April 2008

एक मशाल तिब्बतियों की आजादी के लिए भी

सुरेश कलमाड़ी की राजनीतिक दुकान नहीं चली। राहुल गांधी तो क्या। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट भी नहीं आए। ओलंपिक मशाल को राजनीतिक अखाड़ा बनाने पर तुले थे सुरेश कलमाड़ी। अपने यहां खेलों पर राजनीतिज्ञों का कब्जा भी लाजवाब। फुटबॉल पर कब्जा प्रियरंजन दासमुंशी का। हॉकी पर कब्जा के.पी.एस. गिल का। तीरंदाजी पर कब्जा विजय कुमार मल्होत्रा का। क्रिकेट पर कब्जा शरद पवार का। और भारतीय ओलंपिक संघ पर कब्जा सुरेश कलमाड़ी का। जो राष्ट्रवादी कांग्रेस से होकर दुबारा सोनिया कांग्रेस में आ चुके। सो उनने ओलंपिक मशाल के बहाने चाटुकारिता का मौका देखा। तो राहुल गांधी को न्यौता दे डाला। राहुल के साथ चार-पांच युवा सांसदों का नाम भी लिया। पर उनमें कोई गैर कांग्रेसी नहीं था।

जादू की छड़ी नहीं, तो जनता मारेगी छड़ी से

यूपी-एमपी में कांग्रेस को जोरदार झटका धीरे से लगा। बेतूल में भले ही बीजेपी डेढ़ लाख की बजाए सिर्फ पैंतीस हजार से जीती। पर कमलनाथ-पचौरी-सिंधिया नाक की लड़ाई लड़ रहे थे। यूपी में तो कांग्रेस की और गत बनी। लोकसभा की दोनों सीटें मायावती ले उड़ी। विधानसभा की तीनों सीटें भी। कांग्रेस कहीं दूसरे नंबर पर भी नहीं आई। अर्जुन सिंह को अब समझ आया होगा। चले थे राहुल बाबा को पीएम बनवाने। राहुल के दलित की झोपड़ी में सोने का असर नहीं हुआ। सबने इसे राजनीति के घड़ियाली आंसू माना। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद से यूपी-एमपी में कांग्रेस की गत पर पूछा। तो बोले- 'यूपी का नाम मत लो। वहां तो हम थे ही नहीं। हम उड़ीसा-बंगाल में जीते। उस पर क्यों नहीं पूछते।' यही है कांग्रेस की मीठा-मीठा सुनने की संस्कृति। चापलूसी की संस्कृति। पर अर्जुन ने राहुल को पीएम बनाने की बात क्या कही। सोनिया का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

सच की खोज में निकली एक बेटी

प्रियंका अपने पिता राजीव की हत्या में सजायाफ्ता नलिनी से मिली। यह मुलाकात 19 मार्च को हुई। खुफिया एजेंसियों आईबी-रॉ ने मुलाकात का बंदोबस्त किया। खुफिया मुलाकात का राज नहीं खुलता। अगर चेन्नई का वकील डी राजकुमार आरटीआई के तहत खुलासा न मांगता। मानव बम बनने वाली धनु मौके पर ही मारी गई थी। फोटू खींच रहा हरि बाबू भी विस्फोट में मारा गया। श्रीनिवासन और शुभा बेंगलुरु में पकड़े गए। तो खुद को गोली मार ली थी। चारों नलिनी के पति मरुगन के दोस्त थे। नलिनी खुद भी उस हादसे के समय मौजूद थी। पहले सोनिया ने नलिनी की फांसी की सजा माफ कराई। अब प्रियंका की नलिनी से मुलाकात। राज खुला, तो प्रियंका बोली- 'मैं अपने पिता की हत्या से जुड़े सच को जानने गई थी।' राहुल अपनी बहन से सहमत नहीं।

गालिब उठो, सलाम करो लेफ्ट का जुलूस आया है

विपक्ष को फिक्र मंहगाई की। तो कांग्रेसपरस्तों को फिक्र राहुल की। सोमवार को नया बवाल खड़ा हुआ। किसी कांग्रेसी ने नहीं कहा- 'सोनिया-मनमोहन नहीं, अलबत्ता आडवाणी के मुकाबले राहुल को प्रोजैक्ट किया जाए।' पर खबरची पहुंच गए राहुल को प्रोजैक्ट करने का एजेंडा लेकर। ओबीसी आरक्षण के बाद अर्जुन आजकल मीडिया के चहेते। सो सवाल हुआ- 'क्या राहुल गांधी को चुनाव में प्रोजैक्ट किया जाना चाहिए?' सोचो, अर्जुन सिंह क्या जवाब दे सकते थे। यों ही अर्जुन परिवार के भक्त। सो उनने कहा- 'इसमें बुराई क्या है।' उनने अपनी तरफ से राहुलबाजी नहीं की। जब शरद पवार का बयान बताकर पूछा- 'उनने कहा है, मनमोहन के रहनुमाई में चुनाव लड़ा जाए।' तो अर्जुन बोले- 'कई व्यक्तिगत राय हैं। यूपीए को तय करना है। मेरी कोई राय नहीं। जो पार्टी की राय होगी। वही मेरी राय होगी।' पर सबसे टेढ़ा सवाल आडवाणी की काट का नहीं। जैसा कम्युनिस्टों ने तिब्बत के बारे में कहा- 'यह कांग्रेस का अंदरुनी मामला।'

आरक्षण पर अभी खत्म नहीं हुआ टकराव

सीमित अंकों की छूट, क्रीमी लेयर, पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश पर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव के आसार कांग्रेस को ऊंची जातियों के मध्यम वर्ग की नाराजगी का डर सताने लगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए किए गए 93वे संविधान संशोधन को उचित ठहराकर कांग्रेस की अर्जुन सिंह खेमे को ताकत दी है। दूसरी तरफ संविधान संशोधन के समय पूरी तरह भ्रांति में रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग के जरिए देश की प्रतिभाओं को उभारने की मुहिम को धक्का लगा है। यह कहना कि कांग्रेस में पिछड़ी जातियों को शिक्षा में आरक्षण को लेकर एकमत था, ठीक नहीं होगा। पिछड़ा वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक नहीं है, अलबत्ता अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक जरूर कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं।

मुद्रा स्फीति में भाजपाई हाथ दिखा लालू को

क्यों अपन ने पांच अप्रेल को सही लिखा था ना- 'अगले हफ्ते मुद्रास्फीति सात फीसदी भी पार होगी।' तो ताजा आंकड़ा 7.41 फीसदी। आटा, चावल, तेल, सब्जियां सब सातवें आसमान से पार। सीमेंट की कीमतें क्यों बढ़ी? क्या कमलनाथ नहीं जानते। स्टील के दाम क्यों बढ़े? क्या पासवान नहीं जानते। सीमेंट-स्टील के उद्योगपति दोनों के दरबार में ही तो बैठे रहते हैं। हर समय सेवा को उतावले। पिछले हफ्ते मुद्रा स्फीति सात फीसदी हुई। तो केबिनेट कमेटी बैठी। अब पूरी केबिनेट बैठी। पर केबिनेट में महंगाई से ज्यादा क्रीमी लेयर पर बवाल हुआ। अपन ने कपिल सिब्बल से पूछा। तो उनने इनकार नहीं किया। पर खुलासा करने से इनकार किया। अंदर क्रीमी लेयर पर जमकर चख-चख हुई। यूपीए के घटक एक तरफ, कांग्रेस एक तरफ। यों कांग्रेस में भी क्रीमी लेयर पर दो धाराएं। एक धारा अर्जुन सिंह की- जो क्रीमी लेयर को भी आरक्षण की हिमायती। दूसरी धारा- मनमोहन सिंह की।

तो इन मलाईदार पिछड़ों को रेवड़ियां बांट रही थी यूपीए

दो साल बाद ही सही। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। ओबीसी को उच्च शिक्षा में आरक्षण के खिलाफ अपन कभी नहीं थे। हां, खिलाफ थे तो ओबीसी की क्रीमी लेयर को आरक्षण के। जो पहले ही खाते-पीते परिवार हों। जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़े हों। आखिर उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण क्यों मिले। सो सुप्रीम कोर्ट का भी वही फैसला आया। सत्ताईस फीसदी आरक्षण तो होगा। पर क्रीमी लेयर वालों को आरक्षण का फायदा नहीं मिलेगा। अब उच्च शिक्षा में आरक्षण 49.5 फीसदी होगा। एससी-एसटी पहले से 22.5 फीसदी आरक्षण पा रहे थे। अपन यह भी बताते जाएं- बीजेपी शुरू से क्रीमी लेयर को आरक्षण के खिलाफ थी। बिल पेश होने से पहले तीन मई 2006 को बीजेपी वर्किंग कमेटी हुई। तो ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव पास हुआ। प्रस्ताव में क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की बात थी। खैर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब इस साल की एडमिशन में रिजर्वेशन मिलेगा। सो कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में फायदे की उम्मीद।

भारत में बढ़ने लगा तिब्बतियों को समर्थन

कांग्रेस के प्रवक्ताओं की भीड़ भद्द पिटा रही थी। तभी चौंकाने वाली खबर आई- 'राहुल बाबा नहीं थामेंगे ओलंपिक मशाल।' अपन राहुल बाबा के फैसले की दाद देंगे। पर ज्यादा भी मत चौंकिए। अपन ने टॉम वड़क्कन से पूछा- 'मशाल नहीं थामने की वजह क्या?' तो उनने कहा- 'फिलहाल मशाल दौड़ में नहीं जाने का फैसला।' अपन जानते हैं- फैसला तिब्बत के समर्थन में नहीं। अपन को तो आज-कल में स्पष्टीकरण की उम्मीद। कहा जाएगा- फैसला एसपीजी सुरक्षा की वजह से हुआ। आखिर राहुल बाबा चीन के लाड़ले। राजीव के चीन दौरे की बीसवीं सालगिरह पर राहुल को न्यौता मिला। रिश्ते की नजाकत को समझिए। वाजपेयी को चीन दौरे की बीसवीं सालगिरह पर न्यौता नहीं मिला। ताकि सनद रहे सो याद दिला दें। वाजपेयी 1978 में चीन गए थे। तब वह मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री थे। यह अलग बात। जो तभी चीन ने कोरिया पर हमला कर दिया। तो वाजपेयी दौरा बीच में छोड़ वापस आ गए।

लालकिला की होड़ में राहुल से आगे आडवाणी

इतिहास में आठ अप्रेल का खास महत्व। अंग्रेजों ने मंगल पाण्डे को इसी दिन फांसी दी। भगत सिंह ने इसी दिन संसद के सेंट्रल हाल में बम फेंके। सो बीजेपी ने 1857 की क्रांति का याददाश्त दिन मनाया। देशभर से पहुंचे 1857 मोटरसाईकिलों का काफिला लालकिला पहुंचा। अपने आडवाणी ने लालकिले से बोलने की रिहर्सल कर ली। बात आडवाणी की चली। तो याद कराएं- भगत सिंह ने संसद में बम फेंका। तो उम्रकैद हुई। आडवाणी ने 'माई कंट्री माई लाइफ' में गलत लिखा। भगत सिंह को बम फेंकने पर फांसी नहीं हुई। अलबत्ता सांडर्स हत्याकांड में फांसी हुई थी। आडवाणी से किताब में कम गलतियां नहीं हुई। अपने सतपाल डांग को मरा हुआ बता दिया। अट्ठासी साल के डांग अभी अमृतसर में मौजूद। पता चला, तो आडवाणी ने फोन कर माफी मांगी। कंधार अपहरण के समय अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलेस्टे से बात हुई। पर लिख दिया- राबर्ट ब्लैकविल। ऑप्रेशन ब्ल्यू स्टार का ठीकरा अपने सिर फोड़ लिया।

बीजेपी को हुआ तिब्बत पर गलती का अहसास

तिब्बत का आंदोलन जोर पकड़ने लगा। सत्रह अप्रेल को ओलंपिक मशाल आएगी। उससे पहले दिल्ली-मुंबई में भिड़ंतें होना तय। फ्रांस की खबर से तो मनमोहन सरकार के तोते उड़ गए। पेरिस में पहुंची मशाल प्रदर्शन के चलते बुझानी पड़ी। बुझी मशाल को बस में रखकर ले जाना पड़ा। अपने खिलाड़ी भाईचुंग भुटिया ने देश को रास्ता दिखाया। तिब्बत के समर्थन में मशाल विरोध का गांधीवादी रास्ता। जिनने मशाल का विरोध नहीं करने का ऐलान किया। वे फ्रांस से सबक लें। मशाल दिल्ली आएगी, तो इंडिया गेट से शुरू होगी। सोमवार को इंडिया गेट पर ही तिब्बत के लिए मोमबत्तियां जली। तो कम्युनिस्ट जल-भुन गए। मनमोहन सरकार के तो कपड़े भीग गए। यों तिब्बत के मामले पर अटल राज भी दूध का धुला नहीं। पर मनमोहन सरकार के तो बुरे हाल। भारत में चीनवादी कम्युनिस्टों के सामने नतमस्तक। तो बीजिंग में चीन सरकार के सामने घुटनेटेक। अपने मनमोहन सिंह बीजिंग गए। तो चीन के राष्ट्रपति तने हुए खड़े थे। अपने मनमोहन भाई झुककर खड़े थे। यह फोटू सोमवार को अपने यशवंत सिन्हा ने दिखाया।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट