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April 2008

कर्नाटक में कांग्रेस को सिर मुड़ाते ही ओले पड़े

अपन को अरुण जेटली बता रहे थे- नेहरू की क्षमता चार सौ सीटों की थी। इंदिरा की घटकर तीन सौ रह गई। राजीव गांधी का 1984 छोड़ दें। तो असली क्षमता ढाई सौ बची थी। सोनिया की क्षमता डेढ़ सौ रह गई। राहुल पचहत्तर-सौ पर टिकेंगे। जेटली कुछ भी कहें। राहुल कांग्रेस के युवराज। भले ही युवराज कहने पर राहुल खुद इनकार करें। पर कांग्रेसी युवराज से कम नहीं मानते। भले ही राहुल की राजनीतिक सूझ-बूझ गड़बड़ाने लगी हो। पर राहुल से पहले प्रियंका की बात। प्रियंका जेल में जाकर पिता की हत्यारिन नलिनी से मिली। तो प्रियंका की भावुकता का ढोल बजाया गया। पर जब मुलाकात का राज खुला। तो अपन ने सोलह अप्रेल को लिखा था- 'पहले सोनिया ने नलिनी को फांसी की सजा माफ कराई। अब प्रियंका की नलिनी से मुलाकात।' अपन ने कोई सवाल नहीं उठाया। पर शक की सुई तो घुमाई ही।

सोनिया-मनमोहन पर लेफ्ट-बीजेपी के हमले

टी.आर. बालू के मुद्दे पर कांग्रेस का हाल सरुपनखा जैसा। जवाब देते नहीं बन पा रहा। सोमवार को अभिषेक मनु सिंघवी के पसीने छूटे। तो मंगलवार को जयंती नटराजन की हालत खराब हुई। किसी एक सवाल का जवाब नहीं दे पाईं। मुंह पर जैसे ताला लग गया हो। संसद में पांचवें दिन भी मुद्दा छाया रहा। आडवाणी ने पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में कहा- 'यह दागी मंत्रियों की सरकार है। पीएम बालू के मामले पर चुप्पी नहीं साध सकते। कुनबापरस्ती पर बालू को इस्तीफा देना चाहिए। बीजेपी शुक्रवार को मंहगाई के साथ बालू का मुद्दा भी उठाएगी।' अपने राजनाथ सिंह तमिलनाडु में जाकर बोले- 'प्रधानमंत्री संसद में जवाब दें।' पर संसद में बीजेपी ने इसे दमदार ढंग से नहीं उठाया। जयललिता के चार सांसद खड़े हुए। तो बीजेपी साथ देती जरूर दिखी।

संसद के भीतर बालू पर टकराव, बाहर करार पर

अपन को शरद पवार बता रहे थे- 'सत्र समय पर खत्म होगा। बीएसी में आठ तक का एजेंडा तय।' पर बगल में खड़े अबनी रॉय ने टोका। बोले- 'सरकार की तैयारी तीस को निपटाने की।' वैसे एजेंडे पर महिला आरक्षण जैसी कोई बड़ी बात नहीं। पर सरकार के लिए आठ तक लेफ्ट का विरोध झेलना मुश्किल। छह को एटमी करार पर यूपीए- लेफ्ट मीटिंग। जब दिल्ली में मीटिंग हो रही होगी। तब आईएईए से सेफगार्ड पर डील हो रही होगी। बकौल अरुण शौरी आईएईए से डील का ड्रॉफ्ट तैयार। आठ मई तक मुहर लग जाएगी। सो लेफ्ट को वक्त से पहले सत्रावसान कतई कबूल नहीं। यों सोमनाथ चटर्जी से पूछोगे। तो वह चाहेंगे- कल का होता आज हो। कोई दिन ऐसा नहीं जाता। जब दादा गुस्से में आपा न खोएं।

लूट मची है लूट, लूट सके तो लूट

टी.आर. बालू ने तो बिना राग-द्वेष के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने की शपथ का उल्लंघन किया ही है। टी.आर. बालू के परिवार की बंद पड़ी और फर्जी कंपनियों को कौड़ियों के भाव सीएनजी दिलवाने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दिलचस्पी से सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल खड़ा होता है।

''मैं टी.आर. बालू ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूं कि कानून द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रध्दा व निष्ठा बनाए रखूंगा। मैं भारत की एकता और अखंडता अक्षुण बनाए रखूंगा। मैं केंद्र में मंत्री के नाते अपने अंत:करण और पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निवर्हन करूंगा। संविधान और कानून के मुताबिक बिना किसी डर, पक्षपात, राग या द्वेष सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करूंगा।'' यह शपथ टी.आर. बालू ने केंद्र में मंत्री बनते समय ली थी। यही शपथ बालू से ठीक पहले मनमोहन सिंह ने भी ली थी। लेकिन पिछले चार साल से टी.आर. बालू लगातार अपनी पारिवारिक कंपनियों को कोड़ियों के भाव सीएनजी उपलब्ध करवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं और केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

राग-द्वेष करते रंगे हाथों पकड़े गए बालू-मनमोहन

टी. आर. बालू मंत्री पद का दुरुपयोग करते रंगे हाथों पकड़े गए। मनमोहन सिंह भी बालू की तरफदारी करते रंगे हाथों पकड़े गए। मनमोहन सिंह ने शपथ ली थी- 'बिना राग-द्वेष के जिम्मेदारी का निवर्हन करूंगा।' कोई और देश होता। तो कम से कम टी. आर. बालू का इस्तीफा हो जाता। अपने यहां तो राजनीति अब अपना घर भरने का जरिया बन गई। इसीलिए रंगे हाथों पकड़े गए। तो बालू ने कहा- 'इसमें मैंने गलत क्या किया।' तो अपन याद दिला दें उनने क्या गलत किया। प्रताप सिंह कैरो ने भी यही किया था। दास कमीशन ने परिजनों को फायदा पहुंचाने का दोषी पाया। तो कैरो को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। पर अब मंत्री अपने बेटों को फायदा पहुंचाने पर भरी संसद में कहता है- 'मैने सिफारिश करके क्या गलत किया।' मनमोहन खुद सिफारिशी चिट्ठियां लिखते हैं। मनमोहन को भी लोक-लाज का डर नहीं। पहले तो अपने पीएम ही राजनीतिज्ञ नहीं थे। अब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी।

विपक्ष का हंगामा हुआ चेयरमेन की रूलिंग पर

काफी दुविधा वाला दिन रहा गुरुवार। तीन-तीन बड़ी घटनाएं हुई। सरबजीत की फांसी टलने के आसार बने। परिवार को कोट लखपत जेल में मिलने दिया गया। फांसी माफी की दूसरी अर्जी लग गई। मुर्शरफ ने हाथों-हाथ अर्जी सरकार को भेज दी। दूसरी बड़ी घटना संसद में हुई। जहाँ एनडीए के सांसदों ने अनौखा प्रदर्शन किया। एनडीए सांसदों ने संसद के भीतर संसद का घेराव किया। आडवाणी समेत सभी अपने गले में बैनर टांगे हुए थे। एक बैनर मजेदार लगा। जिसमें महंगाई के लिए कांग्रेस-कम्युनिस्ट जिम्मेदार बताए गए। असलियत तो यही है। आडवाणी बोले-'इससे बड़ा मौका परस्त गठबंधन और क्या होगा। नीतियां नहीं मिलती। विचारधारा नहीं मिलती। फिर भी एनडीए से डरकर गठबंधन।' सो मौजूदा सरकार के पापों के हिस्सेदार लेफ्टिए भी। पापों का घड़ा उनके सिर भी फूटेगा। पाप सिर्फ आम आदमी का खून चूसने वाली महंगाई का नहीं। अलबत्ता भ्रष्टाचार का भी। तीसरी बड़ी घटना का रिश्ता भ्रष्टाचार से।

तो कानों को सुहाने लगा राग चाटुकारिता

अपने राहुल बाबा में नेताओं के गुण आने लगे। उनका पहला वादा ही काफूर हो गया। अपने यहां नेताओं के वादों पर कहा जाता है- 'वह वादा ही क्या, जो वफा हो जाए।' लगता है अपने राहुल बाबा ने राजनीति का पहला पाठ यही सीखा। मध्यप्रदेश में पहला वादा हवा हुआ। तो दिग्गी राजा गदगद हो गए। उनने कहा- 'राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत।' राजनीति में अपन को दिग्गी राजा जैसा फब्तीबाज और नहीं दिखता। हाजिर जवाबी में कटाक्ष घोलना आसान नहीं। दिग्गी राजा में यह खासियत भरपूर। पर ठहाके लगाने के माहिर दिग्गी राजा ने अपनी महारत राहुल बाबा पर नहीं अपनाई होगी। उनने तो वही राग चाटुकारिता ही बजाया। जो पहले उनके राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह बजा चुके थे। पर पहले बात राहुल बाबा के वादे की। उनने अपने जीवन का पहला वादा मध्यप्रदेश के गांव 'बैसा टपरियन' में किया।

तो आडवाणी ने थामी महाराष्ट्र की महाभारत

अपन ने तो कल को ही लिख दिया था। आडवाणी की बीच बचाव से गोपीनाथ मुंडे दिल्ली आने को राजी। मुंडे तो सोमवार की रात ही आ जाते। पर फ्लाइट के चक्कर में नहीं आ पाए। मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे। तो सीधे आडवाणी के घर गए। मुंडे ने राजनाथ से नाराजगी के पूरे सबूत दिए। यों फारमेल्टी के लिए बाद में राजनाथ से मिले जरुर। पर मुंडे ने आडवाणी को पहले ही कह दिया था- 'बात आपसे ही करुंगा।' सो दिनभर बैठकों का दौर आडवाणी के घर ही चला। आडवाणी के सिपाहसलार वेकैंया नायडु भी दिनभर डटे रहे। यानी झगड़े निपटाने का जिम्मा आडवाणी कैंप ने संभाला। राजनाथ कैंप को मुंह की खानी पड़ी। यों राजनाथ सिंह ने सोमवार को ही हथियार डाल दिए थे। शाम को कोर कमेटी शुरु हुई। तब तक राजनाथ की हवाईयां उडी थी।

गोपीनाथ मुंडे ने कर दिया आलाकमान का कुंडा

पटना से लेकर दिल्ली तक। बेंगलुरू से लेकर मुंबई तक। बीजेपी में बगावती तेवर दिखने लगे। कर्नाटक में अनंत कुमार के खिलाफ। टिकटों की बंदरबांट पर। बिहार में सुशील मोदी के खिलाफ। चंपुओं को मंत्री बनवाने पर। महाराष्ट्र में बाल आप्टे के खिलाफ। मुंडे विरोधी साजिश पर। तो दिल्ली में आरती मेहरा को फिर से मेयर बनाने पर। यों सब मामलों में राजनाथ सिंह निशाने पर । ऊपर से हवाई नेता विजय गोयल को महासचिव बनाने का फैसला। गोयल के जुगाड़ पर सब हैरत में। गोयल पीएम दफ्तर में राज्यमंत्री बने। तो पार्टी में बवाल मचा था। अमृतसर की वर्किंग कमेटी में हल्ला होता। इससे पहली रात ही वाजपेयी ने गोयल के पर कुतर दिए। तब जाकर बवाल थमा। गोयल के मंत्री बनने पर ही पार्टी में गुस्सा था। कोई कहता- चंपु को बना दिया। तो कोई कहता- सब्जी का झोला उठाने का फायदा मिला।

चाटुकारिता तो कांग्रेस की राजनीति का गहना

सोनिया गांधी इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं। कांग्रेस की राजनीति चाटुकारिता आधारित है इसीलिए तो पार्टी में परिवारवाद चल रहा है।

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी जितनी तवज्जो दे रही है इतनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं मिल रही। अब तक तो कांग्रेस के पोस्टर बैनरों पर सोनिया गांधी के साथ कहीं कभी कभी मनमोहन सिंह का फोटो दिखाई भी दे जाता था। लेकिन राहुल गांधी को पार्टी महासचिव बनाए जाने के बाद मनमोहन सिंह एकदम गायब हो गए हैं। कांग्रेस में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद दूसरा स्थान राहुल ने हासिल कर लिया है और मनमोहन तीसरे स्थान पर चले गए हैं। तीसरे स्तर के नेता को पार्टी में जितना महत्व मिलना चाहिए, उतना ही मिल रहा है।

तो राजनीति का अखाड़ा बने रोजगार योजना

तो राहुल यूपी में अखाड़ा जमाने को तैयार। किसी भी राजनीतिक नेता के लिए संघर्ष जरूरी। राहुल संघर्ष के लिए मैदान में उतरे। तो इसकी तारीफ होनी चाहिए। आखिर यूपी में कांग्रेस जड़ों से कट चुकी। राहुल बाबा संघर्ष नहीं करेंगे। तो चेहरे को देखकर वोट नहीं मिलने। यह बात हाल ही के उपचुनावों में साफ हो गई। राहुल बाबा की तारीफ करनी चाहिए। चुनाव नतीजों से हिम्मत नहीं हारी। संघर्ष की रफ्तार और तेज कर दी। राहुल बाबा शुक्रवार को झांसी में डिविजनल कमिश्नर के सामने धरने पर बैठे। तो अपन को इंदिरा गांधी का वह संघर्ष याद आ गया। जब उनने जनता राज में अलख जगा दी थी। बिहार में दलितों का नरसंहार हुआ। तो इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर वेलची गई थी। इंदिरा गांधी की हाथी पर चढ़ी वह फोटू दुनियाभर में मशहूर हुई।

एक मशाल तिब्बतियों की आजादी के लिए भी

सुरेश कलमाड़ी की राजनीतिक दुकान नहीं चली। राहुल गांधी तो क्या। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट भी नहीं आए। ओलंपिक मशाल को राजनीतिक अखाड़ा बनाने पर तुले थे सुरेश कलमाड़ी। अपने यहां खेलों पर राजनीतिज्ञों का कब्जा भी लाजवाब। फुटबॉल पर कब्जा प्रियरंजन दासमुंशी का। हॉकी पर कब्जा के.पी.एस. गिल का। तीरंदाजी पर कब्जा विजय कुमार मल्होत्रा का। क्रिकेट पर कब्जा शरद पवार का। और भारतीय ओलंपिक संघ पर कब्जा सुरेश कलमाड़ी का। जो राष्ट्रवादी कांग्रेस से होकर दुबारा सोनिया कांग्रेस में आ चुके। सो उनने ओलंपिक मशाल के बहाने चाटुकारिता का मौका देखा। तो राहुल गांधी को न्यौता दे डाला। राहुल के साथ चार-पांच युवा सांसदों का नाम भी लिया। पर उनमें कोई गैर कांग्रेसी नहीं था।

जादू की छड़ी नहीं, तो जनता मारेगी छड़ी से

यूपी-एमपी में कांग्रेस को जोरदार झटका धीरे से लगा। बेतूल में भले ही बीजेपी डेढ़ लाख की बजाए सिर्फ पैंतीस हजार से जीती। पर कमलनाथ-पचौरी-सिंधिया नाक की लड़ाई लड़ रहे थे। यूपी में तो कांग्रेस की और गत बनी। लोकसभा की दोनों सीटें मायावती ले उड़ी। विधानसभा की तीनों सीटें भी। कांग्रेस कहीं दूसरे नंबर पर भी नहीं आई। अर्जुन सिंह को अब समझ आया होगा। चले थे राहुल बाबा को पीएम बनवाने। राहुल के दलित की झोपड़ी में सोने का असर नहीं हुआ। सबने इसे राजनीति के घड़ियाली आंसू माना। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद से यूपी-एमपी में कांग्रेस की गत पर पूछा। तो बोले- 'यूपी का नाम मत लो। वहां तो हम थे ही नहीं। हम उड़ीसा-बंगाल में जीते। उस पर क्यों नहीं पूछते।' यही है कांग्रेस की मीठा-मीठा सुनने की संस्कृति। चापलूसी की संस्कृति। पर अर्जुन ने राहुल को पीएम बनाने की बात क्या कही। सोनिया का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

सच की खोज में निकली एक बेटी

प्रियंका अपने पिता राजीव की हत्या में सजायाफ्ता नलिनी से मिली। यह मुलाकात 19 मार्च को हुई। खुफिया एजेंसियों आईबी-रॉ ने मुलाकात का बंदोबस्त किया। खुफिया मुलाकात का राज नहीं खुलता। अगर चेन्नई का वकील डी राजकुमार आरटीआई के तहत खुलासा न मांगता। मानव बम बनने वाली धनु मौके पर ही मारी गई थी। फोटू खींच रहा हरि बाबू भी विस्फोट में मारा गया। श्रीनिवासन और शुभा बेंगलुरु में पकड़े गए। तो खुद को गोली मार ली थी। चारों नलिनी के पति मरुगन के दोस्त थे। नलिनी खुद भी उस हादसे के समय मौजूद थी। पहले सोनिया ने नलिनी की फांसी की सजा माफ कराई। अब प्रियंका की नलिनी से मुलाकात। राज खुला, तो प्रियंका बोली- 'मैं अपने पिता की हत्या से जुड़े सच को जानने गई थी।' राहुल अपनी बहन से सहमत नहीं।

गालिब उठो, सलाम करो लेफ्ट का जुलूस आया है

विपक्ष को फिक्र मंहगाई की। तो कांग्रेसपरस्तों को फिक्र राहुल की। सोमवार को नया बवाल खड़ा हुआ। किसी कांग्रेसी ने नहीं कहा- 'सोनिया-मनमोहन नहीं, अलबत्ता आडवाणी के मुकाबले राहुल को प्रोजैक्ट किया जाए।' पर खबरची पहुंच गए राहुल को प्रोजैक्ट करने का एजेंडा लेकर। ओबीसी आरक्षण के बाद अर्जुन आजकल मीडिया के चहेते। सो सवाल हुआ- 'क्या राहुल गांधी को चुनाव में प्रोजैक्ट किया जाना चाहिए?' सोचो, अर्जुन सिंह क्या जवाब दे सकते थे। यों ही अर्जुन परिवार के भक्त। सो उनने कहा- 'इसमें बुराई क्या है।' उनने अपनी तरफ से राहुलबाजी नहीं की। जब शरद पवार का बयान बताकर पूछा- 'उनने कहा है, मनमोहन के रहनुमाई में चुनाव लड़ा जाए।' तो अर्जुन बोले- 'कई व्यक्तिगत राय हैं। यूपीए को तय करना है। मेरी कोई राय नहीं। जो पार्टी की राय होगी। वही मेरी राय होगी।' पर सबसे टेढ़ा सवाल आडवाणी की काट का नहीं। जैसा कम्युनिस्टों ने तिब्बत के बारे में कहा- 'यह कांग्रेस का अंदरुनी मामला।'

आरक्षण पर अभी खत्म नहीं हुआ टकराव

सीमित अंकों की छूट, क्रीमी लेयर, पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश पर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव के आसार कांग्रेस को ऊंची जातियों के मध्यम वर्ग की नाराजगी का डर सताने लगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए किए गए 93वे संविधान संशोधन को उचित ठहराकर कांग्रेस की अर्जुन सिंह खेमे को ताकत दी है। दूसरी तरफ संविधान संशोधन के समय पूरी तरह भ्रांति में रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग के जरिए देश की प्रतिभाओं को उभारने की मुहिम को धक्का लगा है। यह कहना कि कांग्रेस में पिछड़ी जातियों को शिक्षा में आरक्षण को लेकर एकमत था, ठीक नहीं होगा। पिछड़ा वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक नहीं है, अलबत्ता अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक जरूर कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं।

मुद्रा स्फीति में भाजपाई हाथ दिखा लालू को

क्यों अपन ने पांच अप्रेल को सही लिखा था ना- 'अगले हफ्ते मुद्रास्फीति सात फीसदी भी पार होगी।' तो ताजा आंकड़ा 7.41 फीसदी। आटा, चावल, तेल, सब्जियां सब सातवें आसमान से पार। सीमेंट की कीमतें क्यों बढ़ी? क्या कमलनाथ नहीं जानते। स्टील के दाम क्यों बढ़े? क्या पासवान नहीं जानते। सीमेंट-स्टील के उद्योगपति दोनों के दरबार में ही तो बैठे रहते हैं। हर समय सेवा को उतावले। पिछले हफ्ते मुद्रा स्फीति सात फीसदी हुई। तो केबिनेट कमेटी बैठी। अब पूरी केबिनेट बैठी। पर केबिनेट में महंगाई से ज्यादा क्रीमी लेयर पर बवाल हुआ। अपन ने कपिल सिब्बल से पूछा। तो उनने इनकार नहीं किया। पर खुलासा करने से इनकार किया। अंदर क्रीमी लेयर पर जमकर चख-चख हुई। यूपीए के घटक एक तरफ, कांग्रेस एक तरफ। यों कांग्रेस में भी क्रीमी लेयर पर दो धाराएं। एक धारा अर्जुन सिंह की- जो क्रीमी लेयर को भी आरक्षण की हिमायती। दूसरी धारा- मनमोहन सिंह की।

तो इन मलाईदार पिछड़ों को रेवड़ियां बांट रही थी यूपीए

दो साल बाद ही सही। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। ओबीसी को उच्च शिक्षा में आरक्षण के खिलाफ अपन कभी नहीं थे। हां, खिलाफ थे तो ओबीसी की क्रीमी लेयर को आरक्षण के। जो पहले ही खाते-पीते परिवार हों। जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़े हों। आखिर उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण क्यों मिले। सो सुप्रीम कोर्ट का भी वही फैसला आया। सत्ताईस फीसदी आरक्षण तो होगा। पर क्रीमी लेयर वालों को आरक्षण का फायदा नहीं मिलेगा। अब उच्च शिक्षा में आरक्षण 49.5 फीसदी होगा। एससी-एसटी पहले से 22.5 फीसदी आरक्षण पा रहे थे। अपन यह भी बताते जाएं- बीजेपी शुरू से क्रीमी लेयर को आरक्षण के खिलाफ थी। बिल पेश होने से पहले तीन मई 2006 को बीजेपी वर्किंग कमेटी हुई। तो ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव पास हुआ। प्रस्ताव में क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की बात थी। खैर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब इस साल की एडमिशन में रिजर्वेशन मिलेगा। सो कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में फायदे की उम्मीद।

भारत में बढ़ने लगा तिब्बतियों को समर्थन

कांग्रेस के प्रवक्ताओं की भीड़ भद्द पिटा रही थी। तभी चौंकाने वाली खबर आई- 'राहुल बाबा नहीं थामेंगे ओलंपिक मशाल।' अपन राहुल बाबा के फैसले की दाद देंगे। पर ज्यादा भी मत चौंकिए। अपन ने टॉम वड़क्कन से पूछा- 'मशाल नहीं थामने की वजह क्या?' तो उनने कहा- 'फिलहाल मशाल दौड़ में नहीं जाने का फैसला।' अपन जानते हैं- फैसला तिब्बत के समर्थन में नहीं। अपन को तो आज-कल में स्पष्टीकरण की उम्मीद। कहा जाएगा- फैसला एसपीजी सुरक्षा की वजह से हुआ। आखिर राहुल बाबा चीन के लाड़ले। राजीव के चीन दौरे की बीसवीं सालगिरह पर राहुल को न्यौता मिला। रिश्ते की नजाकत को समझिए। वाजपेयी को चीन दौरे की बीसवीं सालगिरह पर न्यौता नहीं मिला। ताकि सनद रहे सो याद दिला दें। वाजपेयी 1978 में चीन गए थे। तब वह मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री थे। यह अलग बात। जो तभी चीन ने कोरिया पर हमला कर दिया। तो वाजपेयी दौरा बीच में छोड़ वापस आ गए।

लालकिला की होड़ में राहुल से आगे आडवाणी

इतिहास में आठ अप्रेल का खास महत्व। अंग्रेजों ने मंगल पाण्डे को इसी दिन फांसी दी। भगत सिंह ने इसी दिन संसद के सेंट्रल हाल में बम फेंके। सो बीजेपी ने 1857 की क्रांति का याददाश्त दिन मनाया। देशभर से पहुंचे 1857 मोटरसाईकिलों का काफिला लालकिला पहुंचा। अपने आडवाणी ने लालकिले से बोलने की रिहर्सल कर ली। बात आडवाणी की चली। तो याद कराएं- भगत सिंह ने संसद में बम फेंका। तो उम्रकैद हुई। आडवाणी ने 'माई कंट्री माई लाइफ' में गलत लिखा। भगत सिंह को बम फेंकने पर फांसी नहीं हुई। अलबत्ता सांडर्स हत्याकांड में फांसी हुई थी। आडवाणी से किताब में कम गलतियां नहीं हुई। अपने सतपाल डांग को मरा हुआ बता दिया। अट्ठासी साल के डांग अभी अमृतसर में मौजूद। पता चला, तो आडवाणी ने फोन कर माफी मांगी। कंधार अपहरण के समय अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलेस्टे से बात हुई। पर लिख दिया- राबर्ट ब्लैकविल। ऑप्रेशन ब्ल्यू स्टार का ठीकरा अपने सिर फोड़ लिया।

बीजेपी को हुआ तिब्बत पर गलती का अहसास

तिब्बत का आंदोलन जोर पकड़ने लगा। सत्रह अप्रेल को ओलंपिक मशाल आएगी। उससे पहले दिल्ली-मुंबई में भिड़ंतें होना तय। फ्रांस की खबर से तो मनमोहन सरकार के तोते उड़ गए। पेरिस में पहुंची मशाल प्रदर्शन के चलते बुझानी पड़ी। बुझी मशाल को बस में रखकर ले जाना पड़ा। अपने खिलाड़ी भाईचुंग भुटिया ने देश को रास्ता दिखाया। तिब्बत के समर्थन में मशाल विरोध का गांधीवादी रास्ता। जिनने मशाल का विरोध नहीं करने का ऐलान किया। वे फ्रांस से सबक लें। मशाल दिल्ली आएगी, तो इंडिया गेट से शुरू होगी। सोमवार को इंडिया गेट पर ही तिब्बत के लिए मोमबत्तियां जली। तो कम्युनिस्ट जल-भुन गए। मनमोहन सरकार के तो कपड़े भीग गए। यों तिब्बत के मामले पर अटल राज भी दूध का धुला नहीं। पर मनमोहन सरकार के तो बुरे हाल। भारत में चीनवादी कम्युनिस्टों के सामने नतमस्तक। तो बीजिंग में चीन सरकार के सामने घुटनेटेक। अपने मनमोहन सिंह बीजिंग गए। तो चीन के राष्ट्रपति तने हुए खड़े थे। अपने मनमोहन भाई झुककर खड़े थे। यह फोटू सोमवार को अपने यशवंत सिन्हा ने दिखाया।

कैबिनेट का हुआ फेरबदल, पर खड़े हुए कई सवाल

आखिर हो ही गया मंत्रिमंडल में फेरबदल। छह मंत्रियों की छुट्टी हुई। सात की शपथ। पर सबको खुश नहीं कर पाई सोनिया। अलबत्ता खुश कम हुए, नाराज ज्यादा। पहले अपन जाने वालों की बात करें। अपने सुरेश पचौरी का राज्य सभा सीट में जुगाड़ नहीं बना। सो पचौरी को जाना ही था। पचौरी का राज्य सभा का जुगाड़ लग जाता। तो प्रियरंजन दासमुंशी की तरह मंत्री भी रह जाते। पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने। तो दासमुंशी भी पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष बने। सो पार्टी की जिम्मेदारी से मंत्री पद का कुछ लेना देना नहीं। सोनिया तो राहुल बाबा को भी मंत्री बनाना चाहती थी। पर राहुल बाबा डबल जिम्मेदारी से बचे। पार्टी महासचिव का बोझ कोई कम नहीं। एक व्यक्ति, एक पद का सिध्दांत अब काफूर। नरसिंहराव ने बनाया था यह सिध्दांत । वैसे तो यह सिध्दांत बंगाल में पहले भी लागू नहीं था। अपने प्रणव दा मंत्री भी थे, प्रदेश अध्यक्ष भी। पर राहुल बाबा की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा।

कौन मानता है तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग

तिब्बत और जम्मू कश्मीर पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की दो महान गलतियां हमारी कूटनीतिक अपरिपक्वता का पीछा नहीं छोड़ रही। राजा हरि सिंह शुरू में जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र रखने के पक्ष में थे। लेकिन पाकिस्तान ने कबायलियों को आगे करके कश्मीर पर कब्जे की कोशिश शुरू की तो राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और विभिन्न नेताओं के दखल से कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। गृहमंत्री सरदार पटेल ने पाकिस्तान की ओर से हड़पा हुआ क्षेत्र वापस लेने के लिए फौज भिजवा दी थी, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने माउंटबेटेन की सलाह पर यह मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया। जिसमें ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत का साथ नहीं दिया, अलबत्ता जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का फैसला करवा दिया। तब से हड़पा हुआ जम्मू कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है।

आम आदमी का तो बज गया बाजा

महंगाई एक सीढ़ी और चढ़ गई। तो अपने अभिषेक मनु सिंघवी बोले- 'हमारे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं।' यानी कांग्रेस ने हाथ खड़े कर लिए। सोनिया गांधी ने राजस्थान में कहा- 'महंगाई रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारें लें।' इसका मतलब भी था- केंद्र और कांग्रेस का हाथ खड़े करना। अभिषेक मनु सिंघवी सही समझे। तभी तो कहा- हमारे पास जादू की छड़ी नहीं। सच्ची बात से चिड़ जाते हैं अपने सिंघवी। पिछले हफ्ते कह रहे थे- महंगाई जल्द काबू आएगी। हुआ उल्टा। इस हफ्ते आया आंकड़ा तो धुआं निकाल गया। यों अपन आंकड़ेबाजी पर न भी जाएं। तो भी आम आदमी का जीना दूभर। आंकड़े तो सिर्फ दिखाने के सबूत। महंगाई का ताजा आंकडा 22 मार्च तक का। जिसके मुताबिक मुद्रास्फीति सात फीसदी हो गई। अगले हफ्ते सात फीसदी भी पार होगी।

कंधार और हजरतबल यानी हमाम में दोनों नंगे

आडवाणी की लोकप्रियता बढ़ी या घटी। यह हिसाब तो एनडीए लगाए। नफा-नुकसान एनडीए का ही होगा। आडवाणी ने अपनी किताब से इतने विवाद खड़े नहीं किए। जितने किताब की प्रमोशन में दिए इंटरव्यू से। एनडीटीवी का 'वाक दि टाक' तो गले का फंदा बन गया। 'वाक दि टाक' को भी इतनी मशहूरी किसी और नेता ने नहीं दी। जितनी संघ परिवार के दो नेताओं ने। संघ प्रमुख सुदर्शन ने 'वाक दि टाक' में ही अटल-आडवाणी से इस्तीफा मांगा था। अब आडवाणी ने जसवंत सिंह की कंधार यात्रा से पल्ला झाड़ा। तो सवालों की बौछार शुरू हो गई। सोनिया अब तक चुप थी। वह गुरुवार को राजस्थान में जाकर बोली। पहले अपनी वसुंधरा ने सुंधा माता, हिंगलाज माता, गोलासन हनुमान जी से आशीर्वाद ले चुनावी डुगडुगी बजाई। अब सोनिया ने सोम-माही-जाखम नदियों के संगम वेणेश्वर धाम में जाकर अलख जगाई।

सिमी पर गाज से खुलेंगे राजनीतिक संबंधों के राज

मुलायम-सोनिया साथ-साथ होंगे। तो सिमी का संकट काफी हद तक कम होगा। मुलायम तो खुल्लमखुल्ला सिमी समर्थन करते रहे। अब जब इंदौर में सिमी आतंकियों पर गाज गिरी। तो कई कांग्रेसी दिग्गजों की पोल भी खुलेगी। मुलायम-सोनिया की जुगलबंदी का अपन अंदाज नहीं लगा रहे। अलबत्ता केंद्र ने सीबीआई को मुलायम के खिलाफ जांच की इजाजत नहीं दी। समझदारों को इशारा काफी। मायावती जब सोनिया के साथ थी। तो ताज कोरिडोर घोटाला दबाने की कोशिश हुई। अब मुलायम को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की कोशिश। अपने बुजुर्ग एक भी कहावत बेसिर-पैर की नहीं कह गए। चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत को ही लो। फिट बैठेगी। एक और कहावत याद करिए। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। माया-मुलायम की दुश्मनी जगजाहिर।

कांग्रेस का हाथ आम आदमी की गर्दन पर

पी. चिदंबरम ने सोनिया का सारा खेल बिगाड़ दिया। अभी तो किसानों के कर्ज माफ नहीं हुए। अभी तो छटे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हुई। महंगाई का फन कांग्रेस को डसना शुरू हो चुका। दोनों कदमों से कांग्रेस को चुनावी उम्मीद थी। अब दोनों कदमों से महंगाई और बढ़ेगी। जब छटे वेतन आयोग की सिफारिश लागू हुई। तो अपन ने 25 मार्च को लिखा ही था- 'तनख्वाहें बढ़ेंगी तो जीना होगा और हराम।' कांग्रेस के दफ्तर में अब यही डर सताने लगा। पर सोनिया को अब कर्नाटक का डर। कर्नाटक के चुनावों का एलान बस आज-कल में। बारह-सत्रह नहीं तो सोलह-इक्कीस समझिए। चुनाव मई में ही होंगे। अब कांग्रेसी चिदंबरम के कुप्रबंधन को कोसने लगे। चिदंबरम का लोकलुभावन बजट आया। तो सोनिया बाग-ओ-बाग थी। राहुल को बजट पर बहस में उतारा गया। चिदंबरम ने राहुल की बातों पर गौर नहीं किया।