Monthly archive

February 2008

चार साल बाद आज बारी आम आदमी की

आर्थिक सर्वेक्षण पेश हुआ। तो अपन को नरेंद्र मोदी की याद आई। अट्ठाईस जनवरी को बीजेपी काउंसिल में बोले। तो चिदंबरम को चुनौती दी- 'एनडीए शासित राज्यों की विकास दर निकाल दो। तो विकास दर की पोल खुल जाएगी। वाजपेयी राज से कम निकलेगी।' अब 8.7 फीसदी विकास दर देख सीताराम येचुरी बोले- 'विकास दर से सर्विस सेक्टर निकाल दो। तो विकास दर एक फीसदी से कम निकलेगी।' आप येचुरी के तेवरों से अंदाजा लगा लें। चुनाव की संभावनाएं बनने लगी या नहीं। याद करो, जब पांच दिसंबर को शीत सत्र में एटमी करार पर बहस हुई। लेफ्ट ने एनडीए के साथ वाकआउट किया। तो अपन ने छह दिसंबर को क्या लिखा था। अपन ने लिखा था- 'लेफ्ट ने गलती सुधारी, लोकसभा पर लटकी तलवार।' चौथे ही दिन दस दिसंबर को बीजेपी ने तुरत-फुरत फैसला किया।

राबर्ट आए, तो दिखा करार का साइड इफेक्ट

एटमी करार पर संसद गर्म होगी ही। करार के साइड इफेक्ट अभी से सामने आने लगे। अपन इन साइड इफेक्टों का छह महीने पहले खुलासा कर चुके। सो लब्बोलुबाब यह- बजट सत्र सरकार की शामत बनेगा। इसमें अपन को कोई अंदेशा नहीं। फिलहाल किसानों की खस्ता हालत मुद्दा। आगे-आगे देखिए। सरकार की हालत खस्ता दिखेगी। यों तो एनडीए-यूएनपीए में छत्तीस का आंकड़ा। पर किसानों के मुद्दे पर दोनों एकजुट। बुधवार दूसरे दिन भी संसद नहीं चली। एनडीए-यूएनपीए चुप होंगे। तो यूपीए खुद ही हंगामा खड़ा करेगा। यूपीए का मुद्दा होगा- राज ठाकरे। राज के मुद्दे पर सारी संसद एकजुट दिखेगी।

अब लालू का शाइनिंग इंडियन रेल भुलावा

अपने नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस का 'चक दे गुजरात' नहीं चला। पर लालू ने 'चक दे रेलवे' बजट पेश किया। चुनावी साल में लालू भी चिदंबरमी हो गए। गुरुदास दासगुप्त की यह टिप्पणीं लालू को नागवार गुजरी होगी। चिदंबरम के एलान देखन में भले लगे, घाव करे गंभीर। भले लगने की बात चली। तो लालू ने भी इस बार कुलियों से खूब वाह-वाही लूटी। कुली फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कहा था- 'सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं। लोग आते हैं, लोग जाते हैं। और हम यों ही खड़े रह जाते हैं।' सो लालू ने कुलियों को गैंगमैन की नौकरी का एलान किया। तो सालों से प्लेटफार्म पर दौड़-भाग करते कुली चहक उठे।

अभिभाषण में इतना हल्ला पहले नहीं देखा

तो हो गया अपनी प्रतिभा ताई के भाषण का श्रीगणेश। सब ठीक रहा। तो अगले साल दूसरा अभिभाषण भी यूपीए सरकार लिखेगी। अगले साल ताई को दो अभिभाषणों का मौका। सब ठीक-ठाक न रहा तो। सरकार इसी साल धड़ाम हुई, तो अलग बात। अपन पहली फरवरी को अपना अंदेशा बता चुके। जब अपन ने लिखा- 'चुनाव ही न करा दे रामसेतु-एटमी करार।' अपन ने तब लिखा था- 'मनमोहन फरवरी में लेफ्ट से पंगा नहीं लेंगे। पहले बजट निपटाएंगे। फरवरी तो चिदंबरम-चिदंबरम करते निकल जाएगी। पर मार्च में करात-मनमोहन आमने-सामने होंगे।' अपना अंदाज सही साबित होने लगा।

सेन्ट्रल हॉल के श्री गणेश में टीआरएस का भी फच्चर

तो संसद का बजट सत्र आज से शुरू । सत्र से पहले इतवार को सोमनाथ चटर्जी ने मीटिंग बुलाई। तो विपक्ष का रुख साफ हो गया। सरकार की नीयत भी साफ हुई। सबसे अहम सवाल तो आडवाणी ने उठाया। उनने सामने बैठे मनमोहन सिंह से पूछा-''कर्नाटक पर आपका इरादा क्या है। तीन महीने बीतने को हो गए। डीलिमिटेशन पर जान बुझकर नोटिफिकेशन में देर लगाई। ताकि कर्नाटक में छह महीने राष्ट्रपति राज बढाया जाए। पर अभी भी वक्त। सरकार चुनावों में बाधा खड़ी न करें। '' मनमोहन ने मुंह नहीं खोला। नीयत साफ होती। तो साफ-साफ कह देते-''सरकार तय समय में चुनाव में अड़चन नहीं बनेगी।''

सेंट्रल हाल का श्रीगणेश शुभ करने की कवायद

अपन संसद सत्र पर लिखते-लिखते भूल न जाएं। सो पहले बता दें। गोपीनाथ मुंडे राजस्थान के प्रभारी बने रहेंगे। चुनाव से पहले प्रभारी बदलने का संकट खत्म। शुक्रवार को मुंडे-आडवाणी में लंबी गुफ्तगू हुई। इसमें यह तय हुआ। आप अंदाजा लगा सकते हैं। अब आडवाणी-राजनाथ का तालमेल बैठने लगा। आडवाणी अब राज्यों पर भी निगाह रखेंगे। वैसे फिलहाल आडवाणी की नजर बजट सत्र पर। मनमोहन-सोनिया की घेराबंदी होगी। तीन मुद्दे अहम। महंगाई, आतंकवाद और महिला आरक्षण। महिला आरक्षण का मुद्दा आडवाणी ने रणनीति के तहत पकड़ा। सत्र से ठीक पहले महिला रैली से मुद्दा भाजपा के पाले में।

चुनावी बजट में आम आदमी निशाने पर

अपन एंजियो प्लास्टी कराकर लौटे। तो पाकिस्तान में चुनाव नतीजे आ रहे थे। सो तीन दिन अपन ने हाल-ए-पाक बताया। पाक में अब हंगामे से पहले की खामोशी। बुश-मुशर्रफ की जमहूरियत विरोधी साजिश अभी भी जारी। साजिश क्या रुख अख्तियार करेगी? अपन को दिल थामकर इंतजार करना होगा। तब तक अपन अपनी आबो-हवा की पड़ताल करें। राजनीतिक आबो-हवा की बात तो करेंगे ही। पहले हाल-ए-मौसम बता दें। मौसम ने बहुत डर-डरकर करवट ली। फरवरी का आखिरी हफ्ता आ गया। सर्दी जाने का नाम नहीं ले रही। शुक्रवार को तापमान दस डिग्री से नीचे नहीं गया। तो दिल्ली वालों ने राहत की सांस ली। अब तो एक-आध दिन में स्वाटर उतरेंगे ही। अब बात राजनीतिक आबो-हवा की।

मुशर्रफ से पहला टकराव तो इफ्तिखार पर

तो पाकिस्तान में वकील फिर सड़कों पर आ गए। परवेज मुशर्रफ की पार्टी का यह हाल न होता। अगर उनने तीन नवंबर को ज्यूडिसरी पर हमला न किया होता। अब तो मुशर्रफ को अपने दिन गिनने चाहिए। अमेरिका भी कितनी मदद करेगा। रिपब्लिकन पार्टी का यों भी अमेरिकी चुनाव जीतना मुश्किल। ओबामा हो या हिलेरी। जीतेंगे डेमोक्रेट। बुश की नीतियां कुछ दिन की मेहमान। तब तक मुशर्रफ बच गए। तो बच गए। उसके बाद तो मुशर्रफ का मुश्किल। अपन आसिफ जरदारी का रुख तो नहीं जानते। पर इतना तो साफ- वह अमेरिकी दबाव में। सो जजों की बहाली पर उतने गर्म नहीं। जितने नवाज शरीफ हो चुके।

पाक की जमहूरियत में अमेरिकी फच्चर

अपन ने कल पाकिस्तान में जमहूरियत का जिक्र किया। अपन को लगा- जमहूरियत ने पाक में कदम रख लिए। अपने लिखे की स्याही अभी सूखी भी नहीं होगी। चुनावी नतीजों के पेंच फंसने लगे। अपन ने लिखा था- 'बेनजीर की हत्या न हुई होती। तो चुनावी नतीजे कुछ और होते।' अगर अपन पाकिस्तानी आवाम का जनादेश देखें। तो परवेज मुशर्रफ के तो खिलाफ। पर बेनजीर की पीपीपी-नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग के हक में। पर पीपीपी-मुस्लिम लीग में छत्तीस का आंकड़ा रहा। अलबत्ता अपन कहें- 'ईंट कुत्ते का बैर रहा।' तो गलत नहीं होगा।

पाक में जमहूरियत का आगाज काबिल-ए-तारीफ

जमहूरियत के लिए अच्छा दिन। एक साथ दो खबरें आई। क्यूबा से फिदेल कास्त्रो ने रिटायरमेंट ली। तो अपन को क्यूबा में जमहूरियत का आगाज दिखा। अपने लेफ्टिए यह पढ़कर जरूर खफा होंगे। पर क्यूबा में पचास साल से कम्युनिस्ट राज चला। जो अब आगे ज्यादा नहीं चलना। कास्त्रो का इंदिरा के जमाने से अपने साथ गहरा रिश्ता रहा। कास्त्रो-इंदिरा का आलिंगन काफी मशहूर हुआ। फिदेल कास्त्रो ने यों तो डेढ़ साल पहले ही हुकूमत छोड़ दी थी। पर अब रिटायरमेंट का एलान हुआ। कास्त्रो बीमार पड़े। तो अपने भाई को कमांडर इन चीफ बना दिया। पता नहीं, कम्युनिस्ट इसे कैसे सही ठहराएंगे।

संत वेलेंटाइन तो आत्म हत्या कर लेते

अपना दिल तो वेलेंटाइन डे से चार दिन पहले ही पंचर हो गया। इस बीच बहुत कुछ हो गया। राज ठाकरे गिरफ्तार हो गए। पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया। डी-लिमिटेशन नोटिफाई हो गया। अपन ने पहले ही कहा था- 'दस फरवरी के बाद जारी करेंगे। कर्नाटक में चुनाव टालने की साजिश।' अब देखना चुनाव टालने की पूरी कोशिश होगी। और भी बहुत कुछ हुआ। तीन मंत्री प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हो गए। अपन पचौरी-दासमुंशी का तो पांच महीने पहले ही बता चुके। सोनिया को फैसला लेने में बहुत वक्त लगा। लगे हाथों सैफुद्दीन सोज भी मजबूत हुए। गैर कांग्रेसी राज्यों में मंत्री पार्टी की कमान सभाल लें। यह फार्मूला पचौरी का था।

असुविधा के लिये खेद है

अजय सेतिया जी के स्वस्थ न होने की वजह से कुछ दिनो के लिये इंडिया गेट न्यूज पर नये लेख नहीं छपेंगे। असुविधा के लिये खेद है।

अजय जैन,

जाल संचालक

इंडिया गेट न्यूज

जनता बेहाल महंगाई से नेता तू-तू, मैं-मैं में मशगूल

अपनी मनमोहन सरकार का यह आखिरी बजट तो नहीं। पर क्या पता लगता है। चुनावी साल में मनमोहन ज्यादा फिक्रमंद। लोकसभा जितने ही महत्वपूर्ण हैं इस साल के विधानसभा चुनाव। गुजरात नतीजों की हार से सोनिया अब तक नहीं उबरी। अब मनमोहन गलतियां सुधारने के मूड में। बजट में रियायतों का पिटारा खुलेगा। चिदंबरम की ऐंठ भी अब खत्म। वरना आम आदमी की हर योजना में अड़ंगा लगाते थे। अबके कांग्रेस दफ्तर आए। तो मजबूरियां नहीं गिनाई। अपने मनमोहन सिंह शुक्रवार को महाराष्ट्र में थे। वही महाराष्ट्र जहां किसानों की आत्म हत्याएं नहीं रुक रही।

राज की लगाई आग में मीडिया ने डाला घी

राज ठाकरे की लगाई आग में गुरुवार को मीडिया ने घी डाला। यों घी डालने का ठीकरा फोड़ा गया लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना के सिर। संवैधानिक हस्तियों के साथ भी खिलवाड़ कर सकता है विजुअल मीडिया। अपनी टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा। यह इसका ताजा उदाहरण। दिल्ली की ट्रेफिक प्राब्लम कौन नहीं जानता। आए दिन ब्ल्यू लाइन का कहर हजार भर जानें ले चुका। रेड लाइट क्रासिंग रोकने की सारी कोशिशें नाकाम। दूर मत जाओ। आप दिल्ली का चंडीगढ़ से ही मुकाबला कर लो। मुंबई से करोगे। तो दिल्ली वाले शर्मसार होंगे ही। चंडीगढ़ हो या दिल्ली। बेंगलुरु हो या चेन्नई।

असली लोकतंत्र तो है अमेरिका में

भारत में अमेरिकी चुनाव पर इतनी दिलचस्पी पहले नहीं देखी गई, जितनी इस बार देखी जा रही है। लोग हैरान हैं कि दो साल पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पिछले कुछ महीनों से डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियां अपने उम्मीदवारों का फैसला करने की प्रक्रिया अपना रही हैं। उम्मीदवार चयन की यह प्रक्रिया सितंबर के पहले हफ्ते में खत्म होगी। डेमोक्रेटिक पार्टी का अधिवेशन डेनेवर, कोलोरेडो में 25 से 28 अगस्त तक होगा, जबकि रिपब्लिकन अधिवेशन मिन्नियापालिस, सेंटपाल, मिनेसोटा में पहली से चार सितंबर तक रखा गया है। इसके बाद राष्ट्रपति का चुनाव 4 नवंबर को होगा और चुना गया राष्ट्रपति 20 जनवरी 2009 को शपथ लेगा। उम्मीदवारों के चयन की इस प्रक्रिया को देखकर स्पष्ट है कि भारतीय राजनीतिक दल आंतरिक लोकतंत्र के मामले में अभी कितनी पिछड़ी हुई हैं।

आओ वापस सोलहवीं सदी में चलें

इक्कीसवीं सदी में जाने वाले अचानक सोलहवीं सदी में दिखे। तो अपने पांवों तले से जमीन निकल गई। अपने मनमोहन सिंह का जवाब नहीं। पता नहीं कहां से लाकर लॉ कमिशन का चेयरमैन बनाया। एआर लक्ष्मणन ने बुधवार को अपने हंसराज भारद्वाज को रिपोर्ट सौंपी। तो मनमोहन के केबिनेट मंत्रियों की हवाईयां उड़ गई। रिपोर्ट कहती है- 'लड़कों को 18 साल का होने पर शादी का हक मिले।' अपने वाजपेयी बजरिया लॉ कमिशन ही उम्र बढ़ाकर गए थे। अब मनमोहन सिंह ने अपने लॉ कमिशन की रिपोर्ट मानी। तो अपन इक्कीसवीं सदी में नहीं। अलबत्ता सोलहवीं में ही जाएंगे। वाजपेयी जमाने में महिला आयोग की अध्यक्ष थी पूर्णिमा आडवाणी। रिपोर्ट देख पूर्णिमा भड़की हुई थी। पूर्णिमा के समय में भी शादी के लिए लड़की की उम्र अट्ठारह। लड़के की उम्र कम से कम इक्कीस तय हुई थी।

बेनजीर से सबक लेकर ही रैलियां करेंगे लाल जी

वैसे इतनी जल्दी भी क्या थी। चौदहवीं लोकसभा का अभी सवा साल बाकी। सवा साल आडवाणी घूमते रहे। तो चुनाव आते-आते यों भी थक जाएंगे। अपन को तो पहले ही अंदेशा था। पता नहीं किस अनाड़ी ने सलाह दी होगी। पीएम-इन-वेटिंग को जरा इंतजार तो करना चाहिए। रैलियां जल्दी हो जाएंगी। तो जल्दी पीएम नहीं बन जाएंगे। अपन ने पाकिस्तान की पीएम-इन-वेटिंग का हाल तो देखा ही। मुशर्रफ भी बेनजीर को समझा-समझाकर थक गए। पर बेनजीर नहीं मानी। रैलियों पर रैलियां करती गई। यह संयोग ही, जो बेनजीर-आडवाणी दोनों सिंधी। दोनों कराची में पैदा हुए। यह भी संयोग। जो दोनों एक ही वक्त पीएम इन-वेटिंग बने।

दो भाईयों की जंग में पिसते बेगुनाह

अपन लेफ्ट-कांग्रेस की जंग को दो भाईयों की जंग कहें। तो कोई बुराई नहीं। विदेश और आर्थिक नीति पर दोनों भाईयों की तू-तू, मैं-मैं जारी। इसी तू-तू, मैं-मैं में अब प्रणव दा धमकियों पर उतर आए। धमकियां भी ऐसी, पूछो मत। लेफ्टियों की मांद कोलकाता में जाकर बोले- 'एटमी करार सिरे न चढ़ा। तो समस्याएं खड़ी होंगी।' समस्याओं में उनने बताए आर्थिक प्रतिबंध। लेफ्टियों की खिल्ली उड़ाते हुए कहा- 'सत्तर-अस्सी के दशक में कम्युप्टर का विरोध कर रहे थे। अब एटमी करार का।' दादा की बात सोलह आने सही। पर प्रतिबंध तो पहले से मौजूद। अब और प्रतिबंध लगे। तो जिम्मेदार होंगे मनमोहन सिंह।

अंधा बांटे रेवड़ियां, मुड-मुड अपनो को दे


यूपीए सरकार ने पिछले छह सालों की तरह इस बार भी किसी को भारत रत्न नहीं देकर खुद को भंवर जाल से तो निकाल लिया, लेकिन भारत रत्न सम्मान खुद भंवर जाल में फंस गया। परंपरा के मुताबिक विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी का यह अधिकार था कि वह अपनी तरफ से प्रधानमंत्री को किसी का नाम सुझाते। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी का नाम पेश किया, इसमें इतनी बुराई इसलिए नहीं है, क्योंकि कांग्रेस सरकारें अपने ही प्रधानमंत्री और नेता को भारत रत्न और दूसरे नागरिक सम्मान देती रही है। बुराई यह थी कि आडवाणी ने प्रधानमंत्री को भेजी गई सलाह प्रेस को लीक कर दी। कम से कम ऐसी परंपरा पहले नहीं थी।

कंपकपाने वाली ठंड में रामसेतु की गर्मी

आमतौर पर पहली फरवरी इतनी ठंडी नहीं होती। दिल्ली का सामान्य तापमान नौ डिग्री होना चाहिए था। पर अबके ठंड ने अपने तेवर दिखा दिए। रामभक्त कह सकते हैं- 'यूपीए सरकार के रामसेतु विरोधी होने पर शिव ने रौद्र रूप दिखा दिया।' रामसेतु की बात चली। तो बताते जाएं। अपन को नहीं लगता- सरकार मार्च में भी हल्फिया बयान देगी। अंबिका सोनी कह रही थी- 'एएसआई ने कोई सर्वेक्षण नहीं किया। जब तक खुद सर्वेक्षण न करे। कोई हल्फिया बयान नहीं देगा। जिन एक्सपर्टो ने सर्वेक्षण किया। जिनका दावा- रामसेतु किसी आदमी ने नहीं बनाया। वही सुप्रीम कोर्ट में हल्फिया बयान दे।'