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June 2008

गिरती-पड़ती यहां तक आई सरकार

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी के मुख्यमंत्रियों और राज्य के प्रभारी महासचिवों को बुलाकर लोकसभा चुनावों की तैयारी करने को कह दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अब भी भरसक कोशिश है कि वामपंथियों के समर्थन वापस लेने से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से भारत के लिए नए सेफगार्ड तय हो जाएं, ताकि यूरेनियम आयात के रास्ते खुल जाएं। इसके बाद भले ही अमेरिका से वन-टू-थ्री एक्ट के तहत करार पर दस्तखत होने से पहले उनकी सरकार गिर जाए। प्रणव मुखर्जी और प्रकाश करात यही रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे हुए हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

अब कांग्रेस ने लेफ्ट को दिखाया बीजेपी का हौवा

यों तो सोनिया गांधी चुनावी तैयारियों में जुट गईं। कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से फीडबैक ले चुकी। आज महासचिवों की मीटिंग। मिड टर्म के नफे-नुकसान का जायजा होगा। शुक्रवार को कांग्रेस-लेफ्ट की म्यानों से तलवारें निकल आई। सीपीएम के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी में प्रकाश करात ने लिखा- 'मनमोहन अमेरिकी इशारे पर काम कर रहे हैं। बुश सितंबर 2007 में ही एनएसजी को ड्राफ्ट दे चुके। एनएसजी देशों से बातचीत शुरू हो चुकी। बुश चाहते हैं- रिटायरमेंट से पहले एनएसजी से छूट दिला जाएं। इसीलिए मनमोहन चाहते हैं- आईएईए से सेफगार्ड तय हो जाएं। जैसे ही सेफगार्ड तय होंगे। बुश एनएसजी को एटमी ईंधन सप्लाई में छूट की अर्जी भेज देंगे।'

लोकसभा की मियाद दो महीने खिंचने की कवायद

अपन को लगता था- जून में गिरेगी सरकार। महंगाई ने फन न फैलाए होते। तो चौदहवीं लोकसभा का राम-नाम-सत्य इसी महीने होता। जून तय करने की अपने पास वजह थी। आईएईए चीफ अल बरदई जुलाई के आखिर में रिटायर होंगे। आईएईए से सेफगार्ड के लिए बरदई सबसे मुफीद। सो मनमोहन चाहते हैं- बरदई के रहते सेफगार्ड तय हो जाएं। यों तो आईएईए की जनरल बॉडी मीटिंग 29 सितंबर से चार अक्टूबर तक। तभी बोर्ड ऑफ गवर्नर की मीटिंग भी होगी। ताकि सनद रहे। सो अपन बता दें। अपन बाकी 143 देशों की तरह आईएईए की जनरल बॉडी के मेंबर। पर अपन 35 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर के मेंबर नहीं।

करार पर चुनाव का नफा-नुकसान

अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर यूपीए सरकार इतने गंभीर संकट में है कि देश पर मध्यावधि चुनावों के बादल मंडरा रहे हैं। असल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जुलाई 2005 में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ एटमी करार पर साझा बयान जारी करने से पहले ही राजनीतिक मजबूरियों को समझ लेना चाहिए था। वह उन वामपंथी दलों के समर्थन से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं, जिन्हें अमेरिका फूटी आंख नहीं सुहाता।

झुनझुना दिखा विकास का जेब काट ली सरकार ने

सोनिया अब मंदिरों में घंटियां बजाने लगी। शिरडी के साईं बाबा से निपटी। तो उज्जैन में भोले भंडारी के दरबार में पहुंची। महाकालेश्वर को सोने का छत्र चढ़ाने की मन्नत मानी। बंगाल के लेफ्टिए भले ही दुर्गा पूजा में धोती पहनकर आरती करें। पर केरल के लेफ्टिए मोटे तौर पर नास्तिक। सो प्रकाश करात घंटियां बजाने से चिढ़ न गए हों। अपन को तो यही खतरा। सोनिया ने किसलिए पूजा की। किसलिए मन्नत मानी। राजनीतिक गलियारों में चुटकलेबाजी चलती रही। पर बुधवार को आंखें दिखाने वाले करात शुक्रवार को नरम दिखे। बोले- 'हम चाहते हैं, सरकार अपना वक्त पूरा करे।'

चुनावी अटकलों में मां मंदिर में, बेटा लंदन में

मेल-मुलाकातें तो ऐसे शुरू हो गई। जैसे चुनाव आए कि आए। लेफ्ट ने अपना एजेंडा साफ कर दिया। अमेरिका से एटमी करार नहीं होने देंगे। प्रकाश करात-एबी वर्धन दिल्ली छोड़ गए। करात अपनी जन्मभूमि केरल गए। वर्धन रायपुर। लेफ्ट की दिल्ली सीताराम येचुरी के हवाले रही। येचुरी की बात चली। तो अपन को याद आया। बजट सत्र के वक्त अपन ने पूछा। तो आन रिकार्ड बोले थे- 'आईएईए से सेफगार्ड करार का ड्राफ्ट नहीं मांगेंगे। मांगना भी नहीं चाहिए। सरकार देगी भी नहीं, देना भी नहीं चाहिए।' पर अब ड्राफ्ट की मांग पर टकराव की खबर।

आई एटमी करार के आर-पार की घड़ी

अपन बिना लाग-लपेट फिर से बता दें। अपन ऐसे एटमी करार के कतई हिमायती नहीं। जो अपन को एटमी ताकत बनने से रोके। मनमोहन की दिलचस्पी अपन को एटमी ताकत बनाए रखने की नहीं। अलबत्ता अमेरिका से एटमी ईंधन करार की। अपने हाथ भले बंध जाएं। पर अमेरिका के न्यूक्लियर रिएक्टर बिकने चाहिए। अमेरिका का एटमी ईंधन आना चाहिए। फिर भले ही चोर दरवाजे से एनपीटी अपन पर लागू हो जाए। इंदिरा-वाजपेयी ने दुनिया का मुकाबला किया। तब जाकर अपन को एटमी ताकत बनाया।

तो रूस का पूरा दबाव डाल दिया लेफ्ट पर

अपन को जून पहले से फैसलाकुन लगता था। जो अपन गाहे-ब-गाहे लिखते रहे। जून में आईएईए से करार न हुआ। तो अमेरिकी कांग्रेस की मियाद भी खत्म। बुश के रहते तो एटमी करार की भैंस गई पानी में। सो मनमोहन सिंह की धुकधुकी बढ़ गई। सरकार हो या कांग्रेस। मुसीबत की घड़ी आए। तो कुंडी खटकती है प्रणव दा की। महिला आरक्षण पर मुश्किल में फंसे। तो प्रणव दा हल निकालें। एटमी करार की घुंडी फंसे। तो प्रणव दा घुंडी निकालें। अपन एटमी करार पर तो बात करेंगे ही। पहले महिला आरक्षण की बात।

तो मोदी पर देशद्रोह का मुकदमा ठोकेगा केंद्र

नरेंद्र मोदी से फिर उलझ गई कांग्रेस। गांवों में एक कहावत है- 'मोटे-तगड़े आदमी से बार-बार मार खा रहा एक बंदा हार मानने को तैयार नहीं था। जरा सा संभलता, तो चुनौती देकर कहता- अब के मार। इस पर मोटा तगड़ा आदमी एक झापड़ और देता। मार खाने वाला संभलकर फिर कहता- अबके मार।' गुजरात से बार-बार मार खा रही कांग्रेस का यही हाल। वह हर बार मोदी से कहती है- अबके मार। अपने मनीष तिवारी जिस तरह मोदी से भिड़ गए। अपन को तिवारी के लिए इससे बढ़िया कहावत और नहीं मिली। सबसे पहले तो अपन मोदी का वड़ोदरा वाला दस जून का भाषण बताएं।

सार्क में भी छाया रहेगा पेट और पेट्रोल

अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन पेट और पेट्रोल पर सबसे ज्यादा दबाव बढ़ा रहे हैं। इन दोनों देशों को अपनी आबादी को काबू में लाना होगा। सार्क सम्मेलन में भी इस बार यही अहम मुद्दा होगा।

पंजाब प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले थे। दलित समुदाय के इस नेता ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि लोकसभा चुनाव को नजदीक देखते हुए सरकार को किसानों की तरह दलितों के कर्ज भी माफ कर देने चाहिए।

आज मैं ऊपर आम आदमी नीचे

आपने आज खबर पढ़ ली होगी। मनमोहन की महंगाई रिकार्ड तोड़ गई। अपन ने यह भविष्यवाणी पिछले हफ्ते पांच जून को की थी। जब अपन ने लिखा- 'मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे।' तब अपन ने मनमोहन के 1995 वाले रिकार्ड की बात की। जो नौ फीसदी मुद्रास्फीति का था। यों तो शुक्रवार को वह रिकार्ड टूट गया। पर सरकार नहीं मानी। असल में सरकार का इरादा अपन को शुगर कोटेट कुनीन खिलाने का। सो 31 मई के असली आंकड़े दो महीने बाद पता चलेंगे। जो सवा नौ फीसदी से ऊपर होंगे। पर सरकार कितना छुपाएगी। किसी ने हजामत कराते समय नाई से पूछा- 'मेरे सिर पर कितने बाल?'

तो शिक्षा के अधिकार का दुरुस्त होगा कानून

सामाजिक सरोकार पर बाकी मीडिया इतना गंभीर नहीं। जितना अपन। सो मीडिया की बेरुखी पर सेमीनार हुआ। तो अपन सोशल वर्करों की खरी-खरी सुनकर आए। मौका था- 'बाल मजदूरी और शिक्षा पर दक्षिण एशिया सम्मेलन का।' यों तो बारह जून बाल मजदूरी के खिलाफ दिन था। जो दुनियाभर में मनाया गया। कैलाश सत्यार्थी के ग्लोबल मार्च ने तीन दिन का सम्मेलन रखा। तो उसमें एक सेशन मीडिया की बेरुखी पर भी हुआ। दिल्ली के कई खबरची मौजूद थे। कई अखबारों के ब्यूरो चीफ और राजनीतिक संपादक। सोशल वर्करों ने अपना गुस्सा उतारा।

अफजल की ढाल बन जाल में फंसी कांग्रेस

कांग्रेस-बीजेपी में गाली-गलौज तेज हो गया। अपन को चुनाव की आहट सुनाई देने लगी। यों भी जून का महीना मनमोहन सिंह पर भारी। पर बात वेंकैया नायडू और मनीष तिवारी के तीखे तेवरों की। वेंकैया ने कर्नाटक में फर्टिलाइजर की कमी का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ा। फर्टिलाइजर की कमी ने कर्नाटक में गोली चलवा दी। एक किसान मारा गया। बुधवार को अपने येदुरप्पा मौके पर गए। उनने जो बात बेंगलुरु में कही। वही वेंकैया दिल्ली में बोले। येदुरप्पा ने कहा- 'फर्टिलाइजर की कमी के लिए गवर्नर राज जिम्मेदार। गवर्नर राज में बंदोबस्त नहीं हुए।

माया-मुलायम खिचड़ी न पकी, न पकेगी

यूपी में है दम। जुर्म यहां है कम। अमिताभ बच्चन का यह नारा चुनाव में खूब चला। पर अमिताभ का यह नारा जमीनी हकीकत से दूर था। सो मुलायम सिंह निपट गए। अपन असल बात कहें। तो मुलायम सिंह मंत्रियों-विधायकों की गुंडागर्दी से ही निपटे। पर मंत्रियों-विधायकों के मुंह में खून लग जाए। तो सपा क्या, बसपा क्या। सो अब मायावती भी उसी रोग की शिकार। पर माया-मुलायम में एक फर्क। मुलायम अपनों के मददगार थे। भले ही वे जुर्म करके आ जाएं। पर मायावती इस मामले में मुलायम के उलट। क्रप्शन के लिए रोकती नहीं। जुर्म करने पर छोड़ती नहीं।

अफजल के इंटरव्यू से कांग्रेस की बोलती बंद

अपने शिवराज पाटिल अब दोहरी मुसीबत में। अफजल की पैरवी पर बीजेपी हमलावर थी ही। हरियाणा में बेटे-बहू के नाम पर धंधे का राज भी खुल गया। मंत्री सत्ता का कैसे दुरुपयोग करते हैं। यह उसकी जीती जागती मिसाल। हरियाणा में सरकार अपनी। सो कांग्रेसी मंत्रियों को खुल खेलने की छूट। केंद्र के गृहमंत्री होकर बहती गंगा में हाथ न धोएं। तो लोग क्या कहेंगे। पर अपन आज भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा की बात नहीं कर रहे। अलबत्ता पाटिल के उस बयान की परतें उधेड़ेंगे। जिसमें उनने अफजल-सरबजीत की बराबरी की।

