June 2008

आज मैं ऊपर आम आदमी नीचे

आपने आज खबर पढ़ ली होगी। मनमोहन की महंगाई रिकार्ड तोड़ गई। अपन ने यह भविष्यवाणी पिछले हफ्ते पांच जून को की थी। जब अपन ने लिखा- 'मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे।' तब अपन ने मनमोहन के 1995 वाले रिकार्ड की बात की। जो नौ फीसदी मुद्रास्फीति का था। यों तो शुक्रवार को वह रिकार्ड टूट गया। पर सरकार नहीं मानी। असल में सरकार का इरादा अपन को शुगर कोटेट कुनीन खिलाने का। सो 31 मई के असली आंकड़े दो महीने बाद पता चलेंगे। जो सवा नौ फीसदी से ऊपर होंगे। पर सरकार कितना छुपाएगी। किसी ने हजामत कराते समय नाई से पूछा- 'मेरे सिर पर कितने बाल?'

तो शिक्षा के अधिकार का दुरुस्त होगा कानून

सामाजिक सरोकार पर बाकी मीडिया इतना गंभीर नहीं। जितना अपन। सो मीडिया की बेरुखी पर सेमीनार हुआ। तो अपन सोशल वर्करों की खरी-खरी सुनकर आए। मौका था- 'बाल मजदूरी और शिक्षा पर दक्षिण एशिया सम्मेलन का।' यों तो बारह जून बाल मजदूरी के खिलाफ दिन था। जो दुनियाभर में मनाया गया। कैलाश सत्यार्थी के ग्लोबल मार्च ने तीन दिन का सम्मेलन रखा। तो उसमें एक सेशन मीडिया की बेरुखी पर भी हुआ। दिल्ली के कई खबरची मौजूद थे। कई अखबारों के ब्यूरो चीफ और राजनीतिक संपादक। सोशल वर्करों ने अपना गुस्सा उतारा।

अफजल की ढाल बन जाल में फंसी कांग्रेस

कांग्रेस-बीजेपी में गाली-गलौज तेज हो गया। अपन को चुनाव की आहट सुनाई देने लगी। यों भी जून का महीना मनमोहन सिंह पर भारी। पर बात वेंकैया नायडू और मनीष तिवारी के तीखे तेवरों की। वेंकैया ने कर्नाटक में फर्टिलाइजर की कमी का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ा। फर्टिलाइजर की कमी ने कर्नाटक में गोली चलवा दी। एक किसान मारा गया। बुधवार को अपने येदुरप्पा मौके पर गए। उनने जो बात बेंगलुरु में कही। वही वेंकैया दिल्ली में बोले। येदुरप्पा ने कहा- 'फर्टिलाइजर की कमी के लिए गवर्नर राज जिम्मेदार। गवर्नर राज में बंदोबस्त नहीं हुए।

माया-मुलायम खिचड़ी न पकी, न पकेगी

यूपी में है दम। जुर्म यहां है कम। अमिताभ बच्चन का यह नारा चुनाव में खूब चला। पर अमिताभ का यह नारा जमीनी हकीकत से दूर था। सो मुलायम सिंह निपट गए। अपन असल बात कहें। तो मुलायम सिंह मंत्रियों-विधायकों की गुंडागर्दी से ही निपटे। पर मंत्रियों-विधायकों के मुंह में खून लग जाए। तो सपा क्या, बसपा क्या। सो अब मायावती भी उसी रोग की शिकार। पर माया-मुलायम में एक फर्क। मुलायम अपनों के मददगार थे। भले ही वे जुर्म करके आ जाएं। पर मायावती इस मामले में मुलायम के उलट। क्रप्शन के लिए रोकती नहीं। जुर्म करने पर छोड़ती नहीं।

अफजल के इंटरव्यू से कांग्रेस की बोलती बंद

अपने शिवराज पाटिल अब दोहरी मुसीबत में। अफजल की पैरवी पर बीजेपी हमलावर थी ही। हरियाणा में बेटे-बहू के नाम पर धंधे का राज भी खुल गया। मंत्री सत्ता का कैसे दुरुपयोग करते हैं। यह उसकी जीती जागती मिसाल। हरियाणा में सरकार अपनी। सो कांग्रेसी मंत्रियों को खुल खेलने की छूट। केंद्र के गृहमंत्री होकर बहती गंगा में हाथ न धोएं। तो लोग क्या कहेंगे। पर अपन आज भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा की बात नहीं कर रहे। अलबत्ता पाटिल के उस बयान की परतें उधेड़ेंगे। जिसमें उनने अफजल-सरबजीत की बराबरी की।

