March 2008

कंधार और 'माई कंट्री माई लाईफ'

लाल कृष्ण आडवाणी की किताब 'माई कंट्री माई लाइफ' राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बिंदु बन गई है। आडवाणी के परंपरागत विरोधी बिना किताब को पढ़े, उनके खिलाफ धड़ाधड़ लिख और बोल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किताब में कोई त्रुटियां नहीं हैं, हालांकि किताब लिखते समय आडवाणी और उनके सलाहकारों ने तथ्यों की अच्छी तरह जांच-पड़ताल की, फिर भी कई गलतियां रह गई हैं। जैसे एक जगह 1974 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का जिक्र किया, जबकि उन्हें जनसंघ लिखना चाहिए था क्योंकि उस समय जनसंघ थी, भाजपा नहीं। एक और बड़ी चूक हुई है, जिसे आडवाणी के विरोधी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है, जो उस समय भी अखबारों में छपा था कि विमान जब दुबई में उतरा, तो भारत सरकार ने अमेरिका से मदद मांगी थी। लेकिन आडवाणी की ओर से लिखते समय तत्कालीन राजदूत का नाम गलत लिखा गया। उस समय भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलस्टे थे, न कि रोबर्ट ब्लैकविल।

महंगाई मुद्दा बना, तो कांग्रेस सस्ते में निपटेगी

अपन दो दिन दिल्ली छोड़ जमीन पर रहे। राजस्थान में पाकिस्तान के बार्डर तक गए। जहां गुजरात से नर्मदा राजस्थान में आई। वह सीलू गांव बार्डर से सिर्फ सोलह किलोमीटर। सो अपन आखिरी इलाके के आदमियों से पूछ आए। अपन को हर कोई महंगाई से दु:खी लगा। अपन ने भीलों के वे इलाके भी देखे। जहां न बंदा न बंदे की जात। आती-जाती गाड़ी दिख जाए। तो लूटपाट होना तय। अपन ऐसी गरीबी को देखकर दिल्ली लौटे। जगमग दिल्ली, जहां बैठकर ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। जब अपन को ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। तो पी. चिदंबरम को कहां से होगी। चिदंबरम तो यों भी सड़क पर सफर नहीं करते। लालगढ़ वह जगह थी। जहां वसुंधरा ने बटन दबाकर सीलू हैड का फाटक खोला। तो नर्मदा का पानी छल-छल करता बहने लगा। वहीं पर आई अनपढ़ औरतों से अपन ने पूछा- 'नर्मदा से आपकी जिंदगी में क्या फर्क पड़ेगा?' तो वह बोली- 'पानी मिलेगा, तो फसलें अच्छी होंगी। गरीबी से निजात मिलेगी।'

नर्मदा के किनारे 'फील गुड' के बाद बजी चुनावी डुगडुगी

मां नर्मदा मरुभूमि आ पहुंची। वसुंधरा ने आगवानी की। पर नरेंद्र मोदी राजस्थान में नहीं घुसे। वह नारोली से ही पानी छोड़ने की रश्म अदायगी कर गए। Entry point of Narmda at Seelu village of Rajasthanसीलू में वसुंधरा ने मंत्रोच्चारण से आगवानी की। नरेंद्र भाई क्यों नहीं आए। वसुंधरा के पास कोई जवाब नहीं था। पूछा, तो बोली- 'दोनों सरकारों ने अपना-अपना प्रोग्राम किया। उनका कोई प्रोग्राम होगा।' पर ओम माथुर को माजरा समझ नहीं आया। नरेंद्र भाई का आना आखिर तक तय था। गुजरात का अमला भी पहुंचा हुआ दिखा। पत्थर पर नरेंद्र भाई चीफ गेस्ट के तौर पर खुदे थे। अपन ने वसु से पहले ही घूंघट उठाकर देख लिया था। पर मोदी नहीं आए। तो अच्छा ही हुआ। मोदी आते, तो सारा शो वही उड़ा ले जाते। जिस महफिल में मोदी हों। उस महफिल में कोई और नहीं जमता। अपन असली माजरा तो नहीं जानते। पर वसु ने नर्मदा की अगवानी में बहुत तैयारी की थी। सो उनने चुनावी बिगुल वहीं पर बजा दिया।

रेगिस्तान को इतिहास बना देगी नर्मदा

मां नर्मदा का राजस्थान पहुंचना कोई छोटी घटना नहीं। सो अपन भी इस मौके पर पहुंचेंगे। दिल्ली से सीलू का सफर आसान नहीं। मोदी अहमदाबाद से आएंगे। तो वसुंधरा जयपुर से उड़न खटोले पर। अपन को पहले उदयपुर पहुंचना पड़ा। फिर माउंटआबू। बुधवार की रात माउंटआबू में बीती। अपन भी आज सीलू पहुंचेंगे। यों तो उदयपुर से माउंटआबू सिर्फ पौने दो सौ किलोमीटर। पर सड़क चौड़ी करने का सिलसिला जारी। सो चार घंटे का सफर छह घंटे में पूरा हुआ। वाजपेयी सड़कों का काम शुरू कर गए थे। मनमोहन सरकार साढ़े तीन साल लंबी तानकर सोई रही। अब जब जाने का वक्त आया। तो सड़कों की याद आई। देशभर में एम्स जैसे अस्पतालों की सुध भी अब आई। आईआईटी-आईआईएम की याद भी अब आई। साढ़े तीन साल तो शेयर मार्केट की सगी बनी रही।

जय मोदी, जय नर्मदा

मेधा पाटकर ने लाख रुकावटें खड़ी की। पर नर्मदा का पानी राजस्थान आ ही गया। मोदी जबसे सीएम बने। कभी मेधा पाटकर रुकावट बनी। तो कभी तीस्ता सीतलवाड़। दोनों की जहनियत एक सी। पर बात फिलहाल मां नर्मदा की। मां नर्मदा का पानी तो पांच साल पहले ही राजस्थान आ जाता। पर दस साल अपने दिग्गी राजा मध्य प्रदेश के सीएम रहे। जिनने मेधा पाटकर की मदद में कसर नहीं छोड़ी। मध्य प्रदेश के अमर कंटक से शुरू होती है नर्मदा। सरदार सरोवर से मध्य प्रदेश के कई गांव उजाड़ने पड़े। यही मेधा पाटकर के आंदोलन का हथियार बना। अमेरिका और ब्रिटेन का हाथ आंदोलन में बार-बार दिखा। अपने यहां आंदोलन की खबरें कम। ब्रिटेन-अमेरिका में ज्यादा छपती रहीं। आंदोलन में गोरी चमड़ी वाले भी खूब दिखे। यों तो अपने आमिर खान लगान में ब्रिटिश क्रिकेट टीम से भिड़े थे। पर नर्मदा बचाओ आंदोलन में गोरी चमड़ी वालों के साथ दिखे। मेधा पाटकर ने लाख रुकावटें खड़ी की। पर नर्मदा का पानी राजस्थान आ ही गया। मोदी जबसे सीएम बने। कभी मेधा पाटकर रुकावट बनी। तो कभी तीस्ता सीतलवाड़। दोनों की जहनियत एक सी। पर बात फिलहाल मां नर्मदा की। मां नर्मदा का पानी तो पांच साल पहले ही राजस्थान आ जाता। पर दस साल अपने दिग्गी राजा मध्य प्रदेश के सीएम रहे। जिनने मेधा पाटकर की मदद में कसर नहीं छोड़ी। मध्य प्रदेश के अमर कंटक से शुरू होती है नर्मदा। सरदार सरोवर से मध्य प्रदेश के कई गांव उजाड़ने पड़े। यही मेधा पाटकर के आंदोलन का हथियार बना। अमेरिका और ब्रिटेन का हाथ आंदोलन में बार-बार दिखा। अपने यहां आंदोलन की खबरें कम। ब्रिटेन-अमेरिका में ज्यादा छपती रहीं। आंदोलन में गोरी चमड़ी वाले भी खूब दिखे। यों तो अपने आमिर खान लगान में ब्रिटिश क्रिकेट टीम से भिड़े थे। पर नर्मदा बचाओ आंदोलन में गोरी चमड़ी वालों के साथ दिखे।

तनख्वाहें बढ़ेंगी तो जीना होगा और हराम

तो आखिर युसूफ रजा गिलानी पाक के पीएम हो गए। अपन ने 22 फरवरी को ही लिखा था- 'मकदूम अमीन फाहिम का पलड़ा भारी। पर जरदारी का रुख साफ नहीं।' अपन को पहले दिन ही जरदारी पर शक था। सो अपन ने उसी दिन फाहिम के साथ गिलानी और कुरैशी का नाम भी लिखा। पर पाक में असली जंग तो अब शुरू होगी। मुशर्रफ को पहला झटका तो सोमवार को ही लग गया। जब नई सरकार ने जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को रिहा कर दिया। चौधरी अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे। तो हालात क्या मोड़ लेंगे। अपनी निगाह उसी पर। पाक के हालात कोई अच्छे नहीं। आए दिन आतंकवाद की वारदात होने लगी। अपन ने अपने एक पाकिस्तानी दोस्त को होली की मुबारक भेजी। तो जवाब चौंकाने वाला आया- 'हम एक देश के तौर पर मुस्कुराना भूल गए। कैसे जश्न मनाएं। जिंदगी के रंग फीके पड़ गए। हम आतंकवाद के बादलों से घिर गए।

लैटस प्ले होली

अपन को कई बार लगता है- जर्नलिज्म का बंटाधार हो चुका। अब खबरें छपती कम, छुपती ज्यादा हैं। उथली-उथली रिपोर्टिंग का जमाना आ गया। एक वक्त था- जब होली पर ढूंढ-ढूंढकर खबरें लाते थे। सारे साल का अखबार एक तरफ। होली की खोज खबरें एक तरफ। अब तो कोई रिपोर्टर तह तक नहीं जाता। कोई किसी के बैडरूम में नहीं झांकता। अपन पिछले दिनों तह तक गए। तो देखो कितनी विस्फोटक खबरें पता चली। आपने अगर भांग न पी हो। तो पी लें। उसके बाद ही आगे पढ़ें। बिना भांग पिए पढ़ोगे। तो खबरों पर भरोसा नहीं होगा। भांग पीकर पढ़ोगे। तो कोई खबर चंडूखाने की नहीं लगेगी। भांग का नशा ही खबर की तह तक ले जाता है। भरोसा न हो। तो अपने अटल बिहारी वाजपेयी से पूछ लें।

तो क्या 'माई कंट्री, माई लाइफ' में जुड़ेंगा 'पीएम' का चैप्टर भी

यों तो बुधवार को और भी बहुत घटनाएं हुई। सरबजीत की फांसी कम से कम एक महीना तो रुकी। मेघालय में कांग्रेसी सीएम लपांग को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफा तो गवर्नर सिध्दू को भी देना चाहिए। जिनको पता था- लपांग के पास बहुमत नहीं। फिर भी उनने सीएम बनाकर खरीद-फरोख्त का मौका दिया। पर अपने संगमा आखिर सोनिया को मात दे गए। पर दिल्ली की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना थी- 'माई कंट्री, माई लाइफ' का विमोचन। जो सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में हुआ। विमोचन हुआ अब्दुल कलाम के हाथों। विमोचन की खास बात रही- दिल्ली में ट्रैफिक जाम होना। जब आधा दर्जन मुख्यमंत्री विमोचन में पहुंचे हों। तो साउथ दिल्ली की सड़कें जाम होनी ही थीं।

तसलीमा के बाद दलाई लामा आंख की किरकिरी

लेफ्ट ने मनमोहन को चिट्ठी लिखी- 'इजराइली फर्म से बाराक का नया सौदा न किया जाए। सवाल अमेरिका और इजराइल का हो। तो अपन को लेफ्ट का रवैया पहले से मालूम। सवाल चीन-रूस-ईरान-इराक का हो। तब भी लेफ्ट की राय से वाकिफ। आखिर रूस-चीन वैचारिक जन्मभूमि। तो ईरान-इराक अल्पसंख्यक वोट बैंक का हथियार। पर अपन को हैरानी तब हुई। जब प्रगतिशीलता पर अल्पसंख्यक वोट बैंक हावी हो गया। तसलीमा नसरीन को बंगाल से निकाल बाहर किया गया। लेफ्ट के साथ कांग्रेस का सेक्युलरिज्म भी बेनकाब हुआ। कांग्रेसी इदरिस अली की रहनुमाई में ही तसलीमा के घर हमला हुआ। प्रगतिशील और सेक्युलर? बुध्ददेव सरकार को अच्छा मौका मिला। नंदीग्राम में गोलीबारी से मुस्लिम खफा थे ही। जहां ज्यादातर मुस्लिम ही मारे गए।

वृंदावन की कुंज गलियों में रंग बरसे एकादशी पर

सोचो, सोनिया या आडवाणी को रैली करनी हो। पिछले महीने दोनों ने ताकत दिखाई भी। पर दोनों रैलियों का आंकड़ा पचास हजार ही रहा। बचे-खुचे रामलीला मैदान की इतनी ही क्षमता। ये सब भी हुआ मुफ्त की बसें-ट्रक चलाकर। पर अपने कृष्णजी ने न न्यौता दिया, न ट्रक भेजे, न बसें चलाई। पर वृंदावन की कुंज गलियों में इतने लोग भर गए। जिधर देखो, गुलाल से रंगे सिर ही सिर। यों तो हर एकादशी पर ऐसी ही भीड़। पर फाल्गुन का महीना हो, एकादशी का दिन। तो क्या कहने। अपन मित्र को केशवकुंज में उतार इस्कान मंदिर की ओर बढ़े। कुंज गलियों और इस्कान की बात बाद में। पहले केशवधाम की बात। इस बार आरएसएस की प्रतिनिधि सभा वृंदावन में बैठी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट