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May 2008

भूली-बिसरी वर्किंग कमेटी की याद आई सोनिया को

अपने अभिषेक मनु सिंघवी का जवाब नहीं। गुर्जर आंदोलन पर बोले। तो वसुंधरा राजे को रानी-महारानी कह गए। पता नहीं सिंघवी का जमहूरियत से भरोसा क्यों उठा। वसुंधरा तो बाकायदा चुनी हुई सीएम। चुनाव में रहनुमाई भी वसुंधरा की थी। मनमोहन सिंह की तरह कतई नहीं। न पहले चुनाव में रहनुमाई की। न अब करेंगे। न जनता ने चुना, न चुने हुए सांसदों ने। सिंघवी की तरह वसु कभी राज्यसभा में भी नहीं रही। फिर सिंघवी का सीएम को रानी-महारानी कहना। अपन को खुन्नस के सिवा कुछ नहीं लगा। गुर्जर आरक्षण पर कांग्रेस का स्टेंड पूछा। तो बंदे के जुबान लड़खड़ाने लगी।

दिया जब रंज बूतों ने तो माया को खुदा याद आया

राजस्थान की आग अब दूर-दूर तक फैल गई। रेल मार्गों के बाद गुरुवार को सड़कें भी जाम हुई। पड़ोसी राज्यों यूपी, हरियाणा में तो असर हुआ ही। जम्मू कश्मीर तक असर हुआ। जहां गुर्जरों को पहले से एसटी का दर्जा। जम्मू कश्मीर के गुर्जरों ने सवाल उठाया- 'सारे देश में गुर्जरों को एसटी का दर्जा क्यों नहीं।' सो तीन हजार गुर्जर सड़कों पर उतर आए। वसुंधरा राजे जम्मू कश्मीर में भी मशहूर हो गई। वहां भी वसुंधरा के पुतले जले। बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा। राजनीतिक हमला करने वाले भी बिलों से निकल आए। दिल्ली से कांग्रेस वसुंधरा पर बरस रही थी। लखनऊ से मायावती।

किस-किस राज्य को संभालेंगी सोनिया

गुर्जरों के आंदोलन की आंच दिल्ली पहुंची। तो दिल्ली की राजनीतिक हलचल तेज हो गई। अपनी वसुंधरा ने गेंद केंद्र के पाले में फेंकी। तो मनमोहन ने हंसराज भारद्वाज के पाले में। अब भारद्वाज के पाले से गेंद फिर वसुंधरा के पाले में। इससे साबित हुआ- 'धरती गोल है।' राजनीति का चक्र घूमना शुरू। कर्नाटक के बाद अब सोनिया बाकी राज्य बचाने में जुटी। सो मुकुल वासनिक, वीरेंद्रसिंह, पी सी जोशी, हेमाराम चौधरी दौरा करेंगे। टीम में अपने गहलोत का नाम नहीं। टीम आंदोलन के शहीदों के घर जाएगी। हमदर्दी के दो शब्द कहेगी। जरूरत पड़ी तो स्टेंड पर भी आधा-अधूरा ही सही। मुंह खोलेगी।

गुर्जरों को एसटी दर्जे पर ऐसे कन्नी काटी कांग्रेस

सौ साल पहले गुर्जर चाहते थे- उन्हें क्षत्रीय माना जाए। आज कह रहे हैं- 'हमें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले।' पर गुर्जर हैं क्या? अपन इतिहास के पन्ने पलटें। तो गुर्जरों की कई कहानियां मिलेंगी। पहली कहानी- हूण दो गुटों में बंट गए। रेड हूण और सफेद हूण। रेड हूण यूरोप चले गए। सफेद हूण ऑक्सेस घाटी पार कर काबुल में घुसे। काबुल में उनने किशन साम्राज्य पर कब्जा किया। फिर भारत में घुस आए। कहानी है- वे जॉर्जिया से आए। जो अंग्रेजी में 'जी' से शुरू होता है। जॉर्जिया का अपभ्रंश ही गुर्जर- गुज्जर हुआ। वे जॉर्जिया से मध्य एशिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान से खैबर दर्रा पार कर भारत में घुसे। दूसरी कहानी- गुर्जर असल में राजपूत थे। मुगलों ने भारत पर हमला किया। तो औरंगजेब से राजपूतों का एक समझौता हुआ। समझौता था- 'राजपूत युध्द में हार गए। तो उनका एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम बन जाएगा।'

ओखली में सिर दिया तो अब भुगते यूपीए

अपने मुरली देवड़ा मंगलवार को मनमोहन सिंह से मिले। तो उनने पेट्रोलियम कंपनियों को घाटे का ब्यौरा दिया। संसद का बजट सत्र खत्म हुआ। तब से पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने की अटकलें। पर अपन को पहले से पता था। कर्नाटक चुनाव तक कीमतें नहीं बढ़नी। सो नहीं बढ़ी। अपनी सरकार है, सो हर मामले में राजनीति से परहेज क्यों। अमेरिका होता, तो राष्ट्रपति देश को आर्थिक घाटे का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। पर मनमोहन ने चुनावी फायदे के लिए महीना भर कीमतें रोके रखी। अब कीमतें बढ़ेंगी, इससे मुरली देवड़ा ने कभी इनकार भी नहीं किया। अपने अभिषेक मनु सिंघवी भी दो टूक शब्दों में कह चुके- 'देश कीमतें बढ़ने के लिए तैयार रहे।' सो कीमतें तो बढ़ेंगी ही। आज नहीं तो कल। पर सरकार भी आम लोगों को हलाल करने पर आमादा।

सीएम प्रोजेक्ट किए तो जाल में फंसेगी कांग्रेस

कर्नाटक में जब कांग्रेस की लुटिया डूब रही थी। तो सोनिया अपनी बेटी प्रियंका के घर नाते-नाती से खेल रही थी। सोनिया बारह बजे से पांच बजे तक प्रियंका के घर रही। राजीव जब पीएम थे। तो छुट्टियां मनाने की परंपरा दुबारा से शुरू की। यों जवाहर लाल नेहरू भी छुटि्टयां मनाने जाते थे। पहली बार उनने हिमाचल में छुट्टियां मनाई। पर बाद में पीएम छुट्टियों से कन्नी काटने लगे। राजीव अलग तरह के राजनीतिबाज थे। उनने अपने यहां यूरोपियन रिवाज लागू किया। हफ्ते में दो दिन छुट्टियों का। फाइव डे वीक राजीव की देन। सोनिया तो ठहरी ही यूरोपियन। सो हार में वह क्यों अपना संडे बर्बाद करती।

अब आडवाणी का ख्वाब ख्याली पुलाव नहीं

कर्नाटक में कांग्रेस क्या हारी। सबको कांग्रेस की फिक्र पड़ गई। अपन दिनभर एक चैनल पर रहे। बार-बार यही सवाल दागा गया-'अब कांग्रेस का क्या होगा। कांग्रेस को क्या करना चाहिए'। मीडिया कांग्रेस की हालत पर दुबला हो चला है। पर अपन उन लोगों में नहीं। जो देश से ज्यादा कांग्रेस की फिक्र करे। कांग्रेस ने परिवारवाद अपनाकर खुद अपनी जड़ों में मटठा डाला। अपन उन लोगों में भी नहीं। जो कांग्रेस के लिए नेहरु-गांधी परिवार को जरूरी समझें। सोनिया के बिना भी नरसिंह राव 145 सीटे लाए थे। सोनिया के बिना भी सीताराम केसरी 141 सीटें लाए थे।

आतंकवाद राष्ट्रीय मुद्दा घोषित किया जाए

फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, फैडरल कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत। आतंकवाद से लड़ने के लिए राज्यों और राजनीतिक दलों को तुच्छ राजनीति छोड़नी होगी।

इसी पखवाड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई। नोएडा पुलिस ने पहले दिन हत्या के फौरन बाद से गायब घरेलू नौकर हेमराज पर शक किया। हेमराज की तलाश में पुलिस टीम नेपाल भेज दी गई। अगले दिन डा. तलवार के घर की छत पर हेमराज की लाश मिली, तो पुलिस के होश उड़ गए। नोएडा पुलिस लगातार सात दिन तक हवा में तीर मारती रही और अफवाहों को हवा देती रही।

तो मनमोहन ने पैदा की यूरेनियम की फर्जी कमी

यों कहावत तो है- जख्मी शेर ज्यादा हमलावर हो जाता है। पर अपन दुविधा में। शिवराज पाटिल को शेर कहें कैसे? पर चारों तरफ से घिरे पाटिल अब ज्यादा हमलावर। सो बांग्लादेशियों के मुद्दे पर बेनकाब हुए पाटिल अब गुर्जरों के मुद्दे पर हमलावर हों। तो अपन को हैरानी नहीं होगी। बांग्लादेशियों के मुद्दे पर उनने वसुंधरा से खार खा ली। सो अब वसुंधरा केंद्र से नए हमले का इंतजार करें। जब तक पाटिल-वसुंधरा का नया वाकयुध्द हो। तब तक अपन बात करें पाटिल के अफजल वाले बयान की। जिस पर देश में बवाल मचा। पर पाटिल बचाव में नहीं उतरे।

आतंकियों-घुसपैठियों की पीठ पर देश का गृहमंत्री

जब बाड ही खेत को खाने लगे। तो खेत का खुदा ही रखवाला। गृहमंत्री शिवराज पाटिल पर यह कहावत एकदम फिट। देश को ऐसा गृहमंत्री न पहले कभी मिला। न आगे कभी मिलना। सोनिया गांधी को ऐसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर फख्र। जिनका न कोई राजनीतिक आधार। न जमीनी आधार। अपन तो पाटिल के बयान पर हैरान हुए। जब वह वसुंधरा राजे पर भड़कते हुए बोले- 'यह राजशाही नहीं। लोकतंत्र है।' जी हां, इसीलिए लातूर में हारकर वह देश के गृहमंत्री हो गए। इसीलिए दक्षिण दिल्ली में हारकर मनमोहन देश के पीएम हो गए। इसी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं पाटिल। वसुंधरा को बता रहे हैं- 'यह राजशाही नहीं।' जो जनता के वोट से जीतकर सीएम बनी। जिसे किसी सोनिया ने नोमिनेट नहीं किया।

पीएम का जश्न, महंगाई और जयपुर का मातम

यों तो जयपुर की आतंकी वारदात का आज दसवां दिन। अपने यहां तेरहवीं से पहले मातम मनाने की संस्कृति। मार्च 2006 को आतंकियों ने बनारस के मंदिरों में बम फोड़े। तो सोनिया गांधी ने होली नहीं मनाई थी। वाजपेयी, जो होली के शौकीन। उनने भी होली नहीं मनाई। सो अब तेरहवीं से पहले मनमोहन का डिनर अजीब-ओ-गरीब। बनारस में सिर्फ 28 लोग मरे थे। जयपुर में 66 लोग मर चुके। मनमोहन सालाना रिपोर्ट कार्ड जारी करते। डिनर न रखते। तो संस्कृति भी बची रहती। आतंकवाद के खिलाफ गंभीरता भी दिखती। बीजेपी को भी जनता की भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए।

आतंकवाद के माहौल में सालगिरह का जश्न

आडवाणी कर्नाटक की भागदौड़ से लौटे। तो हरकिशन सुरजीत का हालचाल पूछने गए। मनमोहन की सरकार बनवाने में अहम भूमिका थी सुरजीत की। सो मनमोहन इतवार को ही अस्पताल हो आए। मनमोहन के साथ सुरजीत कभी संसद में नहीं रहे। पर आडवाणी-सुरजीत एक ही वक्त राज्यसभा में थे। आडवाणी-सुरजीत ने तब भी इकट्ठे काम किया। जब बीजेपी-सीपीएम ने वीपी सरकार को समर्थन दिया। सो आडवाणी ने येचुरी को फोन किया। तो पुराने किस्से याद किए। वैसे अभी ऐसा वक्त नहीं आया था। वाहे-गुरु सुरजीत को चंगा भला करें। जैसे चंगे-भले होकर करुणानिधि अस्पताल से लौटे। सुरजीत का हालचाल पूछ अपने मनमोहन तो चुनावी तैयारियों में जुट गए। कल सरकार की चौथी सालगिरह। इसे अपन चौथा तो नहीं कह सकते।

तुम्हारी कमीज पर मेरी कमीज से ज्यादा धब्बे

जयपुर के धमाकों ने राजनीति तेज कर दी। कांग्रेस-बीजेपी में एक-दूजे को कटघरे में खड़ा करने की होड़। आतंकवाद पर कांग्रेस का रिकार्ड अच्छा नहीं। तो उसने भाजपा का रिकार्ड याद कराने का तरीका अपनाया। कांग्रेस अपने रिकार्ड पर बात करने को तैयार नहीं। अरुण जेटली ने इतवार को मनमोहन सिंह की बखिया उधेड़ी। तो कांग्रेस जल-भुन गई। जेटली की बाकी बातें बाद में। पहले फेडरल एजेंसी की बात। अपन ने यह बात पंद्रह मई को ही लिख दी थी। जब अपन ने लिखा- 'पोटा हटाकर फेडरल एजेंसी की वकालत।' तो अपन ने उस दिन खुलासा किया- 'फेडरल एजेंसी का आइडिया छह साल पहले आडवाणी का था। तब कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने विरोध किया।' यही बात पांच दिन बाद जेटली ने याद कराई।

भारत का विभाजन चाहते हैं जेहादी

पाकिस्तानी आतंकवादियों को अब भारत में बांग्लादेशी और सिमी के कार्यकर्ता जमीनी मदद दे रहे हैं

भारत में मुसलमानों की आबादी पंद्रह करोड़ के आसपास है। मुसलमानों की आबादी के लिहाज से इंडोनेशिया के बाद भारत का दूसरा नंबर है। दुनियाभर में चल रहे इस्लामिक कट्टरपंथ का भारत के मुसलमानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कुछेक जगहों पर जरूर विभिन्न स्थानीय शिकायतों के कारण मुस्लिम युवक पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी कट्टरपंथी और जेहादी संगठनों के बहकावे में आए होंगे। बहुसंख्यक भारतीय मुसलमान देश के प्रति वफादार और कानून का पालन करने वाले हैं। अगर उनकी छोटी-मोटी शिकायतें रही भी होंगी, तब भी उन्होंने भारत के हिंदुओं और भारतीय सरकार के खिलाफ आतंकवादियों का साथ नहीं दिया। भारत के मुसलमान आधुनिक विचारों के, शांतिप्रिय और विकासशील हैं।

कांग्रेस बांग्लादेशियों के भरोसे असम जीत चुकी

कांग्रेस शुक्रवार को भी वसुंधरा पर भड़की हुई थी। अबके भड़ास अपने शकील अख्तर ने निकाली। बोले - 'बीजेपी और बीएसपी सोनिया और राहुल से डरे हुए हैं।' सोनिया तो चलो जयपुर गई। जिस पर वसुंधरा भड़की। पर राहुल बाबा बीच में कहां से आ गए। अपन को समझ नहीं आया। असल में कांग्रेसियों को राहुल बाबा पर ज्यादा ही भरोसा। इसलिए बाकी किसी महामंत्री का नाम तक नहीं लेते। पर अपन बात कर रहे थे वसुंधरा के खिलाफ निकली भड़ास की। मनीष तिवारी गुरुवार को ही अपनी भड़ास निकाल चुके थे। अब रह गए अभिषेक मनु और जयंती नटराजन।

वोट बैंक की जमहूरियत में इंसानियत हुई स्वाहा:

अपन को चुनाव करना होगा। इंसानियत और जमहूरियत में से किसे चुनें। शायद ही कोई ऐसा शख्स मिले। जो इंसानियत पर जमहूरियत को तरजीह दे। इकसठ साल पहले अपन को आजादी मिली। तो अपन ने जमहूरियत को खुद अपनाया था। पर अब जब जमहूरियत ही इंसानियत में आड़े आए। तो क्या अपन को सोचना नहीं चाहिए? अपन ऐसी जमहूरियत का क्या करेंगे? जिसमें इंसानियत ही न बचे। अब तो जमहूरियत ने इंसानियत पर ही हमला बोल दिया। सोचो, जमहूरियत में वोटों का लालच न होता। तो बांग्लादेशी निकाल बाहर न किए जाते। बांग्लादेशी घुसपैठिए कब वोटर बन गए। अपन को पता ही नहीं चला। पता तब चला, जब अपनी जमहूरियत घुसपैठियों ने लूट ली। अब आजादी लूटने पर भी आमादा।

