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January 2008

चुनाव ही न करा दें रामसेतु-एटमी करार

अपन को तो नहीं लगता सरकार गिरेगी। पर राम जी कब क्या करा दें। कौन जाने। चाय की एक प्याली के तूफान ने ग्यारहवीं लोकसभा भंग करा दी थी। याद है सुब्रह्मण्यम स्वामी की चाय पार्टी। जहां दो महिलाओं के मिलन ने वाजपेयी सरकार गिरा दी। पर वाजपेयी को उसका फायदा ही हुआ। चुनाव के बाद बारहवीं लोकसभा बनी। तो अटल को किसी चंद्रबाबू की चिट्ठी का इंतजार नहीं करना पड़ा। पर बात हो रही है तेरहवीं लोकसभा की। जिसका राम नाम कब सत्य हो जाए। कोई भरोसा नहीं। एक तरफ लेफ्ट का डंडा। दूसरी तरफ डीएमके का फंडा। रामसेतु तोड़ सेतुसमुद्रम बनाना डीएमके का एजेंडा। तो अमेरिका से एटमी करार पर लेफ्ट का अड़ंगा। डीएमके का फंडा और लेफ्ट का डंडा मनमोहन के गले की हड्डी।

महिला आरक्षण कांग्रेस के जी का जंजाल

सांप्रदायिकता भड़काने वाली सीडी का भूत फिर निकल आया। खुन्नस निकालने मायावती का भी जवाब नहीं। जिस लालजी टंडन के हाथ पर राखी बांधती थी। उसी हाथ में हथकड़ी का इरादा। अपने राजनाथ सिंह भी लपेटे में। यूपी चुनाव के दौरान सीडी का बवाल खड़ा हुआ। तो चुनाव आयोग के फरमान पर एफआईआर दायर हुई थी। बीजेपी ने सीडी से नाता तोड़ा, वापस ली। आयोग के कहने पर माफी भी मांगी। पर मायावती ताज घोटाले की खुन्नस निकालने पर उतारू। वाजपेयी के समय ताज घोटाले में न फंसती। तो बीजेपी-बसपा शादी भी न टूटती। अब जब मायावती ने सीडी का भूत निकाला।

एंटी इनकमबेंसी में निपटेंगे एमएलए

यों भले ही बीजेपी काउंसिल शांति से निपट गई। पर बाहर से दिख रही शांति, अंदर से वैसी नहीं। आखिर तक खुसर-पुसर चलती रही। वर्किंग कमेटी की शुरूआत राजनाथ ने करनी थी। समापन भाषण आडवाणी का था। रात साढ़े सात बजे जावड़ेकर की प्रेस कांफ्रेंस तय थी। पर बिना समापन भाषण के वर्किंग कमेटी निपटी। जावड़ेकर को इधर-उधर की बात करनी पड़ी। आखिर क्यों नहीं हुआ आडवाणी का भाषण? अपनी वसुंधरा राजे की गैर हाजिरी भी कौतुहुल का मुद्दा रही। काउंसिल में आई भी। तो अपने भाषण तक मंच पर नहीं पहुंची। भाषण में भी बाकी मुख्यमंत्रियों पर टिप्पणीं कर गई। बोली- 'अभी सब लोग ताल ठोककर गए हैं कि किसने कितनी तोपें बजाई हैं।' यह पहले बोलने वाले रमण, शिवराज पर कटाक्ष था। वह तो मोदी का भाषण सुने बिना ही उठ गई थी। उठते-उठते बैठी।

बीजेपी का चुनावी मंत्र - महिलाएं और मोदित्व

बीजेपी वर्किंग कमेटी में बिना बोले ही छा गए मोदी। सोमवार को काउंसिल में बोले, तो छाना ही था। पर राजनाथ का मोदीमंत्र बाकी सीएम को रास नहीं आया। मोदी की तारीफ से जैसे जल-भुन गए हों। अपनी वसुंधरा का वर्किंग कमेटी में नहीं आना खला। अपन को नहीं, हाईकमान को। काउंसिल में भी दोपहर बाद पहुंची। तो अपन ने लंबे समय बाद दिल्ली के खबरचियों से घुलते-मिलते देखा। शायद बिगड़ी छवि सुधारने की कोशिश। कुरेदा, तो राजनाथ के मोदी मंत्र से उखड़ी दिखी। बोली- 'सब राज्यों की परिस्थितियां अलग-अलग। सब जगह एक मंत्र नहीं चल सकता। कोशिश तो कर रहे हैं।'

गणतंत्र दिवस के दुकानदार

अपनी नई राष्ट्रपति का देश के नाम पहला संदेश। दूरदर्शन-आकाशवाणी से जारी हुआ। एक जमाना था- जब भाषण सुनने को देश थम जाता था। पर अब लोगों की दिलचस्पी घटने लगी। नेताओं की कथनी-करनी एक सी रहती। तो राष्ट्रपति के भाषण का बजट की तरह इंतजार होता। पर जब प्रतिभा पाटिल देश को संदेश दे रही थी। तो सारे प्राइवेट खबरिया चैनल किडनी रैकेट दिखा रहे थे। गुड़गांव में चल रहा था दुनिया का सबसे बड़ा किडनी रैकेट। अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, इटली तक से आते थे किडनी के ग्राहक। बात इटली की चली। आप चौंकिए नहीं। अपन सोनिया की बात नहीं कर रहे। अपन बात कर रहे हैं कार्ला ब्रूनी की।

मुर्गेबाजों के रोजे शुरू हुए देशभर में

king-cock.jpgएक ऐसा प्रेस नोट जो आया नहीं। पर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चुहुलबाजी होती रही। बुध्ददेव सरकार लंबी तानकर सोई रही। सरकार वक्त पर जागती। तो सिंगूर, नंदीग्राम, नंदलाल मार्केट की आग वक्त पर बुझ जाती। बुध्ददेव लंबी तानकर न सोते। तो महाराष्ट्र की तरह बर्ड फ्ल्यू को वक्त पर काबू पा लिया जाता। गुरुवार को केबिनेट मीटिंग हुई। तो अपने शरद पवार ने बर्ड फ्ल्यू का हिसाब-किताब दिया। केबिनेट के बाद प्रियरंजन दासमुंशी बता रहे थे। अब दासमुंशी बोलेंगे, तो राजनीतिक तड़का लगाएंगे ही। सो उनने कहा- 'लेफ्टियों की सरकार ने एक हफ्ते देरी से केंद्र को जानकारी दी। बर्ड फ्ल्यू शुरू हुआ था चार जनवरी को। बंगाल सरकार ने केंद्र को बताया ग्यारह जनवरी को।' पर अपन बात आगे बढ़ाएं। पहले केंद्र सरकार की क्लास लेते जाएं।

सरकोजी न हुए मुसीबत हो गई

अपने गणतंत्र का महत्व देखिए। जनता के नेता जनता से सुरक्षित नहीं। गणतंत्र दिवस आते ही दिल्ली हर President Sarkozy will be India’s Guest on Republic Dayसाल किला बनने लगी। इंडिया गेट की सैर आम लोगों के लिए बंद। नेताओं की सुरक्षा की बात चली। तो एक दिलचस्प किस्सा सुनाते जाएं। अपनी यूपी की सीएम मायावती आजकल बेहद डरी हुई हैं। दो बार शिवराज पाटिल को एसपीजी के लिए लिखकर भेजा। मायावती को गैर कानूनी मांग पर परहेज नहीं। कोई आम आदमी गैर कानूनी काम करे। तो जेल भेज दिया जाए। पर एसपीजी की राजनीति के आगे सब बौने। केंद्र सरकार से जवाब नहीं बन पा रहा। सो मायावती ने 23 जनवरी को तीसरी चिट्ठी भिजवाई।

मोनार्क की जगह महारानी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर होम मिनिस्ट्री के दस्तावेज डि-क्लासीफाईड हुए। पर सारे दस्तावेज अभी भी नहीं। सच जानने के लिए तीन आयोग बने। कांग्रेस सरकारों ने तीनों आयोगों में अडंग़ा लगाया। होम मिनिस्ट्री के दस्तावेज भी कभी नहीं दिए। पर आरटीआई के तहत अब जब दस्तावेज दिए। तो उसमें कुछ नया नहीं। वही कांग्रेसी सरकारों का पुराना स्टेंड- 'नेताजी 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में मारे गए थे।' यूपीए सरकार के ताजा कदम का बंगाल में क्या असर होगा। अपन नहीं जानते। पर नेहरू परिवार शक से बाहर नहीं होगा। जो दस्तावेज डि-क्लासीफाईड नहीं हुए। अब उनकी जंग होगी।

मिस्टर ब्राउन यह दर्द तो आपका दिया है

पाकिस्तान में अपने एक अजीज दोस्त हैं- शाहिद अब्दुल कयूम। वहां के एक टीवी चैनल में सीनियर सब एडिटर। चार साल पहले अपन जब पाक गए। तो कयूम से दोस्ती हुई। फिर गाहे--गाहे बजरिया ई-मेल बातचीत होती रही। कभी कभार एसएमएस भी। कयूम से हुई ताजा चर्चा पर आप भी गौर फरमाएं। लिखते हैं- 'मेरा देश जल रहा है। हालात बद से बदतर हो रहे हैं। आपने भी सीमा पार की बुरी खबरें सुनी होंगी। फिदायिन हमले, विद्रोही गतिविधियां। भुट्टो की हत्या के बाद राजनीतिक संकट। हमारी सीमाओं में जंग छेड़ने की अमेरिकी धमकियां। हमारे परमाणु बम की सुरक्षा का सवाल। आप क्या सोचते हैं- इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है?'

अंदरूनी लोकतंत्र से ही उपजेगा जनाधार

अगर इस साल लोकसभा चुनाव नहीं भी हुए, तो भी आम चुनावों में अब सिर्फ सवा साल बाकी रह गया है। राजग ने छह साल केंद्र में सरकार चलाई, लेकिन आखिरी दिनों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी, जितनी इस समय कांग्रेस की दिखाई देने लगी है। दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव जीतने से भारतीय जनता पार्टी इतनी उत्साहित थी कि लोकसभा चुनाव वक्त से पहले करवा दिए। लोकसभा चुनावों में भाजपा से आठ सीटें ज्यादा जीतने से कांग्रेस इतनी उत्साहित थी कि उसे जनादेश मान बैठी।

महिलाओं को टिकट बीजेपी का नया पैंतरा

अपन ने बीजेपी की चुनावी रणनीति तीस दिसंबर को बताई थी। तब से टुकड़ों-टुकड़ों में बीजेपी तीन बार खुलासा कर चुकी। तीसरा खुलासा शुक्रवार को सुषमा ने किया। पर टुकड़ों-टुकड़ों में जो बातें सामने आईं। अपन ने सारी की सारी तीस दिसंबर को लिख दी थीं। उन्हीं में से एक थी- 'पिछले छह चुनावों में जीती 300 सीटों पर निशाने की।' यह खुलासा सुषमा स्वराज ने पंद्रह जनवरी को किया। उन्हीं में से एक थी- 'महिलाओं को टिकट की।' शुक्रवार को यह खुलासा हुआ। सुषमा स्वराज के घर हुई एक ग्रुप मीटिंग को छोड़ दें। तो शुक्रवार को तीसरी मीटिंग आडवाणी के घर हुई। आडवाणी के घर की बात चली। तो याद करा दें- आडवाणी की जब संघ से कुट्टी शुरू हुई। तो संघ के एक खेमे को एतराज इसी बात पर था।

नगालैंड वाला फैसला गोवा में क्यों नहीं

अपन को लगता है कांग्रेस ने अभी सबक नहीं सीखा। सत्ता हथियाने के बेजा तरीकों ने कांग्रेस को कमजोर किया। नौ साल बाद सत्ता में लौटी। तो देश को उम्मीद थी कांग्रेस ने सबक सीख लिया होगा। सत्ता के लिए लोकतंत्र से बलात्कार अब नहीं करेगी। पर सत्ता में आते ही कांग्रेस फिर वही करने लगी। लोकतंत्र से बलात्कार के लिए गवर्नरों, स्पीकरों का बेजा इस्तेमाल। पहले बूटा सिंह-सिब्ते रजी ने सुप्रीम कोर्ट की डांट खाई। अब नगालैंड के बाद गोवा ताजा मिसाल। नगालैंड साठ सीटों की विधानसभा। गोवा चालीस की। एक-दो एमएलए भी इधर-उधर हो जाएं। तो सरकार पर संकट। छोटे राज्यों से सबक लेना चाहिए।

पश्चिम ने शुरू की, एशिया रोकेगा सभ्यताओं की जंग

बुधवार को भी अपनी दिल्ली और दिनों की तरह रही। अभिषेक मनु सिंघवी तेलंगाना-बुंदेलखंड पर उलझे रहे। प्रकाश जावड़ेकर बोफोर्स घोटाले में सीबीआई की कारगुजारी पर। मधु कोड़ा अपनी सरकार बचाने दिल्ली दरबार में घूमते रहे। पिछले हफ्ते अर्जुन मुंडा दिल्ली आए। तो अपन को बता रहे थे- 'झारखंड की गद्दी फिर आ रही है।' यों बिल्लियों की लड़ाई में बंदरों का ही फायदा। पर दिल्ली में राजनीति के अलावा भी बहुत कुछ। कम से कम दो जगह अपनी दिलचस्पी बनी। एक था ताज पैलेस में जागरण कनक्लेव। जहां लाल कृष्ण आडवाणी सभ्यताओं की जंग पर बोले। दूसरा था एसोचम में जीएफसीएच कांफ्रेंस। ग्लोबल फाउंडेशन फॉर सिविलाइजेशनल हारमोनी।

आग बुझ नहीं रही, ऊपर से बर्ड फ्ल्यू की आफत

अपने बंगाल में 30 साल से कम्युनिस्ट सरकार। इतना लंबा अर्सा स्थाई शासन मिल जाए। पर एक मार्केट की आग न बुझा सके। तो समझ लो- तीस साल क्या किया धरा होगा। बंगाल में उद्योगों का बंटाधार तो हुआ ही। गरीबी की हालत देखने लायक। पिछड़ेपन का ठीकरा अपन किसी और के सिर नहीं फोड़ सकते। सिर्फ नेता ही जिम्मेदार। फिर भी नेता नक चढ़े। बंगाल के फायर ब्रिगेड मंत्री प्रतिम चटर्जी का रवैया देखो। सोमवार को अपने राजस्थानी सांसद सुभाष महेरिया कोलकाता गए। साथ में दो मंत्री कालीचरन सर्राफ और खेमा राम मेघवाल भी थे। अपनी वसुंधरा राजे ने हालात जानने भेजा। पर नक चढ़े प्रतिम चटर्जी मिलने तक को राजी नहीं हुए। बोले- 'पहले से मुलाकात का वक्त क्यों नहीं मांगा।'

भारत की ताकत का लोहा चीन ने माना

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा को काफी हद तक सफल कहना उचित रहेगा। ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के दूसरे देश की यात्रा के दौरान कोई विवाद खड़ा होता हो। हाल ही के वर्षों की ऐसी दो घटनाएं तो गिनाई जा सकती हैं। पहली घटना डेनमार्क की है, जब डेनमार्क के प्रधानमंत्री एंडर्स फोग ने भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी के साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस के समय भारत से सीमा पर तनाव घटाकर पाकिस्तान से बातचीत करने की गुहार लगाई। विवाद इतना जोर पकड़ गया था कि भारत ने कड़ा एतराज जताया और अगले दिन की साझा प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री फोग ने पाकिस्तान पर घुसपैठ रोकने का दबाव बनाने की बात कही।

एटमी ईंधन को चीन भी राजी, अब लेफ्ट लाचार

अपने गोपालस्वामी ने तीन राज्यों में चुनावी बिगुल बजा दिया। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड। तीनों एसेंबलियों की मियाद मार्च में खत्म। पर कर्नाटक में चुनावी बिगुल नहीं बजा। अपने नरेंद्र मोदी सोमवार को पहुंचे तो चेन्नई। पर बात बेंगलुरु की बोले। कहा- 'बीजेपी लोकसभा चुनाव जीतने का श्रीगणेश दक्षिण से करे।' चेन्नई में बीजेपी वर्करों ने मोदी से जीत का मंत्र पूछा। तो वह बोले- 'महिलाओं की अहम भूमिका रही।' सो मोदी तमिलनाडु की बीजेपी को जीत का मंत्र दे आए।

एटमी करार के दो फैसलाकुन महीने

अपन ने बारह अक्टूबर को लिखा था- 'तो रूस से एटमी करार तोड़ेगा लेफ्ट से गतिरोध। ' हू-ब-हू वही हुआ। मनमोहन सिंह रूस गए। लौटे भी नहीं थे। लेफ्ट ने आईएईए से बात की हरी झंडी दे दी। यह अलग बात। जो रूस से एटमी करार नहीं हुआ। जिस पर लेफ्ट लाल-पीला भी हुआ। तब प्रणव दा ने सफाई दी थी- 'जब तक आईएईए के सेफगार्ड तय न हों। जब तक एनएसजी की हरी झंडी न हो। तब तक किसी से करार का कोई फायदा नहीं।' पर अपन ने बारह अक्टूबर को यह भी लिखा था- 'आईएईए-एनएसजी समझौते तीन महीने ठंडे बस्ते में पड़ेंगे।' सो तीन महीने कुछ नहीं हुआ।

रोटी, कपड़ा, मकान और नैनो

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की सरकार ने आम आदमी के हित में कितने काम किए, इसका हिसाब-किताब तो अगले चुनावों में ही पता चलेगा। वैसे एक वर्ग का मानना है कि पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात ने अपना फैसला सुना दिया है। इस बड़े तबके के हिसाब से मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी आम आदमी की बात करके सत्ता तक तो पहुंचे पर आम आदमी को कोई फायदा नहीं हुआ। दूसरी तरफ आजादी से पहले के भारत के दो बड़े औद्योगिक घरानों बिड़ला और टाटा ने अचानक आम आदमी की फिक्र करना शुरू कर दिया है।

आईएईए से बात का पीएम के चीन दौरे से सीधा रिश्ता

मनमोहन सिंह आज रात चीन उड़ेंगे। नेहरू हों या वाजपेयी। सवाल चीन का हो। तो दोनों गलतियों के पुतले। नेहरू ने भारत-चीन भाई-भाई का डंका पीट धोखा खाया। अपनी 90 हजार वर्ग किमी जमीन अब भी चीन के कब्जे में। वह 21 नवंबर 1962 किसे भूलेगा। जब चीन ने बीस किमी घुसकर एकतरफा सीजफायर किया। जमीन वापस लेने के अपने संसदीय प्रस्ताव पर धूल जम चुकी। प्रस्ताव तो पाक के कब्जे वाले कश्मीर को लेने का भी। पर किसी पीएम की हिम्मत नहीं। कारगिल के वक्त भी जब अपना हाथ ऊपर था। तो वाजपेयी की हिम्मत नहीं हुई। आगे बढ़ रही फौजें मढ़ी तक पहुंच जाती। तो वाजपेयी भारत रत्न हो जाते।

तो सोनिया के लिए बेल्लारी के रास्ते बंद

ऑटो एक्सपो में लखटकिया कार दिखाने रतन टाटा खुद आए। तो बोले- 'कार के नाम की बात चली। तो सुझाव आया- बुध्दू रखा जाए।' यों बुध्ददेव भट्टाचार्य सिंगूर मामले में बुध्दू तो साबित नहीं हुए। पता नहीं यह सुझाव क्यों आया? टाटा ने भले सुझाव नहीं माने। पर चुटकी तो कर ही गए। उनने कहा- ''दूसरा सुझाव 'ममता' नाम का था। आखिर ममता के बावजूद कार आएगी।'' पर वह बुध्ददेव-ममता के चक्कर में नहीं फंसे। कार का नाम 'नैनो' रखा। सत्तर के दशक में संजय गांधी ने छोटी कार बनाई। तो नाम 'मारुति' रखा। कार आने में बहुत वक्त लगा। तब चुटकीबाज वाजपेयी कहा करते थे- 'यह मारुति नहीं, बेटे के लिए मां-रोती है।'

आडवाणी के धोबीपाट से कांग्रेस की बोलती बंद

यों तो 'भारतरत्न' पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। पर यूपीए सरकार अटल बिहारी वाजपेयी को देगी नहीं। सर्वोच्च सम्मान का इतिहास इस बात का गवाह। नेहरू-इंदिरा-राजीव तीनों लिस्ट में शामिल। पर कांग्रेस को डॉ. अम्बेडकर-सरदार पटेल याद नहीं आए। अम्बेडकर को भारतरत्न दिया वीपी सरकार ने। सरदार पटेल को चंद्रशेखर ने। इंदिरा ने मदर टरेसा को भारतरत्न दिया। पर जब वाजेपयी ने वीर सावरकर की सिफारिश की। तो सोनिया ने वीएन नारायणन से फाइल रुकवा दी। सावरकर की बात चली। तो बता दें- दिल्ली में जब पहली वीर सावरकर कमेटी बनी। तो वसंत साठे अध्यक्ष थे, वीएन गाडगिल महासचिव। पर जैसे-जैसे कांग्रेस अल्पसंख्यकवाद की ओर बढ़ी। वैसे-वैसे सावरकर राष्ट्रविरोधी लगने लगे।

माथुर-मोदी की रणनीति का जादू सर चढ़ बोला

अपन ने कल क्रिकेट पर कलम घिसाई। अंपायरों की टुच्चई बताई। अंपायरों के खिलाफ बीसीसीआई ने आंखें दिखाई। तो आईसीसी के होश फाख्ता हो गए। बकनर को पर्थ टेस्ट की अंपायरी से हटाना पड़ा। मार्क बेनसन को अंपायरी करनी ही नहीं थी। जहां तक भज्जी की बात। तो अपील पर आयोग बन गया। जब तक रपट नहीं आती। अपने भज्जी खेलेंगे। देखा, आंख दिखाने का असर। तभी तो अपने नवजोत सिद्दू ने बीसीसीआई की तारीफ की। वरना सिद्दू और बीसीसीआई की तारीफ कर दें। क्रिकेट का विवाद फिलहाल थमा। तो अपन अपनी पर लौट आएं। तो आज बात बीजेपी की। अपने ओम माथुर की ताजपोशी शानदार ढंग से हुई। अहमदाबाद में मोदी के विजयरथ पर पीछे खड़े थे।

असली रंगभेदी तो हैं अंपायर

अपन को क्रिकेट का कोई बुखार नहीं। सो अपन क्रिकेट के पंडित भी नहीं। पर इतने भी घसियारे नहीं। जो स्टीव बकनर और मार्क बेनसन की टुच्चई न समझ सकें। अंपायरों की टुच्चई पर बाद में चर्चा करेंगे। पहले अपने हरभजन सिंह भज्जी की बात। भज्जी ने नस्लभेदी टिप्पणीं की या नहीं। अपन नहीं जानते। पर आईसीसी का फैसला जरूर नस्लभेदी। अपने होठों को सफेद रंगने वाले साइमंड ने कहा- 'भज्जी ने मुझे मंकी कहा।' अंपायर कह रहे थे- उनने कुछ नहीं सुना। पर आईसीसी ने अपने भज्जी को तीन मैचों में सस्पेंड कर दिया। रंगभेदी कौन? अपने भज्जी या आईसीसी। अपन को नहीं लगता- भज्जी ने गुस्से में अंग्रेजी बोली होगी।

मोदी विरोधी फिर कोर्ट की शरण में

गुजरात की हार पर कांग्रेस में मुर्दनी। सोनिया गांधी चौथे दिन भी अस्पताल में। गंगाराम अस्पताल में भर्ती की बात समझ नहीं आई। मामला इतना गंभीर था। तो ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीटयूट क्यों नहीं ले जाई गई। बताया तो गया था सिर्फ चेस्ट इंफेक्शन। पर अपन दिल्ली की सर्दी से वाकिफ। दमे के मरीजों के लिए यह सर्दी जानलेवा। सो अपन ही नहीं। ज्यादातर लोगों का मानना था- दमे का दौरा। अपन को पहले से पता था- सोनिया दमे की मरीज। बात चली है तो बताते जाएं। नेताओं में जयललिता भी दमे की मरीज। करुणानिधि भी। और येरा नायडू भी। पर शुक्रवार को गंगाराम अस्पताल ने कहा- 'सांस की नली में सूजन जैसी कोई बात नहीं।' यानी दमे का गंभीर मामला तो नहीं। चेस्ट इंस्फेक्शन की मामूली बात, और चार दिन।

भाजपा का अश्वमेघ घोड़ा कहीं रास्ते में न रुके

गुजरात-हिमाचल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी में नया उत्साह आ गया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद से पार्टी में मुर्दनी छाई हुई थी। इस बीच पार्टी में कई प्रयोग हुए लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरा जा सका था। भाजपा को निराशा के चक्रव्यूह में फसाने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विवादास्पद फैसलों से हुआ था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की करारी हार के बाद संघ ने भाजपा पर अपनी नीतियां-निर्देश थोपने की गलती कबूल की और लाल कृष्ण आडवाणी का विरोध छोड़ दिया। आडवाणी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करके अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला इसी समीक्षा से निकला। स्वाभाविक तौर पर संघ परिवार के बदले रुख से भाजपा में नए सिरे से उथल-पुथल शुरू हो चुकी है।

यूपीए को लेने होंगे आम आदमी के हक में फैसले

सरकार पर चुनावी झटके का असर दिखने लगा। पर कांग्रेस अपनी जहनियत बदलने को तैयार नहीं दिखती। अपन ने 19 दिसम्बर को लिखा था- 'नगालैंड में कांग्रेसी छेड़छाड़ की तैयारी' उसमें अपन ने लिखा- 'गुजरात-हिमाचल में लोकतंत्र का कार्यक्रम निपट चुका। अब नगालैंड में लोकतंत्र के क्रियाक्रम की तैयारी।' देर भले ही लगी, पर हुआ वही। मंगलवार को इसी काम के लिए कैबिनेट हुई। मनमोहन सिंह ने वही किया। जिसका हुक्म दस जनपथ से आया। आखिर विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति राज की सिफारिश हो गई। अपनी राष्ट्रपति दिल्ली से बाहर थी। सो देर लगी। गुरुवार को वह काम भी हो गया। रबड़- स्टैंप लग गई।

वह सत्ता का नशा ही क्या, जो सिर चढ़ कर न बोले

ऐसे नेता अब विरले। जिन पर सत्ता का नशा न चढ़ता हो। मायावती यूपी का चुनाव क्या जीती। पीएम बनने के सपने लेने लगी। पर गुजरात-हिमाचल ने नशा चूर-चूर किया होगा। सत्ता का नशा तो सोनिया गांधी का भी उतर गया। गुजरात-हिमाचल में मायावती को भले कुछ नहीं मिला। सोनिया का खेल तो बिगाड़ ही दिया। सोनिया ने इशारा किया होगा। तभी तो रीता बहुगुणा ने मायावती पर तीर चलाए। अगले ही दिन मायावती ने सोनिया-मनमोहन सरकार की चूलें हिला दी।

दोस्त, दुश्मन की पहचान जरूरी

हम भारतीय इतने सुसंस्कारित हैं कि मरे हुए व्यक्ति की बुराईयां नहीं देखते। ऐसा नहीं कि ऐसी सुसंस्कृति अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की नहीं। आखिर भारत और पाकिस्तान एक ही देश के विभाजन से ही तो बने हैं। धर्म और पूजा पध्दति को छोड़ दें, तो दोनों देशों की संस्कृति, भाषा-बोली, रहन-सहन एक जैसा ही है। इसीलिए बेनजीर भुट्टो की हत्या पर हम भारतीयों को गहरा सदमा लगा। भले ही बेनजीर ने कभी भी भारत के साथ दोस्ती की वैसी पैरवी नहीं की, जैसी नवाज शरीफ ने की। या कारगिल की साजिश रचने के बाद परवेज मुशर्रफ भी करते रहे हैं। हालांकि मेरे जैसे करोड़ाें भारतीय परवेज मुशर्रफ पर भरोसा नहीं करते, वह बाकी पाकिस्तानी शासकों से कहीं ज्यादा मक्कार और जुबान के कच्चे हैं।

रावलपिंडी-रामपुर में फर्क नहीं आतंकियों की नजर में

आखिर मुशर्रफ ने चंडूखाने की गप से पीछा छुड़ाया। कार के लीवर से बेनजीर की मौत वाली थ्योरी छोड़ दी। पाक के इंटीरियर मिनिस्टर हामिद नवाज खान बोले- 'हमें माफ करें और चीमा के बयान को भूल जाएं।' चीमा ने जो चंडूखाने की थ्योरी दी थी। उस बारे में अपन ने कल ही लिखा था। इसे मुशर्रफ पर बुश का दबाव समझें। या पाकिस्तानी आवाम के भरोसा न करने का असर। मानो, न मानो। जरूर बुश ने फटकारा होगा। मुशर्रफ की थ्योरी से बुश संकट में फंस गए थे। एक तरफ हिलेरी क्लिंटन की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग। दूसरी तरफ आतंकवाद के खिलाफ बुश की लड़ाई कमजोर पड़ती।