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March 2008

कांग्रेस बोली लेफ्ट से- 'चीन की महंगाई भी देख लो'

यह जहाज डूबता देख चूहों के भागने वाली बात नहीं। पर सरकारी नाव कूटनीतिक और आर्थिक झंझावत में फंस तो गई। एक तरफ तिब्बत के मुद्दे पर चीन के सामने घुटने टेकना। माफ कीजिएगा- वाजपेयी सरकार ने भी घुटने टेके थे। दूसरी तरफ एटमी करार पर अमेरिका के सामने। यह तो रही कूटनीति के तूफान में फंसने की बात। आर्थिक मुद्दे पर भी मनमोहन-चिदंबरम दोनों फेल। सरकार जब बनी थी। तो अपन ने तभी लिखा था- 'आर्थिक और कूटनीतिक मुद्दों पर लेफ्ट से होगा टकराव।' अब देख लो- महंगाई और एटमी करार पर इसी महीने का अल्टीमेटम। एटमी करार सरका। तो सरकार गिरेगी। महंगाई पर भी पंद्रह अप्रेल तक का नोटिस। ऐसे में मनमोहन के प्रेस सलाहकार संजय बारू का यह फैसला। जी हां, बारू ने इस्तीफा दे दिया। इसे कहते हैं बुरे वक्त में साथ छोड़ जाना। यों जुलाई तक रहेंगे। पर जहाज डूबने के बाद कौन पूछेगा। सो अभी सिंगापुर की एक युनिवर्सिटी में नौकरी का जुगाड़ कर लिया।

कंधार और 'माई कंट्री माई लाईफ'

लाल कृष्ण आडवाणी की किताब 'माई कंट्री माई लाइफ' राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बिंदु बन गई है। आडवाणी के परंपरागत विरोधी बिना किताब को पढ़े, उनके खिलाफ धड़ाधड़ लिख और बोल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किताब में कोई त्रुटियां नहीं हैं, हालांकि किताब लिखते समय आडवाणी और उनके सलाहकारों ने तथ्यों की अच्छी तरह जांच-पड़ताल की, फिर भी कई गलतियां रह गई हैं। जैसे एक जगह 1974 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का जिक्र किया, जबकि उन्हें जनसंघ लिखना चाहिए था क्योंकि उस समय जनसंघ थी, भाजपा नहीं। एक और बड़ी चूक हुई है, जिसे आडवाणी के विरोधी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है, जो उस समय भी अखबारों में छपा था कि विमान जब दुबई में उतरा, तो भारत सरकार ने अमेरिका से मदद मांगी थी। लेकिन आडवाणी की ओर से लिखते समय तत्कालीन राजदूत का नाम गलत लिखा गया। उस समय भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलस्टे थे, न कि रोबर्ट ब्लैकविल।

महंगाई मुद्दा बना, तो कांग्रेस सस्ते में निपटेगी

अपन दो दिन दिल्ली छोड़ जमीन पर रहे। राजस्थान में पाकिस्तान के बार्डर तक गए। जहां गुजरात से नर्मदा राजस्थान में आई। वह सीलू गांव बार्डर से सिर्फ सोलह किलोमीटर। सो अपन आखिरी इलाके के आदमियों से पूछ आए। अपन को हर कोई महंगाई से दु:खी लगा। अपन ने भीलों के वे इलाके भी देखे। जहां न बंदा न बंदे की जात। आती-जाती गाड़ी दिख जाए। तो लूटपाट होना तय। अपन ऐसी गरीबी को देखकर दिल्ली लौटे। जगमग दिल्ली, जहां बैठकर ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। जब अपन को ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। तो पी. चिदंबरम को कहां से होगी। चिदंबरम तो यों भी सड़क पर सफर नहीं करते। लालगढ़ वह जगह थी। जहां वसुंधरा ने बटन दबाकर सीलू हैड का फाटक खोला। तो नर्मदा का पानी छल-छल करता बहने लगा। वहीं पर आई अनपढ़ औरतों से अपन ने पूछा- 'नर्मदा से आपकी जिंदगी में क्या फर्क पड़ेगा?' तो वह बोली- 'पानी मिलेगा, तो फसलें अच्छी होंगी। गरीबी से निजात मिलेगी।'

नर्मदा के किनारे 'फील गुड' के बाद बजी चुनावी डुगडुगी

मां नर्मदा मरुभूमि आ पहुंची। वसुंधरा ने आगवानी की। पर नरेंद्र मोदी राजस्थान में नहीं घुसे। वह नारोली से ही पानी छोड़ने की रश्म अदायगी कर गए। Entry point of Narmda at Seelu village of Rajasthanसीलू में वसुंधरा ने मंत्रोच्चारण से आगवानी की। नरेंद्र भाई क्यों नहीं आए। वसुंधरा के पास कोई जवाब नहीं था। पूछा, तो बोली- 'दोनों सरकारों ने अपना-अपना प्रोग्राम किया। उनका कोई प्रोग्राम होगा।' पर ओम माथुर को माजरा समझ नहीं आया। नरेंद्र भाई का आना आखिर तक तय था। गुजरात का अमला भी पहुंचा हुआ दिखा। पत्थर पर नरेंद्र भाई चीफ गेस्ट के तौर पर खुदे थे। अपन ने वसु से पहले ही घूंघट उठाकर देख लिया था। पर मोदी नहीं आए। तो अच्छा ही हुआ। मोदी आते, तो सारा शो वही उड़ा ले जाते। जिस महफिल में मोदी हों। उस महफिल में कोई और नहीं जमता। अपन असली माजरा तो नहीं जानते। पर वसु ने नर्मदा की अगवानी में बहुत तैयारी की थी। सो उनने चुनावी बिगुल वहीं पर बजा दिया।

रेगिस्तान को इतिहास बना देगी नर्मदा

मां नर्मदा का राजस्थान पहुंचना कोई छोटी घटना नहीं। सो अपन भी इस मौके पर पहुंचेंगे। दिल्ली से सीलू का सफर आसान नहीं। मोदी अहमदाबाद से आएंगे। तो वसुंधरा जयपुर से उड़न खटोले पर। अपन को पहले उदयपुर पहुंचना पड़ा। फिर माउंटआबू। बुधवार की रात माउंटआबू में बीती। अपन भी आज सीलू पहुंचेंगे। यों तो उदयपुर से माउंटआबू सिर्फ पौने दो सौ किलोमीटर। पर सड़क चौड़ी करने का सिलसिला जारी। सो चार घंटे का सफर छह घंटे में पूरा हुआ। वाजपेयी सड़कों का काम शुरू कर गए थे। मनमोहन सरकार साढ़े तीन साल लंबी तानकर सोई रही। अब जब जाने का वक्त आया। तो सड़कों की याद आई। देशभर में एम्स जैसे अस्पतालों की सुध भी अब आई। आईआईटी-आईआईएम की याद भी अब आई। साढ़े तीन साल तो शेयर मार्केट की सगी बनी रही।

जय मोदी, जय नर्मदा

मेधा पाटकर ने लाख रुकावटें खड़ी की। पर नर्मदा का पानी राजस्थान आ ही गया। मोदी जबसे सीएम बने। कभी मेधा पाटकर रुकावट बनी। तो कभी तीस्ता सीतलवाड़। दोनों की जहनियत एक सी। पर बात फिलहाल मां नर्मदा की। मां नर्मदा का पानी तो पांच साल पहले ही राजस्थान आ जाता। पर दस साल अपने दिग्गी राजा मध्य प्रदेश के सीएम रहे। जिनने मेधा पाटकर की मदद में कसर नहीं छोड़ी। मध्य प्रदेश के अमर कंटक से शुरू होती है नर्मदा। सरदार सरोवर से मध्य प्रदेश के कई गांव उजाड़ने पड़े। यही मेधा पाटकर के आंदोलन का हथियार बना। अमेरिका और ब्रिटेन का हाथ आंदोलन में बार-बार दिखा। अपने यहां आंदोलन की खबरें कम। ब्रिटेन-अमेरिका में ज्यादा छपती रहीं। आंदोलन में गोरी चमड़ी वाले भी खूब दिखे। यों तो अपने आमिर खान लगान में ब्रिटिश क्रिकेट टीम से भिड़े थे। पर नर्मदा बचाओ आंदोलन में गोरी चमड़ी वालों के साथ दिखे। मेधा पाटकर ने लाख रुकावटें खड़ी की। पर नर्मदा का पानी राजस्थान आ ही गया। मोदी जबसे सीएम बने। कभी मेधा पाटकर रुकावट बनी। तो कभी तीस्ता सीतलवाड़। दोनों की जहनियत एक सी। पर बात फिलहाल मां नर्मदा की। मां नर्मदा का पानी तो पांच साल पहले ही राजस्थान आ जाता। पर दस साल अपने दिग्गी राजा मध्य प्रदेश के सीएम रहे। जिनने मेधा पाटकर की मदद में कसर नहीं छोड़ी। मध्य प्रदेश के अमर कंटक से शुरू होती है नर्मदा। सरदार सरोवर से मध्य प्रदेश के कई गांव उजाड़ने पड़े। यही मेधा पाटकर के आंदोलन का हथियार बना। अमेरिका और ब्रिटेन का हाथ आंदोलन में बार-बार दिखा। अपने यहां आंदोलन की खबरें कम। ब्रिटेन-अमेरिका में ज्यादा छपती रहीं। आंदोलन में गोरी चमड़ी वाले भी खूब दिखे। यों तो अपने आमिर खान लगान में ब्रिटिश क्रिकेट टीम से भिड़े थे। पर नर्मदा बचाओ आंदोलन में गोरी चमड़ी वालों के साथ दिखे।

तनख्वाहें बढ़ेंगी तो जीना होगा और हराम

तो आखिर युसूफ रजा गिलानी पाक के पीएम हो गए। अपन ने 22 फरवरी को ही लिखा था- 'मकदूम अमीन फाहिम का पलड़ा भारी। पर जरदारी का रुख साफ नहीं।' अपन को पहले दिन ही जरदारी पर शक था। सो अपन ने उसी दिन फाहिम के साथ गिलानी और कुरैशी का नाम भी लिखा। पर पाक में असली जंग तो अब शुरू होगी। मुशर्रफ को पहला झटका तो सोमवार को ही लग गया। जब नई सरकार ने जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को रिहा कर दिया। चौधरी अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे। तो हालात क्या मोड़ लेंगे। अपनी निगाह उसी पर। पाक के हालात कोई अच्छे नहीं। आए दिन आतंकवाद की वारदात होने लगी। अपन ने अपने एक पाकिस्तानी दोस्त को होली की मुबारक भेजी। तो जवाब चौंकाने वाला आया- 'हम एक देश के तौर पर मुस्कुराना भूल गए। कैसे जश्न मनाएं। जिंदगी के रंग फीके पड़ गए। हम आतंकवाद के बादलों से घिर गए।

लैटस प्ले होली

अपन को कई बार लगता है- जर्नलिज्म का बंटाधार हो चुका। अब खबरें छपती कम, छुपती ज्यादा हैं। उथली-उथली रिपोर्टिंग का जमाना आ गया। एक वक्त था- जब होली पर ढूंढ-ढूंढकर खबरें लाते थे। सारे साल का अखबार एक तरफ। होली की खोज खबरें एक तरफ। अब तो कोई रिपोर्टर तह तक नहीं जाता। कोई किसी के बैडरूम में नहीं झांकता। अपन पिछले दिनों तह तक गए। तो देखो कितनी विस्फोटक खबरें पता चली। आपने अगर भांग न पी हो। तो पी लें। उसके बाद ही आगे पढ़ें। बिना भांग पिए पढ़ोगे। तो खबरों पर भरोसा नहीं होगा। भांग पीकर पढ़ोगे। तो कोई खबर चंडूखाने की नहीं लगेगी। भांग का नशा ही खबर की तह तक ले जाता है। भरोसा न हो। तो अपने अटल बिहारी वाजपेयी से पूछ लें।

तो क्या 'माई कंट्री, माई लाइफ' में जुड़ेंगा 'पीएम' का चैप्टर भी

यों तो बुधवार को और भी बहुत घटनाएं हुई। सरबजीत की फांसी कम से कम एक महीना तो रुकी। मेघालय में कांग्रेसी सीएम लपांग को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफा तो गवर्नर सिध्दू को भी देना चाहिए। जिनको पता था- लपांग के पास बहुमत नहीं। फिर भी उनने सीएम बनाकर खरीद-फरोख्त का मौका दिया। पर अपने संगमा आखिर सोनिया को मात दे गए। पर दिल्ली की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना थी- 'माई कंट्री, माई लाइफ' का विमोचन। जो सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में हुआ। विमोचन हुआ अब्दुल कलाम के हाथों। विमोचन की खास बात रही- दिल्ली में ट्रैफिक जाम होना। जब आधा दर्जन मुख्यमंत्री विमोचन में पहुंचे हों। तो साउथ दिल्ली की सड़कें जाम होनी ही थीं।

तसलीमा के बाद दलाई लामा आंख की किरकिरी

लेफ्ट ने मनमोहन को चिट्ठी लिखी- 'इजराइली फर्म से बाराक का नया सौदा न किया जाए। सवाल अमेरिका और इजराइल का हो। तो अपन को लेफ्ट का रवैया पहले से मालूम। सवाल चीन-रूस-ईरान-इराक का हो। तब भी लेफ्ट की राय से वाकिफ। आखिर रूस-चीन वैचारिक जन्मभूमि। तो ईरान-इराक अल्पसंख्यक वोट बैंक का हथियार। पर अपन को हैरानी तब हुई। जब प्रगतिशीलता पर अल्पसंख्यक वोट बैंक हावी हो गया। तसलीमा नसरीन को बंगाल से निकाल बाहर किया गया। लेफ्ट के साथ कांग्रेस का सेक्युलरिज्म भी बेनकाब हुआ। कांग्रेसी इदरिस अली की रहनुमाई में ही तसलीमा के घर हमला हुआ। प्रगतिशील और सेक्युलर? बुध्ददेव सरकार को अच्छा मौका मिला। नंदीग्राम में गोलीबारी से मुस्लिम खफा थे ही। जहां ज्यादातर मुस्लिम ही मारे गए।

वृंदावन की कुंज गलियों में रंग बरसे एकादशी पर

सोचो, सोनिया या आडवाणी को रैली करनी हो। पिछले महीने दोनों ने ताकत दिखाई भी। पर दोनों रैलियों का आंकड़ा पचास हजार ही रहा। बचे-खुचे रामलीला मैदान की इतनी ही क्षमता। ये सब भी हुआ मुफ्त की बसें-ट्रक चलाकर। पर अपने कृष्णजी ने न न्यौता दिया, न ट्रक भेजे, न बसें चलाई। पर वृंदावन की कुंज गलियों में इतने लोग भर गए। जिधर देखो, गुलाल से रंगे सिर ही सिर। यों तो हर एकादशी पर ऐसी ही भीड़। पर फाल्गुन का महीना हो, एकादशी का दिन। तो क्या कहने। अपन मित्र को केशवकुंज में उतार इस्कान मंदिर की ओर बढ़े। कुंज गलियों और इस्कान की बात बाद में। पहले केशवधाम की बात। इस बार आरएसएस की प्रतिनिधि सभा वृंदावन में बैठी।

ओलंपिक के बहाने तिब्बत का दर्द

दुनिया के ज्यादातर हिस्सों पर राज करने की ख्वाहिश ने 19वीं सदी तक लाखों-करोड़ों बेगुनाहों का खून बहाया है। पंद्रहवीं सदी में मुगल भी हिंदोस्तान पर राज करने की ख्वाहिश लेकर भारत आए थे और उन्होंने हिंदू राजाओं के साथ युध्द करके विस्तारवादी मुहिम जारी रखी। मुगल हिंदोस्तान के ज्यादातर हिस्से पर काबिज हो गए थे, तभी ब्रिटिश विस्तारवादी शासकों की निगाह भारत पर पड़ी। ठीक इसी तरह तिब्बत पर कभी सिंघाई और कभी मंगोलिया काबिज होते रहे। मंगोलिया के तिब्बत छोड़कर जाने के बाद वहां के कुछ हिस्से पर सिंघाई का राज था। लेकिन तिब्बतियों का आजादी के लिए संघर्ष कभी भी रुका नहीं।

आतंरिक लोकतंत्र बनाम सोनिया के दस साल

अपने यहां दलों के आतंरिक लोकतंत्र की क्या बात करें। पवार-संगमा-तारीक ने छोटी सी बात उठाई थी। कांग्रेस ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। बात पार्टी से निकालने तक जा पहुंची। दलों का आतंरिक लोकतंत्र तो अमेरिका में। ओबामा और हिलेरी की खुली जंग देखी। अपने यहां 1999 में जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में उतरे। तो चौबीस अकबर रोड से बाहर कर दिए गए। सोनिया का सारा चुनाव अभियान चौबीस अकबर रोड से चला। जितेंद्र प्रसाद का उनके घर से। पर सोनिया 14 मार्च 1998 को कांग्रेस अध्यक्ष बन गई थी। शुक्रवार को कांग्रेस में भले ही जश्न हुआ। मनमोहन समेत सब बधाई देने के लिए लाइन में खड़े थे। पर लाल कृष्ण आडवाणी बेहद दु:खी दिखे। बोले- 'भारतीय राजनीति में यह दु:खद दिन।

बीजेपी बोली- पप्पू नकल से पास हुआ

चुनाव नजदीक, तो राजनीति कुलाचे मारने लगी। मुलायम कांग्रेस के प्रति मुलायम होने लगे। पर अब तक मुलायम प्रकाश करात सख्त दिखने लगे। दिल्ली में मुलायम बोले- 'कांग्रेस से गठबंधन संभव।' लखनऊ में करात बोले- 'कांग्रेस महंगाई बढ़ाने की जिम्मेदार।' राजनीति का उथल-पुथल इसे कहते हैं। कर्नाटक में भी यही रंग दिखा। जब देवगौड़ा के खास बच्चेगौड़ा बीजेपी में आ मिले। दिल्ली से लौटकर येदुरप्पा के तेवर और तीखे। बोले- 'कांग्रेस ने चुनाव रोकने की साजिश बंद नहीं की। तो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।' येदुरप्पा की बात चली। तो बताते जाएं। कर्पूरचंद्र कुलिश अवार्ड में वीआईपी टेबल पर पहुंचे।

केंद्र में माकपा के साथ तो केरल में संघ के साथ कांग्रेस

अपने सोमनाथ चटर्जी ने माकपा दफ्तर पर हुआ हमला तो सदन में उठाने दिया। पर केरल में बीजेपी-संघ दफ्तरों पर हुए हमलों का मुद्दा नहीं उठाने दिया। केरल की बात करो। तो राज्य का मामला। दिल्ली की बात करो। तो केंद्र का मामला। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने का यही फायदा। इतवार को सीपीएम दफ्तर पर हमला हुआ। तो सारे राजनीतिक दल एकजुट हो गए। पर केरल में बीजेपी-संघ दफ्तरों पर हमले आम बात। आज नहीं, अलबत्ता महीनों से यही सिलसिला। पहली बार भी नहीं। अलबत्ता हर दूसरे-तीसरे साल ऐसी घटनाएं शुरू। बंगाल में संघ-बीजेपी के पांव उतने नहीं जमे।

अपन को कुछ तो पाक से भी सीख लेना चाहिए

पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें नहीं जमीं। तो इसका मतलब यह नहीं। पाक से सीखने लायक कुछ नहीं। पर यह लिखने से पहले अपन ठिठके। कहीं अपन को पाकपरस्त ही न मान लिया जाए। अपने लाल कृष्ण आडवाणी ने क्या गलत कहा था। जो उन्हें जिन्नापरस्त मान लिया गया। उनने यही तो कहा था- 'पाक की संविधान सभा में जिन्ना ने सेक्युलर पाकिस्तान की कल्पना की थी।' इस्लामिक देश में जाकर आइना दिखाना कहां गलत था। पर संघ से लेकर कांग्रेस तक। सब हाथ धोकर आडवाणी के पीछे पड़ गए। मजबूरी में आडवाणी चुप जरूर रहे। पर उनने कभी नहीं माना- जिन्ना के बारे में गलत कहा।

तो हॉकी भी क्यों नही संभाल लेते शरद पवार

अपन ने चिली को हराया। ब्रिटेन ने आस्ट्रेलिया को हराया। तो अपन इस बात पर खुश थे। अब ओलंपिक में पहुंचने का रास्ता साफ। अपना मुकाबला आस्ट्रेलिया से होता। तो मुश्किल होती। पर अपने पैरों तले से तो जमीन खिसक गई। जब अपन ब्रिटेन जैसी फिसड्डी टीम से भी हार गए। पर अपनी भारतीय हॉकी फेडरेशन के अध्यक्ष एम एस गिल को शर्म नहीं आई। अपन जब यह लिख रहे थे। तो गिल ने बड़ी बेशर्मी से इस्तीफे की मांग ठुकरा दी। उनसे धनराज पिल्ले ने इस्तीफा मांगा। प्रगट सिंह ने इस्तीफा मांगा। खुद इस्तीफा देकर फेडरेशन के उपाध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने भी इस्तीफा मांगा। डेरी डिसूजा ने तो कहा- 'ऐसी हॉकी फेडरेशन ही भंग करो।' सीपीआई के सांसद गुरुदास दासगुप्त ने तो कहा- 'गिल को धक्का मारकर बाहर निकाल दो।'

संगमा की अब सोनिया को मेघालय में चुनौती

अपन ने शुक्र और शनिवार को मेघालय का जिक्र किया। तो होने वाले घमासान का अंदेशा बताया। अपने अंदेशे के मुताबिक ही एसेंबली लंगड़ी निकली। शुक्रवार को अपन ने लिखा था- 'अपन से पूछो तो लंगड़ी एसेंबली आएगी। संगमा सीएम पद के दावेदार। पवार भले ही सोनिया के साथ हो चुके। संगमा घुटने टेकने को तैयार नहीं।' आगे अपन ने लिखा- 'अब लाख टके का सवाल यह- क्या सोनिया संगमा को सीएम बनने देगी? क्या लंगड़ी विधानसभा में कांग्रेस-एनसीपी गठजोड होगा। या संगमा कांग्रेस को किनारा कर गठबंधन सरकार बना लेंगे? इसी बात की संभावना ज्यादा। यों भी संगमा को आडवाणी कबूल होंगे, सोनिया नहीं।'

दिया जब रंज कांग्रेस ने तो थर्ड फ्रंट याद आया

त्रिपुरा में जीतकर सीपीएम फिर शेर हो गई। त्रिपुरा ने हिम्मत जरूर बढ़ाई। न भी जीतते, तो भी एटमी करार पर कड़वाहट कम न होती। त्रिपुरा में राज करते पंद्रह साल हो गए। फिर भी लेफ्ट की ताकत पिछली एसेंबली से बढ़ी। सो नंदीग्राम-सिंगूर के बावजूद लेफ्ट को बंगाल में ताकत बने रहने का भरोसा। लेफ्ट के करार विरोधी तेवरों में कोई फर्क नहीं आना। अपन कुछ बातें पहले ही कह चुके। जैसे- लोकसभा जून में भंग होने के आसार। जैसे- मार्च में करात-मनमोहन आमने-सामने होंगे। करात ने पंद्रह मार्च तक मीटिंग का एल्टीमेटम दे ही दिया। सो अब मीटिंग संसद सत्र के दौरान होगी। तो कांग्रेस-लेफ्ट तू-तू, मैं-मैं तेज होगी ही।

माहौल बनाकर चुनाव क्यों टालेगी कांग्रेस

गुरुवार को देशभर में जश्न का माहौल रहा। एक तरफ शिवरात्रि की धूम। तो दूसरी तरफ क्रिकेट टीम के लौटने की। टीम को दिल्ली में बुलाकर शरद पवार ने खुद को खूब चमकाया। पहले बेंगलुरु में अंडर-19 का जश्न। फिर दिल्ली में सीनियर टीम का। पवार अपना राजनीतिक दायरा भी बढ़ाते दिखे। एनसीपी को महाराष्ट्र से बाहर भी निकालने की तैयारी। यों एनसीपी का राष्ट्रीय दर्जा नार्थ-ईस्ट की बदौलत। पी ए संगमा साथ न होते। तो राष्ट्रीय दर्जा न होता। संगमा की बात चली। तो चलते-चलते मेघालय की बात हो जाए। एसेंबली के चुनाव हो चुके। अपन से पूछो तो लंगड़ी एसेंबली आएगी। संगमा सीएम पद के दावेदार।

भतीजे पर हावी होने में जुटे बाल ठाकरे

अपन ने पांच फरवरी को लिखा था- 'दो भाईयों की जंग में पिसते बेगुनाह।' एक महीने बाद वह बात सही साबित हुई। जब राज ठाकरे को मराठियों में आगे बढ़ता देखा। बेटे उध्दव पर भतीजा राज हावी होता दिखा। तो बाल ठाकरे भी बिहारियों के खिलाफ मैदान में उतर आए। शुरू में उध्दव ने बिहारियों का बचाव किया। पर मराठी राज के साथ जाने लगे। तो बाल ठाकरे ने कमान संभाली। पिछले हफ्ते संसद में हुआ हल्ला तो अपन ने बताया ही था। बाल ठाकरे ने इसी को बहाना बनाया। पांच मार्च के 'सामना' में बाल ठाकरे ने लिखा- 'बिहारियों को दक्षिण भारत में पसंद नहीं किया जाता। असम, पंजाब और चंडीगढ़ में भी पसंद नहीं किया जाता। वे जहां भी जाते हैं, लोकल लोगों को अपना विरोधी बना देते हैं।

क्रिकेट जीते तो विपक्ष के हमले पचा गए मनमोहन

उधर ब्रिसबेन में कंगारुओं पर अपने शेर हावी थे। तो इधर संसद में मनमोहन पर विपक्ष हावी। लोकसभा में अनंत कुमार ने घेरा। तो राज्यसभा में अपने अरुण जेटली ने। दोनों जगह राष्ट्रपति का अभिभाषण बना मुद्दा। पर बहस अभिभाषण पर कम। बजट पर ज्यादा होती दिखी। जेटली बोले- 'सरकार बिना योजना के काम कर रही है। किसानों का कर्ज माफ किया। पर यह पता नहीं- पैसा कहां से आएगा।' यही बात सोमवार को आडवाणी ने लोकसभा में पूछी थी। बहस दूसरे दिन भी जारी रही। तो अनंत कुमार ने नक्सलवाद पर मनमोहन-पाटिल को घेरा। यों आडवाणी के लिखित भाषण में यह उदाहरण था। पर लोकसभा में देना भूल गए।

सरकार की उलटी गिनती शुरू

जून में भंग हुई। तो लोकसभा चुनाव नवंबर दिसंबर में। अभिभाषण पर बहस शुरू हुई। तो आडवाणी बोले- 'इस साल नहीं, तो अगले साल के शुरू में चुनाव। इस सरकार में तो राष्ट्रपति का यह आखिरी अभिभाषण था।' सामने बैठे मनमोहन न तो खंडन में बोले। बोलना तो दूर की बात, मुंडी भी नहीं हिलाई। विपक्ष का नेता बोले। तो पीएम के दखल देने का रिवाज। पर मनमोहन चुप्पी साधकर बैठे रहे। वह तब भी कुछ नहीं बोले। जब आडवाणी ने क्वात्रोची का जिक्र कर सोनिया पर हमला किया। वह तब भी कुछ नहीं बोले। जब आडवाणी ने कहा- 'आपकी सारी योजनाएं नेहरू, इंदिरा, राजीव के नाम पर। क्या इस देश में इस परिवार के अलावा कोई नेता नहीं हुआ।' उनने मनमोहन पर फब्ती कसते कहा- 'आपके गुरु नरसिंह राव के नाम पर भी कोई योजना नहीं।'

जून में भंग तो नहीं हो जाएगी लोकसभा

लोकलुभावन बजट के बाद कांग्रेस में खामोशी। किसी कांग्रेसी ने अभी तक नहीं कहा- 'चुनाव इसी साल होंगे।' पर लेफ्टिए इसी साल चुनावों की भविष्यवाणी करने लगे। येचुरी-वर्धन के मुताबिक चुनाव बस आया समझो। किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं। सोनिया ने एक झटके से बीस करोड़ वोट झटक लिए। हर कर्जाऊ किसान के घर पांच वोट तो होंगे ही। चार करोड़ को फायदा होगा। तो बीस करोड़ वोटों का जुगाड़। इनकम टैक्स में राहत वाला मिडिल क्लास। छठे वेतन आयोग वाला कर्मचारी वर्ग अलग से। इतने वोटों का जुगाड़ कर चुनाव अगले साल तक कौन रोकेगा।

किसानों से वाहवाही पर एक दिन का सब्र नहीं

देखा चुनावी बजट। किसानों के कर्ज माफ। इनकम टैक्स में छूट। दोनों ही बातें अपन ने एक दिन पहले बता ही दी थीं। पर यह अपना अंदाज ही था। अपन ने कोई बजट लीक नहीं किया। अट्ठारह साल पहले 1989 में कनाडा का बजट लीक हुआ। तो टीवी खबरची डॉग समाल पर सरकारी संपत्ति की चोरी का मुकदमा चला। सो अपन पहले ही बता दें। चिदंबरम ने अपन को बजट लीक नहीं किया। पर चिदंबरम ने बजट लीक नहीं किया। ऐसी बात भी नहीं। उनने सोनिया गांधी को बजट लीक कर गोपनीयता भंग की। जिसकी उनने मंत्री बनने पर शपथ ली थी।