पोटा हटाकर फैडरल एजेंसी की वकालत

अपनी आशंका सही ही निकली। घुसपैठ-धमाकों के तार पाकिस्तानी सियासत से ही जुड़े हैं। अपन ने कल सांभा सेक्टर में घुसपैठ का जिक्र किया। जिस पर एंटनी ने पाक फौज पर ऊंगली उठाई। घुसपैठ और विस्फोट के बाद बुधवार को तंगधार सेक्टर में गोलाबारी हुई। पाकिस्तान ने दूसरी बार सीज फायर का उल्लंघन किया। पाकिस्तानी फौज-आतंकवादियों का रिश्ता छुपा नहीं। यह कारगिल के वक्त भी साबित हुआ। जयपुर के विस्फोटों की जांच की सुई भी लश्कर-हूजी की ओर। लश्कर पाकिस्तानी आतंकी संगठन। तो हूजी आईएसआई का बांग्लादेशी आतंकी मॉडल। गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जयपुर से लौटकर बोले- 'वारदात के पीछे सीमा पार की ताकतें।' पर जायसवाल के अलावा कोई पाक पर ऊंगली उठाने से बचा। शिवशंकर मेनन को ही लो। पूछा तो बोले- 'अभी किसी पर ऊंगली उठाना ठीक नहीं।' यह है आतंकवाद से लड़ने की भूल-भुलैया।

पाक की सियासत से जुड़े घुसपैठ-धमाकों के तार

अपन जयपुर के धमाकों पर फौरी कयास तो नहीं लगाते। पर धमाकों का रिश्ता पाक की सियासतNawaz Sharif and Asif Ali Zardari से जुड़े। तो अपन को कतई हैरानी नहीं होनी। पाकिस्तान के चुनावों से जमहूरियत लौटी। तो अपन को जहां खुशी हुई। वहां मन में एक आशंका भी थी। आशंका थी- फौज इस जमहूरियत को कितना बर्दाश्त करेगी। करेगी भी या नहीं। फौज ने पाक की जमहूरियत बर्दाश्त नहीं की। तो ठीकरा अपने ही सिर फूटेगा। अपन अभी यह तो नहीं कह सकते- जमहूरियत पटरी से उतरने लगी। पर जमहूरियत फेल करने की साजिशें तो शुरू हो चुकी। पाकिस्तान के अंदर भी। पाकिस्तान से बाहर भी। इक्कतीस मार्च को सय्यद युसूफ रजा गिलानी की सरकार बनी। तो फैसला हुआ था- 'तीस अप्रेल तक सभी बर्खास्त जज बहाल होंगे।'

आडवाणी भूले, या जसवंत या भूली कांग्रेस

अपन आपकी याददाश्त फिर ताजा कर दें। कंधार अपहरण कांड हुआ। तो देश में क्या हालात थे। वाजपेयी पीएम थे। जसवंत सिंह विदेश मंत्री। वही जसवंत जिनने तब अमेरिकापरस्ती की कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि विमान अपहरण के वक्त अपन ने मदद मांगी। तो अमेरिका ने मुंह फेर लिया था। अब अपहरण कांड फिर सुर्खियों में। जबसे आडवाणी पीएम पद के उम्मीदवार हुए। कईयों की छाती पर सांप लौट गया। आडवाणी को कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस का तो काम। पर जसवंत-यशवंत को क्या हुआ। अपन को दोनों कांग्रेस की कठपुतली तो नहीं लगते। अपन को वह दिन नहीं भूले। जब वाजपेयी राज के वक्त एक संपादक ने लेख लिखा था- 'जसवंत सिंह हो सकते हैं वाजपेयी के उत्तराधिकारी।'

कांग्रेस के करिश्माई नेतृत्व का अंत

राजनीति में हर छोटी बात का महत्व होता है। यह अनुभव से ही आता है। गुजरात विधानसभा के चुनावों में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर ही तो कहा था। इस छोटी सी बात से गुजरात में कांग्रेस की लुटिया डूब गई। चुनाव जब शुरू हुआ था तो कांग्रेस का ग्राफ चढ़ा हुआ था और दिल्ली के सारे सेक्युलर ठेकेदार ताल ठोककर कह रहे थे कि इस बार मोदी नप जाएंगे। चुनावी सर्वेक्षण भी कुछ इसी तरह के आ रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी बुखार चढ़ा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मौत के सौदागर जैसी छोटी-छोटी गलतियां करती चली गई और आखिर में कांग्रेस बुरी तरह लुढ़क गई। सोनिया गांधी को तो अपनी गलती का अहसास हो गया होगा, लेकिन उनके इर्द-गिर्द चापलूसों का जो जमावड़ा खड़ा हो गया है उसने वक्त रहते गलती सुधारने नहीं दी।

अर्जुन सिंह का जहर बुझा तीर फिर फुस्स

घी हर किसी को हजम नहीं होता। पर कई होते हैं, जो इंसान को भी कच्चा चबा जाएं। डकार भी न लें। अपन आज राजनीति के दो महारथियों की बात करेंगे। पी. चिदंबरम। जिनने ताजा बढ़ी महंगाई पर कहा- 'इतनी भी नहीं बढ़ी। चीखने-चिल्लाने की जरूरत नहीं।' दूसरे- अर्जुन सिंह। जिनका सितारा गर्दिश में। हताश अर्जुन को पिछले महीने बताया गया था- सोनिया-राहुल की चापलूसी से बाज आएं। तो अबके अर्जुन ने अपनी कमान से नया तीर निकाला। उनने सीधा सोनिया पर निशाना साध दिया। बोले- 'हाईकमान सलाह मशविरे से फैसले नहीं ले रहा। इसलिए कांग्रेस में मुश्किल-दर-मुश्किल।' अपन अर्जुन के जहर बुझे राजनीतिक तीरों से वाकिफ।

बूटा सिंह गए, तो अंबूमणि क्यों रहें

अपन को पहले से पता था- 'डा. वेणुगोपाल कोर्ट में जीत जाएंगे।' हेल्थ मिनिस्टर अंबूमणि रामदौस दो साल से हाथ धोकर पीछे पड़े थे। अंबूमणि जैसे ही नई साजिश रचते। अरुण जेटली अदालत से वेणुगोपाल को राहत दिला लाते। अंबूमणि जब अदालतों से थक-हार गए। तो नवंबर में एम्स डायरेक्टर की उम्र पर नया कानून बनवा दिया। कानून था- पैंसठ साल की उम्र तक ही कोई डायरेक्टर हो सकेगा। वेणुगोपाल हो गए थे पैंसठ के। एनडीए राज में हेल्थ मिनिस्टर रही सुषमा स्वराज ने संसद में कहा था- 'यह बिल सिर्फ वेणुगोपाल के खिलाफ व्यक्तिगत दुर्भावना से लाया गया।' अब सुप्रीम कोर्ट ने सुषमा की कही बात सच साबित की। अदालत ने कानून को रद्द कर दिया। वेणुगोपाल बहाल हो गए। रामगोपाल वर्मा की एक फिल्म आई थी- 'अब तक छप्पन।' तो अब वेणुगोपाल के एम्स में 'अब सिर्फ छप्पन।'

चावला के खिलाफ बीजेपी का केस और पुख्ता हुआ

चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ बीजेपी का केस अब और मजबूत। बीजेपी ने पिछले साल सात अगस्तElection Commissioner Navin B Chawla को चावला को हटाने की अर्जी लगाई थी। बीजेपी का आरोप था- 'नवीन चावला कांग्रेस के हाथों की कठपुतली। वह सोनिया गांधी के करीबी। सो निष्पक्ष होकर काम नहीं कर सकते।' यों नवीन चावला की इंदिरा परिवार से नजदीकी बहुत पुरानी। इमरजेंसी में चावला काफी विवादों में रहे। इमरजेंसी के अत्याचारों की जांच हुई। तो शाह कमिशन ने चावला का काफी जिक्र किया। नजदीकी का ताजा सबूत सत्रह फरवरी 2006 को सामने आया। जब खुलासा हुआ- 'कांग्रेस के पांच सांसदों ने चावला की बीवी रूपिका के ट्रस्ट को सांसद निधि से फंड दिया।'

अब फिर कभी महिला बिल लाने की जरूरत नहीं

सोचो, राज्यसभा न होती। लोकसभा होती। तो सोमनाथ चटर्जी क्या करते। राज्यसभा में मंगलवार को जो हुआ। लोकसभा में तो 24 और 28 अप्रेल को कुछ भी नहीं था। दादा ने फिर भी 32 सांसदों पर फंदा लगा दिया था। तो बात राज्यसभा की। हंगामे, नारेबाजी, धक्का-मुक्की के बीच महिला आरक्षण बिल पेश हो गया। यूपीए का काम खत्म। चार दिन पहले जिक्र तक नहीं था। आखिर इसकी अचानक जरूरत क्यों पड़ी? कहीं मिड टर्म पोल की घंटी तो नहीं बजने वाली। अपन ने दो मार्च को लिखा था- 'जून में भंग तो नहीं हो जाएगी लोकसभा।' यों एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट मीटिंग एक बार फिर बेनतीजा रही। अपन को इस पहेली की समझ नहीं आई।

तो स्पीकर ने टकराव टाल किया सत्रावसान

एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट मीटिंग से पहले सत्रावसान हो जाए। कांग्रेस तो यह पहले से चाहती थी। तीस अप्रेल को लोकसभा निपटाने की तैयारी थी। दो मई नहीं, तो पांच मई को राज्यसभा। पर कम्युनिस्ट नहीं माने। तो नौ तक सत्र चलाने का फैसला हुआ। अपन ने तीस अप्रेल को लिखा था- 'लोकसभा का काम तो निपट गया। राज्यसभा का एक-आध दिन का बाकी। कांग्रेस ने नौ तक सत्र की मुसीबत बिना वजह मोल ली।' पर कांग्रेस की मुसीबत उस समय टल गई। जब सोमनाथ चटर्जी ने एनडीए से टकराव मोल ले लिया। स्पीकर को अपना फैसला तो वापस लेना ही पड़ा।

खाद्यान्न समस्या का दूसरा पहलू


अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत के नव धनाढय मध्यम आय वर्ग को पेटू बताकर कुछ नया नहीं कहा। यही बात भारत के मंत्री प्रफुल्ल पटेल पहले ही कह चुके हैं।

बड़े पेट के भरन को है रहीम देख बाढ़ि
यातें हाथी हहरि कै दप दा दांत दे काढ़ि

कविवर रहीम कहे हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दु:ख अधिक दिन तक छुपा नहीं सकता। क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है, जब उसके रहन-सहन में गिरावट आने लगती है तो उसके दु:ख का फौरन पता चल जाता है। हाथी के दो दांत इसलिए बाहर निकले होते हैं, क्योंकि वह अपनी भूख बर्दास्त नहीं कर सकता। एक ब्लाग पर पढ़ा रहीम का यह दोहा अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर हू-ब-हू लागू होता है।

क्या रोज-रोज महंगाई का घिसा-पिटा सवाल पूछते हो

अपन बेटी को रेलवे स्टेशन छोड़ने गए। तो वहां पर जाकर पता चला। वह कंटेक्ट लैंस की डिब्बी भूल आई। अपन ने सोचा मार्केट से खरीदकर नई दे देंगे। सो अपन मार्केट में घुसे। तो पता चला दिल्ली में हड़ताल थी। महंगाई के खिलाफ शुक्रवार को पूरे देश में हड़ताल रही। दिल्ली पर तो महंगाई का सबसे ज्यादा असर। वैसे हर बंदे को अपनी थाली का लड्डू छोटा लगता है। सो अपन को दिल्ली की महंगाई सबसे ज्यादा लगती है। अपन यह नहीं कहते- देश की बाकी जगहों पर महंगाई कम। ऐसा होता- तो केरल, असम, मेघालय जैसे राज्यों में हड़ताल इतनी सफल नहीं होती। अपन ने इन जगहों का नाम जान-बूझकर लिखा। वरना राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, यूपी, एमपी, एचपी, जेके में भी हड़ताल कम सफल नहीं हुई।

अब स्पीकर-विपक्ष में टकराव का नया एजेंडा

टीआर बालू के मुद्दे पर टकराव अभी थमा नहीं। सोमवार को राज्यसभा में तो घमासान होगा ही। विपक्ष ने मुरली देवड़ा का बयान कबूल नहीं किया। यों भी मुरली देवड़ा विशेषाधिकार हनन के लफड़े में फंस चुके। सदन में बयान बाद में आया। अखबारों में पहले छप गया। सो अपने बिहार वाले दिग्विजय सिंह ने नोटिस दे दिया। यों देवड़ा सदन में तो बोल ही नहीं पाए। लिखा हुआ बयान टेबल करना पड़ा। अपन ने तो उस दिन लिखा ही था- 'मुरली देवड़ा का बयान अंत नहीं होगा। वहां से तो सिर्फ शुरूआत होगी।' विपक्ष मनमोहन से जवाब मांग रहा है। मनमोहन ने भी वही गलती की। वह बुधवार की रात अपने घर पर मीडिया से बोले। संसद में नहीं बोले। यह भी संसद की अवमानना। पर अवमानना का सबसे बड़ा सवाल तो लोकसभा में। जहां अपने स्पीकर दादा सोमनाथ चटर्जी ने नया मोर्चा खोल लिया। सवाल वहां भी बालू-मनमोहन के खिलाफ नारेबाजी का। याद होगा, जब 28 अप्रेल को दादा ने सदन की बिजली गुल कराई।