे थे, अब सबकी निगाह बाकी बचे छह सांसदों पर टिकी है। लेकिन कर्नाटक, गुजरात और बिहार के कांग्रेसी सांसदों में भाजपा की सेंध और सपा खेमे में मायावती की सेंध ने यूपीए में भगदड़ मचा रखी है।

सरकार बची, तो बीजेपी के कारण ही बचेगी

अपन शिबू सोरेन के पांचों सांसद यूपीए में मानें। अजित के तीनों सांसद भी यूपीए में मानें। विसमुत्थारी, थुप्सत्न चेवांग, मणिचेरनामई को भी गिन लें। तो भी फिलहाल दोनों खेमों में 268-268 पर बराबरी के हालात। अब सिर्फ देवगौड़ा, अब्दुल्ला, ममता, दयानिधि का फैसला होना बाकी। देवगौड़ा भले ही शनिवार को मनमोहन से मिले। पर देवगौड़ा यूपीए के साथ जाएंगे। यह कोई ताल ठोककर नहीं कह सकता। अगर देवगौड़ा गए भी। तो अकेले ही जाएंगे।

कांग्रेस के सांसद खिसके तो सरकार में मचा हड़कंप

समाजवादी पार्टी की मीटिंग में आधे एमपी भी नहीं आए। मुलायम-अमर का चेहरा उतर गया। दोनों ने जामा मस्जिद जाकर सफाई दी। मुनव्वर हसन ने ऐलान किया- 'एटमी करार मुस्लिम विरोधी। मैं व्हिप का उल्लंघन कर सरकार के खिलाफ वोट दूंगा। फिर बीएसपी में शामिल होऊंगा।' कांग्रेस भी मुस्लिम विरोध से बेहद डरी हुई दिखी। शुक्रवार को सफाई जारी की। जिसमें अमेरिका के मुस्लिम विरोध को नकारने की कोशिश हुई। कहा गया- 'मुस्लिम देशों की गल्फ कारपोरेशन काउंसिल का अमेरिका से नजदीकी रिश्ता। काउंसिल ने भारत-अमेरिका रिश्तों को नया आयाम माना है।

मौसम-ए- खरीद फरोख्त में स्पीकर की अहम भूमिका

अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास मत के समय मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग जब वोट दे रहे थे, तो स्पीकर बालयोगी ने फैसला उनकी अंतरात्मा पर छोड़ दिया था। सरकार एक मत से गिर गई थी। अब हत्या के आरोप में उम्रकैद भुगत रहे चार सांसदों के वोट पर भी स्पीकर को फैसला करना होगा।

देश के हर हिस्से के सांसदों ने अपने भाव बढ़ा लिए हैं। जैसे आमों-संतरों का मौसम आता है, वैसे ही सांसदों की खरीद-फरोख्त का मौसम चल रहा है। मनमोहन सिंह को अपनी सरकार बचाने के लिए दर्जनभर सांसद चाहिए। अमर सिंह ने उन्हें इस काम में अपनी सेवाएं मुहैया करवा दी हैं और अनिल अंबानी को उनकी सेवा में हाजिर कर दिया है।

अब फिर वही शिबू सोरेन फिर वही कांग्रेसी सरकार

इम्तिहान की घड़ी में फिर वही 1993 जैसा हाल। तब शिबू सोरेन की पार्टी में चार सांसद थे। अब पांच सांसद। नरसिंह राव ने चारों से सौदा किया था। अजित सिंह के अब तीन सांसद। तब सात सांसद थे। राव के मैनेजरों ने सातों को दाना डाला। पर तीन-चार ही पटे। अब फिर वही शिबू सोरेन, वही अजित सिंह। यों 1989 के बाद कभी किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। सो सरकार की नब्ज छोटी-छोटी पार्टियों के हाथ में।

बहुत खतरनाक होता है विश्वास मत तो

दादा की चिट्ठी ने तो बवाल खड़ा कर दिया। चिट्ठी कैसे लीक हुई। अब इसकी जांच होगी। चिट्ठी तो पढ़ने के बाद फटनी थी। विस्फोटक चिट्ठी से दादा कटघरे में खड़े हो गए। चिट्ठी में दादा ने बीजेपी के साथ वोट पर ऐतराज किया। दादा जब स्पीकर पद को निष्पक्ष बता रहे थे। तभी बीजेपी से अपनी एलर्जी भी जाहिर कर गए। कांग्रेस भले दादा के कदम पर फूली न समाए। जयंती नटराजन बोली- 'सोमनाथ चटर्जी का अब किसी पार्टी से कोई सरोकार नहीं है।' इतना बताना जरूरी- दादा की बोलपुर सीट अबके रिजर्व हो गई। खैर बात दादा की चिट्ठी की।

चोर की मूछ में तिनका

मनमोहन सिंह की धुकधुकी बंध गई होगी। अकाली दल पर आस लगाए बैठे थे। अकाल तख्त तक को अपरोच किया गया। आडवाणी को भनक लगी। तो वह प्रकाश सिंह बादल से फुनियाए। बादल बोले- 'आप फिक्र न करो जी।' मंगलवार को बादल ने शक-शुबा दूर कर दिया। उनने साफ कहा- 'अकाली दल की कांग्रेस के खिलाफ क्लियरकट पॉलिसी। हमने फैसला किया है- सरकार का समर्थन नहीं करेंगे।' वह बोले- 'मनमोहन सिंह भले आदमी। पर गलत पार्टी में हैं।' कभी यह जुमला कांग्रेसी वाजपेयी के लिए इस्तेमाल करते थे।

हार-जीत सिर्फ इन चौदह सांसदों की मुट्ठी में ही

मनमोहन की किस्मत अगले मंगलवार तय होगी। मंगल और शनि का मिलन कैसा रहेगा। ज्योतिषियों ने भी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए। आधे ज्योतिषी ठीक निकलेंगे। आधे गलत साबित होंगे। जमा-घटाओ ही तेज नहीं हुआ। अब अफवाहों का बाजार भी तेज। सोमवार की अफवाहें सुनिए। बीजेपी के तीन सांसद एबस्टेन करेंगे। यानी तटस्थ रहेंगे। गैर हाजिर भी रह सकते हैं। आठों अकाली भी एबस्टेन रहेंगे। ममता बनर्जी भी बीच का रास्ता अपनाएंगी। भाषण देकर वाकआउट करेंगी। वोट के समय गायब हो जाएंगी। एबस्टेन करेंगी, वगैरह-वगैरह। पर असली खबरें- सरकारी कैंप से पांच सांसद खिसक चुके।

कैसे-कैसे लोग करेंगे करार का फैसला

लोकसभा, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने  वालों और वोटरों के लिए अलग-अलग मापदंड तय होने चाहिए। संसद का चुनाव लड़ने का हक राष्ट्रीय दलों को हो, लोकसभा में मतदान का हक भी सिर्फ स्नातकों को हो।

अब जबकि हफ्तेभर में लोकसभा मनमोहन सरकार का भविष्य तय करेगी, तो फैसला उन मुट्ठीभर निर्दलीयों और क्षेत्रीय दलों के सांसदों पर निर्भर होगा, जिनका विचारधारा या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। सरकार को संसद का जनादेश अमेरिका से एटमी करार पर  लेना है, लेकिन जब सरकार के भविष्य का फैसला होगा, तो यह मुद्दा छोटे-छोटे व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों में दब जाएगा। एटमी करार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा है, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के ज्यादा सांसद एटमी करार के खिलाफ हैं, इसके बावजूद फैसला उनके हाथ में नहीं है।

राजनीतिक-आर्थिक सौदागर मैदान में उतरे

जो जैसे पटे। उसे वैसे ही पटाने की रणनीति। राजनीतिक कीमत चुकानी पड़े। तो चुकाने में हर्ज नहीं। थैलियों का मुंह खोलना पड़े। तो कोई झिझक नहीं। अबके तो थैलियों में रुपयों के बजाए डालर। भारत को रिएक्टर बेचने वाले अमेरिकी आ पहुंचे। दिल्ली के फाइव स्टार होटलों में अमेरिकीयों के कमरे बुक। मनमोहन सरकार बचेगी। तो अमेरिकीयों को चालीस हजार करोड़ का बिजनेस मिलेगा। सो सौ-दो सौ करोड़ की क्या हैसियत। बिकने वाले बिकेंगे, ओहदे वाले ओहदा लेंगे। कुछ रामलखन यादव भी होंगे। कुछ शिबू सोरेन और सूरजमंडल भी। नरसिंह राव को जब बहुमत साबित करना पड़ा। तो अपन ने दोनों तरह के सौदे होते देखे। भजन लाल नोटों से भरी डिक्कियों वाली कारें लेकर घूम रहे थे। विद्याचरण शुक्ल मंत्री पद का लालच देते घूम रहे थे।

इस बार घोड़ामंडी में घोड़ों का भाव दस करोड़ तक

अपन ने कल यूपीए का ताजा आंकड़ा 268 बताया था। कांग्रेस के एक केंद्रीय मंत्री ने इसी को ठीक बताया। बोला- 'वैसे भी तब सदन में 535 से ज्यादा सांसद नहीं होंगे। हमारे पास 268-270 का पक्का जुगाड़।' अपन कोई ज्योतिषी नहीं। जो ज्योतिष लगाकर बताएं। चुनावों से डरकर इक्का-दुक्का सांसद सरकार बचा दें। तो अलग बात। वरना सांसदों का आंकड़ा हर रोज घटने लगा। अपन ने यूपीए के 268 सांसद बताए थे। उनमें मुलायम के बेनी-बब्बर समेत 37 गिने थे। पर अब मुलायम के 35 सांसद रह गए। सो अपना ताजा आंकड़ा 266 का। इसमें अपन ने जेडीएस का बागी विरेंद्र कुमार, बीएसपी का बागी उमाकांत, टीआरएस का बागी ए. नरेंद्र जोड़ लिया। मुस्लिम लीग ने शुक्रवार को करार का विरोध कर दिया।

संसद से भी हो गया धोखा अब सिख पीएम की दुहाई

अपन मौजूदा एटमी करार के हिमायती कभी नहीं रहे। अपन ने बीजेपी-लेफ्ट से पहले करार की खामियां निकाली। तीन अगस्त 2007 को वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो अपन ने 'अपनी सुरक्षा और ऊर्जा अमेरिका की मोहताज बताई थी।' अपन ने वे नुक्ते भी गिना दिए थे। जो काबिल-ए-ऐतराज थे। आईएईए सेफगार्ड के ड्राफ्ट में उन नुक्तों से मुक्ति नहीं। भले ही ड्राफ्ट में इस बात का जिक्र नहीं। अपन ने एटमी विस्फोट किया। तो क्या होगा। हां, ड्राफ्ट में यह साफ लिखा है- 'अगर विदेशी ईंधन की सप्लाई में बाधा आए। तो भारत सुधारवादी उपाय कर सकता है।' इसका एक मतलब तो यह हुआ- भारत को यूरेनियम का भंडार करने का हक।

राजनीतिक अपराधों की अमरवाणी

समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह अचानक सुर्खियों में आ गए हैं। अब यह संयोग ही है या योजनाबध्द ढंग से रची गई सियासत कि कांग्रेस को जब अमर सिंह की जरूरत महसूस होती है, तो वह अमेरिका में होते हैं। अमेरिका से वह ऐसा ज्ञान लेकर आते हैं कि विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी पहली ही मुलाकात में समाजवादी पार्टी की वामपंथी दलों से पुरानी दोस्ती तोड़ देते हैं। पिछले तीन सालों से वामपंथी दलों की कांग्रेस से तकरार चल रही थी। इन तीन सालों में वामपंथी दलों ने समाजवादी पार्टी को तीसरे मोर्चे के लिए तैयार किया और उन्हें भरोसा दिया

घोड़े बिकेंगे बाजार में, लगेगी घोड़ामंडी

अपन ने जब लिखना शुरू किया। तो मनमोहन सिंह उड़न खटोले पर बैठ चुके थे। आते ही सोनिया-प्रतिभा पाटील से मिलेंगे। सीसीपीए की मीटिंग भी होगी। ताकि बहुमत साबित करने की तारीख मुकर्रर हो।  बुधवार को लेफ्ट ने प्रतिभा ताई को समर्थन वापसी की चिट्ठी दी। तो सोनिया ने वर्किंग कमेटी की मीटिंग बुला ली। जुमे के दिन यानी कल होगी वर्किंग कमेटी। यों तो हालात बेहद नाजुक। अपन को 1999 से कोई फर्क नहीं दिखता। जब वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिरी थी। पर दिग्गी राजा और वीरप्पा मोइली बेफिक्र दिखे। बेफिक्री वाला 280 का आंकड़ा परोसते रहे। मनीष तिवारी तो बिजली की चमक में चकाचौंध दिखे।

कहीं मनमोहन भी गुलाम नबी की तरह इस्तीफा न दें

तो हू-ब-हू वही हुआ। गुलाम नबी के बाद अब मनमोहन तलवार की धार पर। बिल्कुल वैसे ही, जैसे जयललिता ने समर्थन वापस लिया था। तो वाजपेयी सरकार तलवार की धार पर थी। तब एक वोट से गिरी थी सरकार। अब भी एक-एक वोट की मारामारी। पर अब ऐसा कोई सीएम नहीं, जो कांग्रेस का सांसद भी हो। याद है, गिरधर गोमांग ने सीएम होकर लोकसभा में वोट दिया। बात करते हैं नैतिकता की। कल अपन ने एक बात और लिखी थी- 'ऐलान तो मंगलवार को होगा। समर्थन वापसी की चिट्ठी बुधवार को देंगे।' ताकि सनद रहे सो बता दें- लेफ्ट ने फैसला मंगलवार को किया। पर राष्ट्रपति भवन से वक्त सोमवार को ही मांग लिया था। जो बुधवार तय हुआ था।

गुलाम नबी के बाद आज से मनमोहन तलवार की धार पर

इतवार को इस्लामाबाद में आत्मघाती हमला हुआ। सोमवार को काबुल में अपनी एबेंसी के सामने। ठीक उसी समय श्रीनगर में एसेंबली के सामने बम फटे। तो अपन को पहली अक्टूबर 2001 याद आ गई। जब जम्मू कश्मीर एसेंबली में बम फटे थे। तीनों आतंकी वारदातों का अपनी सुरक्षा से सीधा ताल्लुक। अब जब नौ जुलाई की रात मनमोहन सिंह टोक्यो से लौटेंगे। तो अपनी सीसीएस हालात पर गौर करेगी ही।  तब तक बात गिरती-पड़ती सरकार की। अपन नहीं जानते- गुलाम नबी पर शनि-मंगल राशियों का असर हुआ होगा। पर गुलाम नबी सरकार सोमवार को निपट गई। बैठे-ठाले अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर मुसीबत मोल ली।

चमक-चमक कर चूके चतुर सुजान

कांग्रेस ने वामपंथी दलों को चार साल तक इस्तेमाल करके कूड़ेदान में फेंक दिया है। सारी दुनिया में अमेरिका विरोध का डंका बजाने वाले वामपंथी ठगे से रह गए हैं। कांग्रेस ने उन्हीं की वैसाखियों का इस्तेमाल करके अमेरिका के साथ दोस्ती का नया अध्याय शुरू कर दिया है। राजनीति में सही समय पर सही फैसला लेने का क्या मतलब होता है, यह वामपंथी दलों को अब समझ आ गया होगा। वामपंथी दलों को जुलाई 2005 में उस समय फैसला करना चाहिए था, जब न्यूनतम साझा कार्यक्रम को दरकिनार करके मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एटमी करार किया था। सुविधावादी राजनीति और सिध्दांतवादी राजनीति एक साथ नहीं चल सकती। माकपा महासचिव प्रकाश करात पिछले तीन साल से दोनों में तालमेल करके राजनीति की नई परिभाषा लिखने की कोशिश कर रहे थे।

आतंरिक लोकतंत्र के अभाव में तबाह होती कांग्रेस

सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उम्मीदवारों के चयन और पदाधिकारियों की नियुक्ति के मामले में एक दिशा निर्देश जारी किया था कि फैसले आलाकमान पर नहीं छोड़े जाएं। संभवत: सोनिया गांधी कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थी, चाहती थी कि जमीनी स्तर पर फैसले होंगे तो धीरे-धीरे कांग्रेस में आतंरिक लोकतंत्र मजबूत होगा और पार्टी की जड़ें जमेंगी। लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही सोनिया गांधी को समझ आ गया कि पार्टी का अपने पैरों पर खड़े होने का कोई इरादा नहीं। इसलिए शुरूआती ना-नुक्कर के बाद आलाकमान को अधिकृत करने के फैसले कबूल करने लगी।

यूएनपीए टूटा, मुलायम गए कांग्रेस की झोली में

यूएनपीए टूटने का ऐलान नहीं हुआ। पर यूएनपीए टूट गया। अब लेफ्ट समर्थन वापसी की चिट्ठी राष्ट्रपति को आज दे। या पीएम के टोक्यो लौटने से बाद दे। मनमोहन की सरकार भी बच गई। करार भी होगा। यूएनपीए मीटिंग के बाद चौटाला-चंद्रबाबू एकता की डुगडुगी बजाते रहे। करार पर राष्ट्रीय बहस का ऐलान किया। पर मुलायम सिंह एक शब्द नहीं बोले। अपन तभी समझ गए थे। जब अमर सिंह ने वही पुरानी दलील दोहराई- 'करार से ज्यादा खतरा सांप्रदायिकता से।'

चुनाव से डरकर भागेंगे कहां, बकरे की मां ....

दिल्ली में पल-पल समीकरण बदलने लगे। मंगल को मुलायम कांग्रेस के साथ दिखे। तो बुधवार को मुस्लिम सांसदों की बगावत से घबराए दिखे। गुरुवार को चंद्रबाबू और चौटाला के सामने होंगे। चंद्रबाबू-चौटाला कांग्रेस के साथ नहीं जा सकते। यूएनपीए बना ही कांग्रेस विरोध पर था। अब मुलायम कांग्रेस के साथ जाएंगे। तो कैसा तीसरा मोर्चा, कैसा यूएनपीए। कांग्रेस को अब मुलायम पर पूरा भरोसा। इसी भरोसे से मनमोहन इतवार को जी-8 के लिए रवाना होंगे। नौ-दस को लौटकर आईएईए पर फैसला होगा। बात आईएईए की चली। तो अपन गलतफहमियां दूर कर दें।

करार से जुड़ा है वोट बैक, चौराहे पर खड़े मुलायम

राजनीति में न परमानेंट दोस्ती। न परमानेंट दुश्मनी। मुलायम के बदले तेवरों से यह कहावत फिर सच साबित हुई। अपन फिलहाल अमर सिंह के बयानों को बाजू रखें। सिर्फ मुलायम सिंह का बयान पढ़ें। तो हर शब्द से दो मतलब निकलेंगे। उनने कहा- 'हमारी किसी राजनीतिक दल से दुश्मनी नहीं। सैध्दांतिक मतभेद हो सकते हैं।' यह बात कांग्रेस के लिए लागू। तो बीजेपी के लिए भी लागू। मुलायम भाजपाईयों की मदद से दो बार सीएम रह चुके। पहली बार 1978 के जनता राज में। दूसरी बार जब बिना बहुमत के वाजपेयी ने सीएम बनवाया। दोनों ने मिलकर वीपी सिंह को पीएम भी बनवाया था।

सांप्रदायिकता से चुनावी रोटियां सेकने का वक्त

एटमी करार का पतनाला वहीं का वहीं। यों अपने मनमोहन सिंह ने कई दिनों से बंद पड़ी जुबान खोली। पर कुछ ऐसा नहीं कहा। जो यूपीए-लेफ्ट की राजनीति में फर्क पड़े। मनमोहन ने भी वही पुरानी बात दोहराई। प्रकाश करात ने भी वही पुराना जवाब दोहरा दिया। अब कुछ लोगों की निगाह तीन जुलाई की यूएनपीए मीटिंग पर। पर अपनी निगाह मनमोहन के जी-8 के लिए टोक्यो दौरे पर। यों जी-8 का एटमी करार से कोई सीधा संबंध नहीं। पर कहीं जी-8 का दौरा सरकार का राम-नाम-सत्य न कर दे। सरकार के राम-नाम-सत्य होने की बात चली। तो आज बात जम्मू कश्मीर की।