April 2008

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सोनिया-मनमोहन पर लेफ्ट-बीजेपी के हमले

टी.आर. बालू के मुद्दे पर कांग्रेस का हाल सरुपनखा जैसा। जवाब देते नहीं बन पा रहा। सोमवार को अभिषेक मनु सिंघवी के पसीने छूटे। तो मंगलवार को जयंती नटराजन की हालत खराब हुई। किसी एक सवाल का जवाब नहीं दे पाईं। मुंह पर जैसे ताला लग गया हो। संसद में पांचवें दिन भी मुद्दा छाया रहा। आडवाणी ने पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में कहा- 'यह दागी मंत्रियों की सरकार है। पीएम बालू के मामले पर चुप्पी नहीं साध सकते। कुनबापरस्ती पर बालू को इस्तीफा देना चाहिए। बीजेपी शुक्रवार को मंहगाई के साथ बालू का मुद्दा भी उठाएगी।' अपने राजनाथ सिंह तमिलनाडु में जाकर बोले- 'प्रधानमंत्री संसद में जवाब दें।' पर संसद में बीजेपी ने इसे दमदार ढंग से नहीं उठाया। जयललिता के चार सांसद खड़े हुए। तो बीजेपी साथ देती जरूर दिखी।

संसद के भीतर बालू पर टकराव, बाहर करार पर

अपन को शरद पवार बता रहे थे- 'सत्र समय पर खत्म होगा। बीएसी में आठ तक का एजेंडा तय।' पर बगल में खड़े अबनी रॉय ने टोका। बोले- 'सरकार की तैयारी तीस को निपटाने की।' वैसे एजेंडे पर महिला आरक्षण जैसी कोई बड़ी बात नहीं। पर सरकार के लिए आठ तक लेफ्ट का विरोध झेलना मुश्किल। छह को एटमी करार पर यूपीए- लेफ्ट मीटिंग। जब दिल्ली में मीटिंग हो रही होगी। तब आईएईए से सेफगार्ड पर डील हो रही होगी। बकौल अरुण शौरी आईएईए से डील का ड्रॉफ्ट तैयार। आठ मई तक मुहर लग जाएगी। सो लेफ्ट को वक्त से पहले सत्रावसान कतई कबूल नहीं। यों सोमनाथ चटर्जी से पूछोगे। तो वह चाहेंगे- कल का होता आज हो। कोई दिन ऐसा नहीं जाता। जब दादा गुस्से में आपा न खोएं।

लूट मची है लूट, लूट सके तो लूट

टी.आर. बालू ने तो बिना राग-द्वेष के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने की शपथ का उल्लंघन किया ही है। टी.आर. बालू के परिवार की बंद पड़ी और फर्जी कंपनियों को कौड़ियों के भाव सीएनजी दिलवाने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दिलचस्पी से सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल खड़ा होता है।

''मैं टी.आर. बालू ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूं कि कानून द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रध्दा व निष्ठा बनाए रखूंगा। मैं भारत की एकता और अखंडता अक्षुण बनाए रखूंगा। मैं केंद्र में मंत्री के नाते अपने अंत:करण और पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निवर्हन करूंगा। संविधान और कानून के मुताबिक बिना किसी डर, पक्षपात, राग या द्वेष सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करूंगा।'' यह शपथ टी.आर. बालू ने केंद्र में मंत्री बनते समय ली थी। यही शपथ बालू से ठीक पहले मनमोहन सिंह ने भी ली थी। लेकिन पिछले चार साल से टी.आर. बालू लगातार अपनी पारिवारिक कंपनियों को कोड़ियों के भाव सीएनजी उपलब्ध करवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं और केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

राग-द्वेष करते रंगे हाथों पकड़े गए बालू-मनमोहन

टी. आर. बालू मंत्री पद का दुरुपयोग करते रंगे हाथों पकड़े गए। मनमोहन सिंह भी बालू की तरफदारी करते रंगे हाथों पकड़े गए। मनमोहन सिंह ने शपथ ली थी- 'बिना राग-द्वेष के जिम्मेदारी का निवर्हन करूंगा।' कोई और देश होता। तो कम से कम टी. आर. बालू का इस्तीफा हो जाता। अपने यहां तो राजनीति अब अपना घर भरने का जरिया बन गई। इसीलिए रंगे हाथों पकड़े गए। तो बालू ने कहा- 'इसमें मैंने गलत क्या किया।' तो अपन याद दिला दें उनने क्या गलत किया। प्रताप सिंह कैरो ने भी यही किया था। दास कमीशन ने परिजनों को फायदा पहुंचाने का दोषी पाया। तो कैरो को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। पर अब मंत्री अपने बेटों को फायदा पहुंचाने पर भरी संसद में कहता है- 'मैने सिफारिश करके क्या गलत किया।' मनमोहन खुद सिफारिशी चिट्ठियां लिखते हैं। मनमोहन को भी लोक-लाज का डर नहीं। पहले तो अपने पीएम ही राजनीतिज्ञ नहीं थे। अब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी।

विपक्ष का हंगामा हुआ चेयरमेन की रूलिंग पर

काफी दुविधा वाला दिन रहा गुरुवार। तीन-तीन बड़ी घटनाएं हुई। सरबजीत की फांसी टलने के आसार बने। परिवार को कोट लखपत जेल में मिलने दिया गया। फांसी माफी की दूसरी अर्जी लग गई। मुर्शरफ ने हाथों-हाथ अर्जी सरकार को भेज दी। दूसरी बड़ी घटना संसद में हुई। जहाँ एनडीए के सांसदों ने अनौखा प्रदर्शन किया। एनडीए सांसदों ने संसद के भीतर संसद का घेराव किया। आडवाणी समेत सभी अपने गले में बैनर टांगे हुए थे। एक बैनर मजेदार लगा। जिसमें महंगाई के लिए कांग्रेस-कम्युनिस्ट जिम्मेदार बताए गए। असलियत तो यही है। आडवाणी बोले-'इससे बड़ा मौका परस्त गठबंधन और क्या होगा। नीतियां नहीं मिलती। विचारधारा नहीं मिलती। फिर भी एनडीए से डरकर गठबंधन।' सो मौजूदा सरकार के पापों के हिस्सेदार लेफ्टिए भी। पापों का घड़ा उनके सिर भी फूटेगा। पाप सिर्फ आम आदमी का खून चूसने वाली महंगाई का नहीं। अलबत्ता भ्रष्टाचार का भी। तीसरी बड़ी घटना का रिश्ता भ्रष्टाचार से।

तो कानों को सुहाने लगा राग चाटुकारिता

अपने राहुल बाबा में नेताओं के गुण आने लगे। उनका पहला वादा ही काफूर हो गया। अपने यहां नेताओं के वादों पर कहा जाता है- 'वह वादा ही क्या, जो वफा हो जाए।' लगता है अपने राहुल बाबा ने राजनीति का पहला पाठ यही सीखा। मध्यप्रदेश में पहला वादा हवा हुआ। तो दिग्गी राजा गदगद हो गए। उनने कहा- 'राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत।' राजनीति में अपन को दिग्गी राजा जैसा फब्तीबाज और नहीं दिखता। हाजिर जवाबी में कटाक्ष घोलना आसान नहीं। दिग्गी राजा में यह खासियत भरपूर। पर ठहाके लगाने के माहिर दिग्गी राजा ने अपनी महारत राहुल बाबा पर नहीं अपनाई होगी। उनने तो वही राग चाटुकारिता ही बजाया। जो पहले उनके राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह बजा चुके थे। पर पहले बात राहुल बाबा के वादे की। उनने अपने जीवन का पहला वादा मध्यप्रदेश के गांव 'बैसा टपरियन' में किया।

