December 2007

आडवाणी की क्लास से निकले चुनावी फार्मूले

बीजेपी की कमान अब पूरी तरह आडवाणी के हाथ। गुजरात-हिमाचल के नतीजों ने जोश भर दिया। यों तो बीजेपी की कोर कमेटी अपना काम करेगी। पर आडवाणी ने चुनावी शतरंज की अलग कोर कमेटी बना ली। कहीं मनमोहन-सोनिया की तरह दोहरी सत्ता न दिखे। सो कोर कमेटी में राजनाथ सिंह भी। पर साथ ही नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली भी। राजनाथ ने मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से बाहर किया। तो जेटली को प्रवक्ता पद से हटाया। राजनाथ के इन दोनों कदमों से पार्टी में फूट दिखी। पर गुजरात जीतकर मोदी ने अपना कद बढ़ा लिया। अब पार्टी में आडवाणी के बाद मोदी दूसरी हस्ती। आडवाणी ने अपनी कोर कमेटी में सिर्फ एक सीएम को रखा। वह भी नरेंद्र मोदी।

शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या (संशोधित)

पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। बाल-बाल बच गए आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे, लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही आतंकी वारदातों के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं, जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार-बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।

जेहादियों की निगाह पाक के एटम बम पर

आखिर वही हुआ। जिसका अपन ने अंदेशा जताया। अपन ने लिखा था- 'अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत।' शुक्रवार को वाया इटली खबर आई- 'अल कायदा ने हत्या की जिम्मेदारी ले ली।' अल कायदा के कमांडर मुश्तफा अबू अल याजीद ने कहा- 'हमने अमेरिका की वह सबसे महत्वपूर्ण नेता खत्म कर दी। जिसने मुजाहिद्दीन को खत्म करने की कसम खाई थी।' याजीद ने यह भी बताया- 'बेनजीर का काम तमाम करने का हुक्म अल कायदा के नंबर दो- अल जवाहरी ने दिया था।' पर पाकिस्तान में ज्यादातर लोगों को मुशर्रफ पर शक। मुशर्रफ अपने रास्ते के रोड़े हटाने में माहिर। यों भी भुट्टो परिवार का फौज से छत्तीस का आंकड़ा रहा। फौज-आईएसआई ने भुट्टो परिवार को कभी पसंद नहीं किया।

शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या

पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी Benazir Bhuttoभी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे, लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक Benazir Bhuttoहफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही बड़े नेताओं की हत्याओं के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं, जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार-बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।

अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत

बहादुर शाह जफर को मरते समय भी गम रहा। बर्मा की मांडले जेल में मरे। वहीं पर दफनाए गए। जफर को पता था- हिंद में नहीं दफनाया जाएगा। सो उनने पहले ही लिख दिया- 'दो गज जमीं न मिली, कु--यार में।' पर बेनजीर भुट्टो को मौत ही पाकिस्तान ले आई। वरना आठ साल बाद वतन लौटने की न सोचती। बेनजीर लौटते ही आतंकियों के निशाने पर आ गई। अपन ने तब तालिबानी नेता बेतुल्ला महमूद की धमकी लिखी थी। उनने कहा था- 'बेनजीर का स्वागत फिदाइन करेंगे।' आखिर 18 अक्टूबर की पहली ही रात बेनजीर पर आतंकी हमला हुआ। वह खुद तो बच गई। पर पौने दो सौ बेगुनाह मारे गए। अपन तो क्या, सब को आशंका थी- 'तालिबान चुपकर के नहीं बैठेंगे।'

उड़ीसा-कर्नाटक पर गुजरात का असर

गुजरात ने कांग्रेस को दहशत में डाल दिया। सोनिया-राहुल के रोड-शो पर बहुत भरोसा था। अब जांच हो रही है- 'सोनिया को किसने गुमराह किया। क्यों गुमराह किया।' शकील अहमद बोले- 'जांच चल रही है। अगर किसी ने जानबूझ कर गुमराह किया। तो कार्रवाई होनी चाहिए।' तो मौत के सौदागर वाला भाषण लिखने पर जांच शुरू हो चुकी। वैसे जावेद अख्तर ने अपनी तरफ से सफाई दे दी- 'मैंने सोनिया का भाषण नहीं लिखा।' पर अब सोनिया को फूंक-फूंककर चलना होगा। जो लाइन खुद के पल्ले न पड़े। उसे काऊंटर चेक करके बोलें। वरना जितना नाजुक गुजरात। उतना ही नाजुक उड़ीसा और कर्नाटक।

खबरचियों की खुन्नस झलकी

दुनियाभर में बड़े दिन का खास महत्व। ईसू मसीह का जन्म हुआ। तो अपने यहां भी बड़े-बड़े नेता हुए। मदन मोहन मालवीय से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक। अपन दूर न जाएं। तो मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म भी बड़े दिन हुआ। यों अपन सुनामी याद कर लें, तो बुरी बात नहीं। तीन साल पहले बड़े दिन से पहली रात मनहूस साबित हुई। पर बात इस पच्चीस दिसम्बर की। अपने अटल बिहारी 84 के हुए। तो उनके घर पर भीड़ उमड़ पड़ी। वाजपेयी का यह जन्मदिन खास उत्साह से मना। इधर वाजपेयी के घर भीड़ उमड़ी। उधर नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण पर भीड़ उमड़ी। यों मोदी की जीत बहुतेरों को रास नहीं आई।

सोनिया का आम आदमी अब बीजेपी-मोदी के साथ


लुटिया डूबने के बाद भी कांग्रेस जिद पर कायम। सोमवार को भी वीरप्पा मोइली बोले- 'मौत के सौदागर वाले बयान पर कोई अफसोस नहीं।' पर यह नहीं बताया- मौत के सौदागर वाला भाषण लिखा किसने था। यों लिखा-लिखाया पढ़ने की आदत अब कांग्रेस में छूत की बीमारी। मोइली भी लिखा-लिखाया पढ़ते दिखे। लिखे भाषण की बात चली। तो अरुण जेटली याद आए। बोले- 'सोनिया को तो मौत के सौदागर का मतलब भी पता नहीं होगा। जो लिखकर दे दिया गया, बोल दिया।' पर सोनिया अब इतनी अनाड़ी भी नहीं। अनाड़ी होती, तो मौत के सौदागर वाली जिद छूट जाती। सोमवार को सोनिया के सामने सारे दिग्गज सिर झुकाए खड़े थे।

मोदी को मुद्दा बना खुद हारी कांग्रेस

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा उसी दिन भारी हो गया था, जिस दिन कांग्रेस नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर उतर आई थी। चौदहवीं लोकसभा के चुनावNarendra Modi में कांग्रेस ने मोदी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था, तो गुजरात में कांग्रेस की स्थिति में सुधार हुआ था। अलबत्ता विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस 91 क्षेत्रों में जीती थी, जबकि भाजपा 89 क्षेत्रों में। इसका मतलब यह हुआ कि करीब साढ़े तीन साल पहले नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटना शुरू हो गया था, लेकिन कांग्रेस ने हालात का फायदा उठाकर खुद को मजबूत करने की बजाए कमजोर कर लिया।

चुनाव नतीजों से पहले ही यह चर्चा शुरू हो गई कि गुजरात में न तो भाजपा जीतेगी, न हारेगी। जीतेंगे तो नरेंद्र मोदी, हारेंगे तो नरेंद्र मोदी।

शोलों पर पाकिस्तान

बत्तीस साल पहले फरवरी 1975 में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद 21 दिसम्बर 2007 को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस समय आत्मघाती हमला हुआ, जब वह बकरीद की नमाज अदा कर रहे थे। आफताब अहमद हाल ही तक पाकिस्तान के गृह मंत्री थे और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बेहद करीबियों में माने जाते हैं। बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान से बाहर चले जाने के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में फूट पड़ी और एक खेमा परवेज मुशर्रफ के साथ जा मिला था।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट