July 2008

बमों के तार कहीं दाऊद इब्राहिम से तो नहीं जुड़े

गुजरात में बमों का मिलना अभी जारी। बुधवार रात तक सूरत में सत्ताईस बम मिल चुके। हैरानी की बात। अहमदाबाद के सभी बम फट गए। सूरत का एक भी नहीं फटा। बुधवार को अपने नरेंद्र भाई मोदी सूरत पहुंचे। वह लबेश्वर चौक गए। जहां मंगलवार को अच्छे-खासे बम मिले। मोदी बड़ोदा प्रेसटीज मार्किट से सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे। जहां बुधवार को भी बम मिला। अपन गुजरात में आतंकवाद की जड़ में जाएं। उससे पहले जरा सांसदों की खरीद-फरोख्त का आतंकवाद देख लें।

आतंकियों को अपनी सी लगती है यूपीए सरकार

अपन ने कल सुषमा की आतंकी थ्योरी बताई थी। जिसमें उनने केंद्र सरकार को घसीटा था। सद्दाम हुसैन ने अपनी कुर्सी के लिए हजारों कुर्दो को मरवाया था। अपनी यूपीए सरकार सद्दाम हुसैन के रास्ते पर तो नहीं चलेगी। सो सुषमा की बात किसी के गले नहीं उतरी। एनडीए के बाकी दलों के गले भी नहीं उतरी। गले उतरने वाली बात ही नहीं थी।  सुषमा ने आतंकवाद को सांसदों की खरीद-फरोख्त से जोड़ा। बोली- 'विस्फोट लोकसभा में विश्वासमत के फौरन बाद हुए। विश्वासमत में सरकार खरीद-फरोख्त से नंगी हुई।

संसद के बाद भारत की जम्हूरियत पर हमला

एनडीए-यूपीए में अब दोहरी जंग। पहली जंग कैश फॉर वोट के मोर्चे पर। दूसरी जंग आतंकवाद के मोर्चे पर। अपन दो दिन की छुट्टी पर गए। इसी बीच बंगलुरु-अहमदाबाद में बम धमाके हो गए। अब आतंकवाद पर कांग्रेस-बीजेपी में छीछालेदर। अपन छीछालेदर की बात बाद में करेंगे। पहले बात कैश फॉर वोट के मोर्चे पर यूपीए-एनडीए जंग की। अपने दिग्गी राजा ने आरोप लगाया था- 'एक करोड़ रुपया इंदौर के बैंक से निकाला गया। सीएम शिवराज की पत्नी के पार्टनर के खाते से पैसा निकला।

एटमी करार पर सहमति नहीं है विश्वासमत

यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि भारत के संसद में एटमी करार पर सहमति दे दी है। यूपीए लोकसभा के विश्वासमत को एटमी करार पर सहमति बताकर प्रचारित कर रहा है। यह संसद के साथ धोखे के सिवा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी संसद के अंदर और बाहर कई बार कह चुके हैं कि विदेशों के साथ होने वाले करारों को संसद की मंजूरी का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। इन दोनों नेताओं ने वामपंथी दलों के साथ चली नौ महीने की बातचीत में भी यही तर्क पेश किया था।

तीसरे मोर्चे की हवा का निकलना

मायावती विश्वास मत के बाद खुद के प्रधानमंत्री बनने या कम से कम तीसरे मोर्चे की नेता के तौर पर स्थापित होने का ख्वाब देख रही थीं, लेकिन विश्वास मत में पिटने के बाद तीसरे मोर्चे का गठन ही खटाई में पड़ गया है।

हर बार की तरह इस बार भी तीसरे मोर्चे में पार्टियां और नेता ज्यादा हैं, जमीनी आधार और कार्यकर्ता कम हैं। मनमोहन सरकार विश्वास मत में हार जाती तो उसका श्रेय इसी तीसरे मोर्चे को मिलता जो लोकसभा में मात खाने के बाद फिलहाल बनते-बनते रुक गया है। तीसरे मोर्चे के नेताओं ने मनमोहन सरकार गिराने के लिए भारतीय जनता पार्टी की मदद लेने में कोई गुरेज नहीं किया, लेकिन अब सरकार नहीं गिरी तो उस पर गुर्राने में भी कोई वक्त नहीं लगाया।

काली भेड़ें बर्खास्त हुई तो सरकार फिर अल्पमत में

विपक्ष ने अपनी काली भेड़ों की पहचान कर ली। आठ काली भेड़ें बीजेपी की निकली। सोमाभाई पटेल-बृजभूषण का तो बीजेपी को पहले से पता था। कबूतरबाजी वाले बाबूभाई कटारा पहले से सस्पेंड थे। बीजेपी वोट के लिए सस्पेंशन खत्म करने को तैयार हुई। तब तक कबूतर उड़ चुका था। सो काली भेड़ बने काले कबूतर ने साफ कह दिया- 'मैं तो यूपीए को वोट दूंगा।' अपनी याददाश्त इतनी कमजोर भी नहीं।

सरकार बची, साख गई, खुली खरीद-फरोख्त की पोल

अपन ने बीस जुलाई को लिखा था- 'सरकार बची तो बीजेपी के कारण ही बचेगी।' आखिर वही हुआ। बीजेपी के 127 वोट पड़ने थे। वाजपेयी समेत चारों बीमार स्टेचर पर आए। पर बीजेपी खेमे से वोट पड़े 121 ही। तीन और यूपीए के खेमे में चले गए। एक आकर एबस्टेन कर गया। दो ठीक वोटिंग के समय गायब हो गये। अपन की लिस्ट 268-268 की थी। पर यूपीए को मिले 275 वोट। विपक्ष में पड़े 256 वोट।

बसपा-भाजपा-लेफ्ट में गिनती के लिए तार जुड़े

दोनों खेमों ने किया बहुमत का दावा, असल में दोनों 268-268 पर

नई दिल्ली, 21 जुलाई। बसपा प्रमुख मायावती के खास सिपहसालार सतीश मिश्र ने आज वामपंथी और भाजपा नेताओं से मुलाकात कर स्थिति का आकलन किया। बाद में इस संवाददाता से बातचीत करते हुए सतीश मिश्र ने इन अफवाहों को मनघढ़ंत बताया कि भाजपा सरकार गिराने में गंभीर नहीं है। मायावती के प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट होने से भाजपा में खलबली को भी बसपा नेता ने कांग्रेस और मीडिया की उड़ाई हुई अफवाह बताकर खारिज किया।

बागियों का खुलासा आज रात को होगा

संसद के सेंट्रल हाल में बरसों बाद इतना रश देखा। सांसदों की भीड़ का असर कंटीन पर भी पड़ा। दूध से बने खाने-पीने वाले सामानों वाले काउंटर पर भी। दूध के बने खाने-पीने वाले काउंटर की बात चली। तो अपन आपकी जानकारी के लिए बता दें- सेंट्रल हाल से पुरानी लाइब्रेरी में घुसने वाले रास्ते में दो काउंटर। एक तरफ चाय का काउंटर। तो दूसरी तरफ उसके सामने दूध-दही-घी से बनी चीजों का काउंटर।  अंग्रेजों के जमाने में जब संसद बनी। तो यहां बियर बार हुआ करता था। अंग्रेज चले गए।

देशभक्ति नहीं होगा हार-जीत का पैमाना

मनमोहन सिंह को पहले ही पता था कि लोकसभा में उनकी सरकार के भाग्य का फैसला एटमी करार से देश को नफे-नुकसान के आधार पर नहीं होगा, अलबत्ता जोड़तोड़ और नए गठबंधन ही सरकार के भाग्य का फैसला करेंगे।

लोकसभा में मनमोहन सरकार के भाग्य का फैसला करते समय सांसद जब वोट डालेंगे, तो देशभक्ति पैमाना नहीं होगा। वैसे एटमी करार पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही देशभक्ति की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन दस फीसदी सांसदों ने भी गहराई में जाकर करार को समझने की कोशिश नहीं की। संभवत: दोनों पक्षों के पचास के करीब सांसद ही ऐसे निकलेंगे, जिन्होंने भारत-अमेरिका एटमी करार से जुड़े 1954 के अमेर