तो आडवाणी ने थामी महाराष्ट्र की महाभारत

अपन ने तो कल को ही लिख दिया था। आडवाणी की बीच बचाव से गोपीनाथ मुंडे दिल्ली आने को राजी। मुंडे तो सोमवार की रात ही आ जाते। पर फ्लाइट के चक्कर में नहीं आ पाए। मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे। तो सीधे आडवाणी के घर गए। मुंडे ने राजनाथ से नाराजगी के पूरे सबूत दिए। यों फारमेल्टी के लिए बाद में राजनाथ से मिले जरुर। पर मुंडे ने आडवाणी को पहले ही कह दिया था- 'बात आपसे ही करुंगा।' सो दिनभर बैठकों का दौर आडवाणी के घर ही चला। आडवाणी के सिपाहसलार वेकैंया नायडु भी दिनभर डटे रहे। यानी झगड़े निपटाने का जिम्मा आडवाणी कैंप ने संभाला। राजनाथ कैंप को मुंह की खानी पड़ी। यों राजनाथ सिंह ने सोमवार को ही हथियार डाल दिए थे। शाम को कोर कमेटी शुरु हुई। तब तक राजनाथ की हवाईयां उडी थी।

गोपीनाथ मुंडे ने कर दिया आलाकमान का कुंडा

पटना से लेकर दिल्ली तक। बेंगलुरू से लेकर मुंबई तक। बीजेपी में बगावती तेवर दिखने लगे। कर्नाटक में अनंत कुमार के खिलाफ। टिकटों की बंदरबांट पर। बिहार में सुशील मोदी के खिलाफ। चंपुओं को मंत्री बनवाने पर। महाराष्ट्र में बाल आप्टे के खिलाफ। मुंडे विरोधी साजिश पर। तो दिल्ली में आरती मेहरा को फिर से मेयर बनाने पर। यों सब मामलों में राजनाथ सिंह निशाने पर । ऊपर से हवाई नेता विजय गोयल को महासचिव बनाने का फैसला। गोयल के जुगाड़ पर सब हैरत में। गोयल पीएम दफ्तर में राज्यमंत्री बने। तो पार्टी में बवाल मचा था। अमृतसर की वर्किंग कमेटी में हल्ला होता। इससे पहली रात ही वाजपेयी ने गोयल के पर कुतर दिए। तब जाकर बवाल थमा। गोयल के मंत्री बनने पर ही पार्टी में गुस्सा था। कोई कहता- चंपु को बना दिया। तो कोई कहता- सब्जी का झोला उठाने का फायदा मिला।

चाटुकारिता तो कांग्रेस की राजनीति का गहना

सोनिया गांधी इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं। कांग्रेस की राजनीति चाटुकारिता आधारित है इसीलिए तो पार्टी में परिवारवाद चल रहा है।

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी जितनी तवज्जो दे रही है इतनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं मिल रही। अब तक तो कांग्रेस के पोस्टर बैनरों पर सोनिया गांधी के साथ कहीं कभी कभी मनमोहन सिंह का फोटो दिखाई भी दे जाता था। लेकिन राहुल गांधी को पार्टी महासचिव बनाए जाने के बाद मनमोहन सिंह एकदम गायब हो गए हैं। कांग्रेस में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद दूसरा स्थान राहुल ने हासिल कर लिया है और मनमोहन तीसरे स्थान पर चले गए हैं। तीसरे स्तर के नेता को पार्टी में जितना महत्व मिलना चाहिए, उतना ही मिल रहा है।

तो राजनीति का अखाड़ा बने रोजगार योजना

तो राहुल यूपी में अखाड़ा जमाने को तैयार। किसी भी राजनीतिक नेता के लिए संघर्ष जरूरी। राहुल संघर्ष के लिए मैदान में उतरे। तो इसकी तारीफ होनी चाहिए। आखिर यूपी में कांग्रेस जड़ों से कट चुकी। राहुल बाबा संघर्ष नहीं करेंगे। तो चेहरे को देखकर वोट नहीं मिलने। यह बात हाल ही के उपचुनावों में साफ हो गई। राहुल बाबा की तारीफ करनी चाहिए। चुनाव नतीजों से हिम्मत नहीं हारी। संघर्ष की रफ्तार और तेज कर दी। राहुल बाबा शुक्रवार को झांसी में डिविजनल कमिश्नर के सामने धरने पर बैठे। तो अपन को इंदिरा गांधी का वह संघर्ष याद आ गया। जब उनने जनता राज में अलख जगा दी थी। बिहार में दलितों का नरसंहार हुआ। तो इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर वेलची गई थी। इंदिरा गांधी की हाथी पर चढ़ी वह फोटू दुनियाभर में मशहूर हुई।