April 2008

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कैबिनेट का हुआ फेरबदल, पर खड़े हुए कई सवाल

आखिर हो ही गया मंत्रिमंडल में फेरबदल। छह मंत्रियों की छुट्टी हुई। सात की शपथ। पर सबको खुश नहीं कर पाई सोनिया। अलबत्ता खुश कम हुए, नाराज ज्यादा। पहले अपन जाने वालों की बात करें। अपने सुरेश पचौरी का राज्य सभा सीट में जुगाड़ नहीं बना। सो पचौरी को जाना ही था। पचौरी का राज्य सभा का जुगाड़ लग जाता। तो प्रियरंजन दासमुंशी की तरह मंत्री भी रह जाते। पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने। तो दासमुंशी भी पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष बने। सो पार्टी की जिम्मेदारी से मंत्री पद का कुछ लेना देना नहीं। सोनिया तो राहुल बाबा को भी मंत्री बनाना चाहती थी। पर राहुल बाबा डबल जिम्मेदारी से बचे। पार्टी महासचिव का बोझ कोई कम नहीं। एक व्यक्ति, एक पद का सिध्दांत अब काफूर। नरसिंहराव ने बनाया था यह सिध्दांत । वैसे तो यह सिध्दांत बंगाल में पहले भी लागू नहीं था। अपने प्रणव दा मंत्री भी थे, प्रदेश अध्यक्ष भी। पर राहुल बाबा की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा।

कौन मानता है तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग

तिब्बत और जम्मू कश्मीर पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की दो महान गलतियां हमारी कूटनीतिक अपरिपक्वता का पीछा नहीं छोड़ रही। राजा हरि सिंह शुरू में जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र रखने के पक्ष में थे। लेकिन पाकिस्तान ने कबायलियों को आगे करके कश्मीर पर कब्जे की कोशिश शुरू की तो राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और विभिन्न नेताओं के दखल से कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। गृहमंत्री सरदार पटेल ने पाकिस्तान की ओर से हड़पा हुआ क्षेत्र वापस लेने के लिए फौज भिजवा दी थी, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने माउंटबेटेन की सलाह पर यह मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया। जिसमें ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत का साथ नहीं दिया, अलबत्ता जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का फैसला करवा दिया। तब से हड़पा हुआ जम्मू कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है।

आम आदमी का तो बज गया बाजा

महंगाई एक सीढ़ी और चढ़ गई। तो अपने अभिषेक मनु सिंघवी बोले- 'हमारे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं।' यानी कांग्रेस ने हाथ खड़े कर लिए। सोनिया गांधी ने राजस्थान में कहा- 'महंगाई रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारें लें।' इसका मतलब भी था- केंद्र और कांग्रेस का हाथ खड़े करना। अभिषेक मनु सिंघवी सही समझे। तभी तो कहा- हमारे पास जादू की छड़ी नहीं। सच्ची बात से चिड़ जाते हैं अपने सिंघवी। पिछले हफ्ते कह रहे थे- महंगाई जल्द काबू आएगी। हुआ उल्टा। इस हफ्ते आया आंकड़ा तो धुआं निकाल गया। यों अपन आंकड़ेबाजी पर न भी जाएं। तो भी आम आदमी का जीना दूभर। आंकड़े तो सिर्फ दिखाने के सबूत। महंगाई का ताजा आंकडा 22 मार्च तक का। जिसके मुताबिक मुद्रास्फीति सात फीसदी हो गई। अगले हफ्ते सात फीसदी भी पार होगी।

कंधार और हजरतबल यानी हमाम में दोनों नंगे

आडवाणी की लोकप्रियता बढ़ी या घटी। यह हिसाब तो एनडीए लगाए। नफा-नुकसान एनडीए का ही होगा। आडवाणी ने अपनी किताब से इतने विवाद खड़े नहीं किए। जितने किताब की प्रमोशन में दिए इंटरव्यू से। एनडीटीवी का 'वाक दि टाक' तो गले का फंदा बन गया। 'वाक दि टाक' को भी इतनी मशहूरी किसी और नेता ने नहीं दी। जितनी संघ परिवार के दो नेताओं ने। संघ प्रमुख सुदर्शन ने 'वाक दि टाक' में ही अटल-आडवाणी से इस्तीफा मांगा था। अब आडवाणी ने जसवंत सिंह की कंधार यात्रा से पल्ला झाड़ा। तो सवालों की बौछार शुरू हो गई। सोनिया अब तक चुप थी। वह गुरुवार को राजस्थान में जाकर बोली। पहले अपनी वसुंधरा ने सुंधा माता, हिंगलाज माता, गोलासन हनुमान जी से आशीर्वाद ले चुनावी डुगडुगी बजाई। अब सोनिया ने सोम-माही-जाखम नदियों के संगम वेणेश्वर धाम में जाकर अलख जगाई।

सिमी पर गाज से खुलेंगे राजनीतिक संबंधों के राज

मुलायम-सोनिया साथ-साथ होंगे। तो सिमी का संकट काफी हद तक कम होगा। मुलायम तो खुल्लमखुल्ला सिमी समर्थन करते रहे। अब जब इंदौर में सिमी आतंकियों पर गाज गिरी। तो कई कांग्रेसी दिग्गजों की पोल भी खुलेगी। मुलायम-सोनिया की जुगलबंदी का अपन अंदाज नहीं लगा रहे। अलबत्ता केंद्र ने सीबीआई को मुलायम के खिलाफ जांच की इजाजत नहीं दी। समझदारों को इशारा काफी। मायावती जब सोनिया के साथ थी। तो ताज कोरिडोर घोटाला दबाने की कोशिश हुई। अब मुलायम को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की कोशिश। अपने बुजुर्ग एक भी कहावत बेसिर-पैर की नहीं कह गए। चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत को ही लो। फिट बैठेगी। एक और कहावत याद करिए। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। माया-मुलायम की दुश्मनी जगजाहिर।

कांग्रेस का हाथ आम आदमी की गर्दन पर

पी. चिदंबरम ने सोनिया का सारा खेल बिगाड़ दिया। अभी तो किसानों के कर्ज माफ नहीं हुए। अभी तो छटे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हुई। महंगाई का फन कांग्रेस को डसना शुरू हो चुका। दोनों कदमों से कांग्रेस को चुनावी उम्मीद थी। अब दोनों कदमों से महंगाई और बढ़ेगी। जब छटे वेतन आयोग की सिफारिश लागू हुई। तो अपन ने 25 मार्च को लिखा ही था- 'तनख्वाहें बढ़ेंगी तो जीना होगा और हराम।' कांग्रेस के दफ्तर में अब यही डर सताने लगा। पर सोनिया को अब कर्नाटक का डर। कर्नाटक के चुनावों का एलान बस आज-कल में। बारह-सत्रह नहीं तो सोलह-इक्कीस समझिए। चुनाव मई में ही होंगे। अब कांग्रेसी चिदंबरम के कुप्रबंधन को कोसने लगे। चिदंबरम का लोकलुभावन बजट आया। तो सोनिया बाग-ओ-बाग थी। राहुल को बजट पर बहस में उतारा गया। चिदंबरम ने राहुल की बातों पर गौर नहीं किया।

कांग्रेस बोली लेफ्ट से- 'चीन की महंगाई भी देख लो'

यह जहाज डूबता देख चूहों के भागने वाली बात नहीं। पर सरकारी नाव कूटनीतिक और आर्थिक झंझावत में फंस तो गई। एक तरफ तिब्बत के मुद्दे पर चीन के सामने घुटने टेकना। माफ कीजिएगा- वाजपेयी सरकार ने भी घुटने टेके थे। दूसरी तरफ एटमी करार पर अमेरिका के सामने। यह तो रही कूटनीति के तूफान में फंसने की बात। आर्थिक मुद्दे पर भी मनमोहन-चिदंबरम दोनों फेल। सरकार जब बनी थी। तो अपन ने तभी लिखा था- 'आर्थिक और कूटनीतिक मुद्दों पर लेफ्ट से होगा टकराव।' अब देख लो- महंगाई और एटमी करार पर इसी महीने का अल्टीमेटम। एटमी करार सरका। तो सरकार गिरेगी। महंगाई पर भी पंद्रह अप्रेल तक का नोटिस। ऐसे में मनमोहन के प्रेस सलाहकार संजय बारू का यह फैसला। जी हां, बारू ने इस्तीफा दे दिया। इसे कहते हैं बुरे वक्त में साथ छोड़ जाना। यों जुलाई तक रहेंगे। पर जहाज डूबने के बाद कौन पूछेगा। सो अभी सिंगापुर की एक युनिवर्सिटी में नौकरी का जुगाड़ कर लिया।