अमीर बनने के कानूनी रास्ते निकाल लिए नेताओं ने

राजनेताओं की संपत्ति में आमदनी से ज्यादा इजाफा कैसे हो जाता है। भारत की आम जनता इसे बाखूबी जानती है, लेकिन हमारा कानून नहीं जानता। आप शायद ही ऐसे किसी नेता का नाम बता सकें, जो आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाए जाने के बाद जेल की सालाखों में गया हो। आप ऐसे अनेक नेताओं का नाम जानते होंगे, जिनके यहां आयकर के छापों में आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाई गई, लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। सुखराम के अलावा जयललिता, लालू यादव, मायावती जैसे कितने ही नाम आप भी जानते होंगे, जो आपकी आंखों के सामने देखते-देखते करोड़पति और अरबपति हो गए।

परिवारवाद की राजनीति और परिवार में राजनीति

अपने राजस्थान में भरतपुर के पति-पत्नी की राजनीति। तो मध्यप्रदेश में भूरिया बाप-बेटी की राजनीति चर्चा में। अपने शिवराज सिंह चौहान ने निर्मला भूरिया को मंत्री बनाया। तो अपनी आंखों के सामने मध्यप्रदेश की खेमेबाजी लौट आई। एक जमाना था। जब मध्यप्रदेश की राजनीति अर्जुन- विद्या भैया खेमों में थी। माधव राव सिंधिया की तब छोटी सी अपनी राजनीतिक दुकान थी। जो ग्वालियर -गुणा से आगे कभी नहीं बढ़ी। तब अर्जुन के सारथी थे दिग्गी-जोगी-सुभाष यादव। विद्या भैया के साथ बड़े भाई श्यामा चरण तो थे ही। साथ थे परसराम भारद्वाज-राधाकृष्ण मालवीय।

क्या सरकार के डेथ वारंट जारी कर चुके मनमोहन

अपन कार्टूनिस्ट होते। तो राजीव प्रताप रूढ़ी का मसाला काम आता। रूढ़ी ने काफी मेहनत की होगी। तब यह जुमला दिमाग में उभरा होगा। रूढ़ी राजनीति में नहीं आते। तो अच्छे कार्टूनिस्ट हो सकते थे। वैसे बाल ठाकरे पहले कार्टूनिस्ट थे। फिर पॉलिटिशियन बने। पॉलिटिशियन भी ऐसे बने। गैर मराठियों का मुस्कुराना बंद कर दिया। हंसाना तो दूर की बात। खैर बात रूढ़ी के जुमले की। उनने अपने मनमोहन सिंह का नया नामकरण किया। कहा- 'मनमोहन सिंह नहीं, महंगाई सिंह कहना चाहिए।' अपन ने कल ही तो लिखा था- 'मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे।' गुरुवार को जब मनमोहन की मंत्रियों को चिट्ठी पढ़ी। तो अपन को आने वाले बुरे दिनों का आभास होने लगा। यानी देश की आर्थिक हालत उतनी बुरी नहीं। जितनी अपन सोचते थे। अलबत्ता उससे भी ज्यादा बुरी।

मनमोहन महंगाई का अपना रिकार्ड तोड़ेंगे

मनमोहन सिंह को बधाई। सोनिया गांधी को भी बधाई। जो कसर रह गई थी। वह भी पूरी हो गई। आम आदमी का जमकर बाजा बजाया। बाजा बजाने का रेडियो-टीवी से संदेश भी दिया। अपनी बधाई इसी बात के लिए। पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की कीमतें बढ़ाकर संबोधित तो ऐसे कर रहे थे। जैसे उनकी रहनुमाई में देश ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की हो। राजीव प्रताप रूढ़ी ने इसे आर्थिक आतंकवाद कहा। यों जेटली या नकवी सामने आते। तो ज्यादा संवेदनशील प्रतिक्रिया आती। बीजेपी को भी सही वक्त पर सही आदमी पेश करना नहीं आता। पर कांग्रेस ने संकट की इस घड़ी में सही आदमी पेश किया। मनीष तिवारी ने महंगाई की मजबूरी भी तर्को से समझाई। एनडीए राज की कीमतों के परखचे भी उड़ाए।

नरसिंह राव की संजीवनी बूटी तरुण गोगोई के हाथ

बीजेपी की वर्किंग कमेटी निपट गई। आडवाणी को वर्किंग कमेटी से नया जोश मिला। सो मंगलवार को वह कांग्रेस पर और हमलावर हुए। बोले- 'एनडीए का राज आया। तो पीएम कमजोर नहीं होगा।' यानी उनने कहा- 'मैं मनमोहन सिंह की तरह लाचार और कमजोर नहीं होऊंगा।' मनमोहन को कमजोर कहो। तो अपने अभिषेक मनु सिंघवी के नथुने फूल जाते हैं। वे आपे में नहीं रहते। पर आडवाणी बाज नहीं आते। मंगलवार को उनने और भी ज्यादा चुभने वाला जुमला कसा। बोले- 'कांग्रेस पहले मुख्यमंत्रियों को घुटने टेक बनाती थी। ताकि आलाकमान का दबदबा बना रहे। अब पीएम को भी लाचार बना दिया। ताकि परिवार का दबदबा बना रहे।' आडवाणी ने कहा- 'मैं मजबूत पीएम, मजबूत सीएम का हिमायती।'

जैसे भ्रष्टाचार नेताओं का जन्मसिध्द अधिकार हो

बीजेपी आलाकमान ने खाट खड़ी की। तो इतवार की रात एमपी भवन में मीटिंग हुई। रात बारह बजे तक चली मीटिंग। सीएम शिवराज चौहान के साथ मौजूद थे नरेंद्र तोमर और माखन सिंह। हेल्थ मिनिस्टर अजय विशनोई भी तलब किए गए। रास्ता नहीं बचा था। सो अजय विशनोई से इस्तीफा मांगा गया। भले ही इस्तीफे के बाद सीएम ने ना-नुक्कर की। ना-नुक्कर का मतलब अपने मंत्री को दूध का धुला बताना। पर इस्तीफे का फरमान खुद दिल्ली से लेकर गए थे। अजय विशनोई शुक्रवार को सुर्खियों में आए। जब विशनोई के भाई पर इनकम टेक्स के छापे पड़े। मंत्री बनने से पहले विशनोई का धंधा भी हेल्थ से जुड़ा था। मंत्री भी हेल्थ के बना दिए गए। वैसे राजनीतिक मर्यादा इसकी इजाजत नहीं देती। पर कहां रही मर्यादा?

पर चार जेटली कहां से लाएंगे राजनाथ सिंह

अर्जुन के तीरों को समझना आसान नहीं। जैसे चिदंबरम का बजट पहली नजर में समझ नहीं आता। वैसे ही अर्जुन के तीर फोरन समझ नहीं आते। सो अर्जुन ने जो तीर शनिवार को वर्किंग कमेटी में चलाएं। कांग्रेसी इतवार को उसका चीर-फार कर रहे थे। तभी एक और ठाकुर ने तीर चला दिए। अर्जुन ने कर्नाटक की हार का ठिकरा मंहगाई के सिर फोड़ा। तो निशाना मनमोहन पर था। सोनिया ने अर्जुन को चापलुसी से रोका था। तीर चलाने से नहीं। यानि हार का ठिकरा सोनिया की रहनुमाई पर नहीं। अलबत्ता मनमोहन की मनेजमेन्ट पर। बीजेपी के ठाकुर राजनाथ सिंह ने भी मनमोहन पर तीर चलाई।

क्षत्रपों के बिना नहीं उभरेगी कांग्रेस

सोनिया ने हारों से सबक लेकर कमेटी बनाने का फैसला किया है, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी क्षत्रपों को उभारकर पार्टी की जड़ें जमा रहे हैं। कांग्रेस के अब देश में सिर्फ 656 विधायक, जबकि भाजपा के 940 हो गए हैं।

अगर कोई कांग्रेस के घटते ग्राफ और भाजपा के बढ़ते ग्राफ की वजह पूछना चाहें, तो मैं कहूंगा कि कांग्रेस में क्षत्रप उभरने नहीं दिए जा रहे और भाजपा में क्षत्रप दिन-प्रतिदिन ताकतवर हो रहे हैं। चार दशक पहले तक कांग्रेस अपनी क्षत्रप नेताओं की वजह से एक मजबूत पार्टी थी, इंदिरा गांधी ने एक-एक करके क्षत्रपों को खत्म कर दिया और कांग्रेस को केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया। दूसरी तरफ पिछले पांच सालों में भाजपा ने नरेंद्र मोदी, वसुंधरा राजे, प्रेम कुमार धूमल, मेजर भुवन चंद्र खंडूरी और अब येदुरप्पा को क्षत्रप के तौर पर उभरने का पूरा मौका दिया है।