अमीर बनने के कानूनी रास्ते निकाल लिए नेताओं ने

राजनेताओं की संपत्ति में आमदनी से ज्यादा इजाफा कैसे हो जाता है। भारत की आम जनता इसे बाखूबी जानती है, लेकिन हमारा कानून नहीं जानता। आप शायद ही ऐसे किसी नेता का नाम बता सकें, जो आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाए जाने के बाद जेल की सालाखों में गया हो। आप ऐसे अनेक नेताओं का नाम जानते होंगे, जिनके यहां आयकर के छापों में आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाई गई, लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। सुखराम के अलावा जयललिता, लालू यादव, मायावती जैसे कितने ही नाम आप भी जानते होंगे, जो आपकी आंखों के सामने देखते-देखते करोड़पति और अरबपति हो गए।

परिवारवाद की राजनीति और परिवार में राजनीति

अपने राजस्थान में भरतपुर के पति-पत्नी की राजनीति। तो मध्यप्रदेश में भूरिया बाप-बेटी की राजनीति चर्चा में। अपने शिवराज सिंह चौहान ने निर्मला भूरिया को मंत्री बनाया। तो अपनी आंखों के सामने मध्यप्रदेश की खेमेबाजी लौट आई। एक जमाना था। जब मध्यप्रदेश की राजनीति अर्जुन- विद्या भैया खेमों में थी। माधव राव सिंधिया की तब छोटी सी अपनी राजनीतिक दुकान थी। जो ग्वालियर -गुणा से आगे कभी नहीं बढ़ी। तब अर्जुन के सारथी थे दिग्गी-जोगी-सुभाष यादव। विद्या भैया के साथ बड़े भाई श्यामा चरण तो थे ही। साथ थे परसराम भारद्वाज-राधाकृष्ण मालवीय।

क्या सरकार के डेथ वारंट जारी कर चुके मनमोहन

अपन कार्टूनिस्ट होते। तो राजीव प्रताप रूढ़ी का मसाला काम आता। रूढ़ी ने काफी मेहनत की होगी। तब यह जुमला दिमाग में उभरा होगा। रूढ़ी राजनीति में नहीं आते। तो अच्छे कार्टूनिस्ट हो सकते थे। वैसे बाल ठाकरे पहले कार्टूनिस्ट थे। फिर पॉलिटिशियन बने। पॉलिटिशियन भी ऐसे बने। गैर मराठियों का मुस्कुराना बंद कर दिया। हंसाना तो दूर की बात। खैर बात रूढ़ी के जुमले की। उनने अपने मनमोहन सिंह का नया नामकरण किया। कहा- 'मनमोहन सिंह नहीं, महंगाई सिंह कहना चाहिए।' अपन ने कल ही तो लिखा था- 'मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे।' गुरुवार को जब मनमोहन की मंत्रियों को चिट्ठी पढ़ी। तो अपन को आने वाले बुरे दिनों का आभास होने लगा। यानी देश की आर्थिक हालत उतनी बुरी नहीं। जितनी अपन सोचते थे। अलबत्ता उससे भी ज्यादा बुरी।

मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे

मनमोहन सिंह को बधाई। सोनिया गांधी को भी बधाई। जो कसर रह गई थी। वह भी पूरी हो गई। आम आदमी का जमकर बाजा बजाया। बाजा बजाने का रेडियो-टीवी से संदेश भी दिया। अपनी बधाई इसी बात के लिए। पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की कीमतें बढ़ाकर संबोधित तो ऐसे कर रहे थे। जैसे उनकी रहनुमाई में देश ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की हो। राजीव प्रताप रूढ़ी ने इसे आर्थिक आतंकवाद कहा। यों जेटली या नकवी सामने आते। तो ज्यादा संवेदनशील प्रतिक्रिया आती। बीजेपी को भी सही वक्त पर सही आदमी पेश करना नहीं आता। पर कांग्रेस ने संकट की इस घड़ी में सही आदमी पेश किया। मनीष तिवारी ने महंगाई की मजबूरी भी तर्को से समझाई। एनडीए राज की कीमतों के परखचे भी उड़ाए।

नरसिंह राव की संजीवनी बूटी तरुण गोगोई के हाथ

बीजेपी की वर्किंग कमेटी निपट गई। आडवाणी को वर्किंग कमेटी से नया जोश मिला। सो मंगलवार को वह कांग्रेस पर और हमलावर हुए। बोले- 'एनडीए का राज आया। तो पीएम कमजोर नहीं होगा।' यानी उनने कहा- 'मैं मनमोहन सिंह की तरह लाचार और कमजोर नहीं होऊंगा।' मनमोहन को कमजोर कहो। तो अपने अभिषेक मनु सिंघवी के नथुने फूल जाते हैं। वे आपे में नहीं रहते। पर आडवाणी बाज नहीं आते। मंगलवार को उनने और भी ज्यादा चुभने वाला जुमला कसा। बोले- 'कांग्रेस पहले मुख्यमंत्रियों को घुटने टेक बनाती थी। ताकि आलाकमान का दबदबा बना रहे। अब पीएम को भी लाचार बना दिया। ताकि परिवार का दबदबा बना रहे।' आडवाणी ने कहा- 'मैं मजबूत पीएम, मजबूत सीएम का हिमायती।'

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट