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December 2007

प्रियंका-फातिमा नहीं राहुल-बिलावल

अपने यहां कांग्रेस-भाजपा में चुनावी तैयारियां। तो उधर पीपीपी-पीएमएल में गठजोड़ की खबर। आखिर नवाज शरीफ ने माना- 'पीपीपी-पीएमएल मिल जाएं। तो पाक में जमहूरियत का भला होगा। दोनों मिलकर उखाड़ सकते हैं तानाशाही।' पाकिस्तान में पीपीपी-पीएमएल हू--हू वैसे ही। जैसे अपने यहां भाजपा-कांग्रेस। अपने यहां पाक जैसी समस्या तो नहीं। जहां हर दूसरे-तीसरे साल फौजी तानाशाही का फच्चर। पर अपने यहां राजनीतिक हुड़दंग इतना हो गया। विकास की गाड़ी पटरी से उतर चुकी। सोचो, अपने यहां भी कांग्रेस-बीजेपी मिल जाएं। तो देश का कितना भला होगा। छोटी-छोटी पार्टियों की ब्लैकमेलिंग खत्म होगी। विकास की गाड़ी सरपट दौड़ेगी। पर कांग्रेस-बीजेपी का मिलना खालाजी का घर नहीं।

आडवाणी की क्लास से निकले चुनावी फार्मूले

बीजेपी की कमान अब पूरी तरह आडवाणी के हाथ। गुजरात-हिमाचल के नतीजों ने जोश भर दिया। यों तो बीजेपी की कोर कमेटी अपना काम करेगी। पर आडवाणी ने चुनावी शतरंज की अलग कोर कमेटी बना ली। कहीं मनमोहन-सोनिया की तरह दोहरी सत्ता न दिखे। सो कोर कमेटी में राजनाथ सिंह भी। पर साथ ही नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली भी। राजनाथ ने मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से बाहर किया। तो जेटली को प्रवक्ता पद से हटाया। राजनाथ के इन दोनों कदमों से पार्टी में फूट दिखी। पर गुजरात जीतकर मोदी ने अपना कद बढ़ा लिया। अब पार्टी में आडवाणी के बाद मोदी दूसरी हस्ती। आडवाणी ने अपनी कोर कमेटी में सिर्फ एक सीएम को रखा। वह भी नरेंद्र मोदी।

शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या (संशोधित)

पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। बाल-बाल बच गए आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे, लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही आतंकी वारदातों के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं, जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार-बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।

जेहादियों की निगाह पाक के एटम बम पर

आखिर वही हुआ। जिसका अपन ने अंदेशा जताया। अपन ने लिखा था- 'अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत।' शुक्रवार को वाया इटली खबर आई- 'अल कायदा ने हत्या की जिम्मेदारी ले ली।' अल कायदा के कमांडर मुश्तफा अबू अल याजीद ने कहा- 'हमने अमेरिका की वह सबसे महत्वपूर्ण नेता खत्म कर दी। जिसने मुजाहिद्दीन को खत्म करने की कसम खाई थी।' याजीद ने यह भी बताया- 'बेनजीर का काम तमाम करने का हुक्म अल कायदा के नंबर दो- अल जवाहरी ने दिया था।' पर पाकिस्तान में ज्यादातर लोगों को मुशर्रफ पर शक। मुशर्रफ अपने रास्ते के रोड़े हटाने में माहिर। यों भी भुट्टो परिवार का फौज से छत्तीस का आंकड़ा रहा। फौज-आईएसआई ने भुट्टो परिवार को कभी पसंद नहीं किया।

शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या

पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी Benazir Bhuttoभी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे, लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक Benazir Bhuttoहफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही बड़े नेताओं की हत्याओं के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं, जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार-बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।

अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत

बहादुर शाह जफर को मरते समय भी गम रहा। बर्मा की मांडले जेल में मरे। वहीं पर दफनाए गए। जफर को पता था- हिंद में नहीं दफनाया जाएगा। सो उनने पहले ही लिख दिया- 'दो गज जमीं न मिली, कु--यार में।' पर बेनजीर भुट्टो को मौत ही पाकिस्तान ले आई। वरना आठ साल बाद वतन लौटने की न सोचती। बेनजीर लौटते ही आतंकियों के निशाने पर आ गई। अपन ने तब तालिबानी नेता बेतुल्ला महमूद की धमकी लिखी थी। उनने कहा था- 'बेनजीर का स्वागत फिदाइन करेंगे।' आखिर 18 अक्टूबर की पहली ही रात बेनजीर पर आतंकी हमला हुआ। वह खुद तो बच गई। पर पौने दो सौ बेगुनाह मारे गए। अपन तो क्या, सब को आशंका थी- 'तालिबान चुपकर के नहीं बैठेंगे।'

उड़ीसा-कर्नाटक पर गुजरात का असर

गुजरात ने कांग्रेस को दहशत में डाल दिया। सोनिया-राहुल के रोड-शो पर बहुत भरोसा था। अब जांच हो रही है- 'सोनिया को किसने गुमराह किया। क्यों गुमराह किया।' शकील अहमद बोले- 'जांच चल रही है। अगर किसी ने जानबूझ कर गुमराह किया। तो कार्रवाई होनी चाहिए।' तो मौत के सौदागर वाला भाषण लिखने पर जांच शुरू हो चुकी। वैसे जावेद अख्तर ने अपनी तरफ से सफाई दे दी- 'मैंने सोनिया का भाषण नहीं लिखा।' पर अब सोनिया को फूंक-फूंककर चलना होगा। जो लाइन खुद के पल्ले न पड़े। उसे काऊंटर चेक करके बोलें। वरना जितना नाजुक गुजरात। उतना ही नाजुक उड़ीसा और कर्नाटक।

खबरचियों की खुन्नस झलकी

दुनियाभर में बड़े दिन का खास महत्व। ईसू मसीह का जन्म हुआ। तो अपने यहां भी बड़े-बड़े नेता हुए। मदन मोहन मालवीय से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक। अपन दूर न जाएं। तो मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म भी बड़े दिन हुआ। यों अपन सुनामी याद कर लें, तो बुरी बात नहीं। तीन साल पहले बड़े दिन से पहली रात मनहूस साबित हुई। पर बात इस पच्चीस दिसम्बर की। अपने अटल बिहारी 84 के हुए। तो उनके घर पर भीड़ उमड़ पड़ी। वाजपेयी का यह जन्मदिन खास उत्साह से मना। इधर वाजपेयी के घर भीड़ उमड़ी। उधर नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण पर भीड़ उमड़ी। यों मोदी की जीत बहुतेरों को रास नहीं आई।

सोनिया का आम आदमी अब बीजेपी-मोदी के साथ


लुटिया डूबने के बाद भी कांग्रेस जिद पर कायम। सोमवार को भी वीरप्पा मोइली बोले- 'मौत के सौदागर वाले बयान पर कोई अफसोस नहीं।' पर यह नहीं बताया- मौत के सौदागर वाला भाषण लिखा किसने था। यों लिखा-लिखाया पढ़ने की आदत अब कांग्रेस में छूत की बीमारी। मोइली भी लिखा-लिखाया पढ़ते दिखे। लिखे भाषण की बात चली। तो अरुण जेटली याद आए। बोले- 'सोनिया को तो मौत के सौदागर का मतलब भी पता नहीं होगा। जो लिखकर दे दिया गया, बोल दिया।' पर सोनिया अब इतनी अनाड़ी भी नहीं। अनाड़ी होती, तो मौत के सौदागर वाली जिद छूट जाती। सोमवार को सोनिया के सामने सारे दिग्गज सिर झुकाए खड़े थे।

मोदी को मुद्दा बना खुद हारी कांग्रेस

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा उसी दिन भारी हो गया था, जिस दिन कांग्रेस नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर उतर आई थी। चौदहवीं लोकसभा के चुनावNarendra Modi में कांग्रेस ने मोदी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था, तो गुजरात में कांग्रेस की स्थिति में सुधार हुआ था। अलबत्ता विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस 91 क्षेत्रों में जीती थी, जबकि भाजपा 89 क्षेत्रों में। इसका मतलब यह हुआ कि करीब साढ़े तीन साल पहले नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटना शुरू हो गया था, लेकिन कांग्रेस ने हालात का फायदा उठाकर खुद को मजबूत करने की बजाए कमजोर कर लिया।

चुनाव नतीजों से पहले ही यह चर्चा शुरू हो गई कि गुजरात में न तो भाजपा जीतेगी, न हारेगी। जीतेंगे तो नरेंद्र मोदी, हारेंगे तो नरेंद्र मोदी।

शोलों पर पाकिस्तान

बत्तीस साल पहले फरवरी 1975 में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद 21 दिसम्बर 2007 को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस समय आत्मघाती हमला हुआ, जब वह बकरीद की नमाज अदा कर रहे थे। आफताब अहमद हाल ही तक पाकिस्तान के गृह मंत्री थे और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बेहद करीबियों में माने जाते हैं। बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान से बाहर चले जाने के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में फूट पड़ी और एक खेमा परवेज मुशर्रफ के साथ जा मिला था।

विलास राव- राणे लड़ाई पहुंची दिल्ली

राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। तो अपन ने शिवसेना-कांग्रेस मेलजोल का खुलासा किया। शिवसेना एनडीए उम्मीदवार की हार का कारण बनी। शिवसेना शुरूआत न करती। तो नतीजा कुछ और होता। तब अपन ने खुलासा किया था- 'बाल ठाकरे ने मराठी अस्मिता को मुद्दा तो बनाया। पर नारायण राणे को सीएम न बनाने की शर्त भी रखी।' नारायण राणे जब कांग्रेस में आए। तो अघोषित वादा था- 'देर सबेर सीएम की कुर्सी सौंपेंगे।' राणे के आने से कांग्रेस की जान में जान आई। तब तक तो एनसीपी का पलड़ा भारी था। राणे ने आकर कांग्रेस की सीटें एनसीपी से ज्यादा की। पर राणे से किया वादा नहीं निभा।

चलो, नक्सलियों का बढ़ा दायरा तो माना मनमोहन ने

शुकर है, मनमोहन सिंह ने मान लिया। एनडीसी खत्म हुई। तो आतंरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों की मीटिंग हुई। मनमोहन बोले- 'नक्सलियों ने अपना जाल बढ़ा लिया।' एक दिन ऐसा भी आएगा। जब मनमोहन कहेंगे- 'आतंकवादियों ने अपनी जड़ें मजबूत कर लीं।' पहले बात नक्सलवाद की। अपन अगर मनमोहन के कहे की जड़ में जाएं। तो गढ़े मुर्दे उखड़ेंगे ही। याद करो आंध्र प्रदेश। जहां चंद्रबाबू नायडू पर नक्सली हमला हुआ। वह बाल-बाल बच गए। पर मई 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीती। तो पहली बार नक्सली संगठनों पर बैन हटा।

बिदके मनमोहन, जब मोदी ने दिखाया आईना

बुधवार को मनमोहन-मोदी आमने-सामने हुए। तो मोदी के तीर नहीं झेल पाए मनमोहन। यह हुआ एनडीसी यानी राष्ट्रीय विकास परिषद की मीटिंग में। मीटिंग का मकसद था- ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना को मंजूरी। मनमोहन-मोदी में तू-तू, मैं-मैं किस बात पर हुई। वह बाद में बताएंगे। पहले मीटिंग के एजेंडे की बात। योजना का ड्राफ्ट तैयार था। उसमें हेर-फेर की गुंजाइश ही नहीं थी। फिर भी सारे सीएम मनमोहन-मोंटेक-चिदंबरम के बहरे कानों तक आवाज पहुंचाने में जुटे। नीतीश कुमार बोले- 'नदियों को जोड़कर बिहार को बाढ़ से बचाएं। नेपाल के साथ समझौता न हो। तो कम से कम भारतीय नदियां तो जोड़िए।'

नगालैंड में कांग्रेसी छेड़छाड़ की तैयारी

सोचो, गुजरात-हिमाचल से निपटकर कांग्रेस क्या करेगी। गोवा-झारखंड के बाद अब कांग्रेस की नजर नगालैंड पर। अपन को कांग्रेसी इरादों की भनक तब लगी। जब नगालैंड के कांग्रेसी एमएलए चौबीस अकबर रोड पर देखे। नगालैंड कांग्रेस के अध्यक्ष होखेतो सुमी 30 एमएलए लेकर पहुंचे। साठ की एसेंबली में मौजूदा तादाद 54 की। गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने मुलाकात की। पर सबको दस जनपथ का रास्ता दिखा दिया। सोनिया के रायबरेली से लौटने का इंतजार। सोनिया की हरी झंडी हुई। तो कल केबिनेट नगालैंड सरकार बर्खास्तगी की सिफारिश कर देगी। कांग्रेस के एमएलए तीस का जुगाड़ कर चुके।

करात-बाबू में थर्डफ्रंट की गुफ्तगू

मौका था किसानों की समस्याओं पर सेमीनार। यूएनपीए के नेता दिल्ली में एकजुट हुए। कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन को सामने किया गया। स्वामीनाथन को किसानों की समस्याओं पर रपट दिए अरसा हो चुका। पर यूपीए सरकार ने रपट पर अमल नहीं किया। अब यूएनपीए रपट पर अमल के लिए आंदोलन करेगी। पर पर्दे के पीछे बनी थर्ड फ्रंट की रणनीति। मंगलवार इस मामले में अहम रहा। पिछली बार थर्ड फ्रंट की सरकार थी। तो चंद्रबाबू नायडू यूएफ के कर्ता-धर्ता थे।

प्रणव बोले- लोकसभा पर मिड टर्म की तलवार

मोदी का एक्जिट नहीं होगा। एक्जिट पोल कुछ भी कहें। इम्तिहान तो होगा स्टार के एक्जिट पोल का। जिसने साफ-साफ कहा- 'बीजेपी 103, कांग्रेस 76 पर निपटेगी।' यों सीएनएन-आईबीएन ने भी दो टूक भविष्यवाणी की- 'बीजेपी को बहुमत जरूर मिलेगा। किस्मत ने साथ न दिया। तो भी 92 सीटें तो आएंगी ही। पर सौ से ज्यादा नहीं मिलेंगी। कांग्रेस को 77 और लाटरी निकल आई तो 85 तक।' जीटीवी का एक्जिट पोल भी करीब-करीब ऐसा ही। दो सीटें कम या ज्यादा। पर एनडीटीवी एक्जिट पोल न भी करता। तो कोई फर्क नहीं पड़ता। कहा- 'बीजेपी को 90 से 110 के बीच। कांग्रेस को 70 से 95 के बीच।' बीजेपी जीत भी सकती है, हार भी सकती है। कांग्रेस जीत भी सकती है, हार भी सकती है। यानी चित भी मेरी, पट भी।

आ रहे हैं भैरों बाबा

सोनिया हिमाचल में बीजेपी के खिलाफ गरजी। तो अपन को शक हुआ- कहीं गुजरात वाला भाषण तो नहीं पढ़ आई। आखिर हिमाचल में तो बीजेपी का राज नहीं। पर नहीं, यह गुजरात-हिमाचल के बाद का इशारा। लोकसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं। लेफ्ट ने इसी महीने की लक्ष्मण रेखा खींच दी। मनमोहन ने एटमी ऊर्जा की मृग तृष्णा न छोड़ी। लक्ष्मण रेखा पार कर ली। तो लेफ्ट सत्ता का अपहरण करेगा। फिर जो चुनावी युध्द जीतेगा। वही दिल्ली की अयोध्या पर राज करेगा। पर फिलहाल बात गुजरात-हिमाचल की। आडवाणी आज वोट डालकर हिमाचल का रुख करेंगे। पर गुजरात की वोटिंग से पहले बीजेपी को मध्य प्रदेश में जोरदार झटका धीरे से लगा।

दे बाबा- अफजल, अजहर, सोहराबुद्दीन के नाम पर

गुजरात के चुनावी महासमर का आज आखिरी दिन। कल बाकी की 95 सीटों पर भी वोट पड़ेंगे। संग्राम तो कांग्रेस-बीजेपी में रहा। पर महाभारत संघ परिवारियों में हुई। आधा परिवार कौरव बन गया। आधा पांडव। आधे मोदी के साथ। बाकी बचे केशुभाई के साथ। केशुभाई की तुलना अपन भीष्म पीतामह से करें। तो ठीक ही रहेगा। भीष्म पीतामह का शरीर कौरवों के साथ था। मन पांडवों के साथ। केशुभाई का शरीर बागियों के साथ था। मन बीजेपी के साथ। सिर्फ बीजेपी ही क्यों। बाकी संघ परिवारिए भी महाभारत में कूदे। वीएचपी को ही लें। तोगड़िया अंदरखाते कांग्रेस के साथ थे। तो अशोक सिंघल-आचार्य धर्मेंद्र बीजेपी के साथ।

तुम्हारा अजहर, तो हमारा अफजल

चुनाव आयोग से मोदी को नोटिस मिला। अलबत्ता मोदी को नोटिस दिलवाया। तो कांग्रेस बहुत खुश थी। पर मोदी के जवाब ने आयोग की जुबान तो बंद की ही। कांग्रेस की जुबान पर भी ताला पड़ गया। अपन अगर चुनावी दांव-पेंच की पड़ताल करें। तो सोनिया गांधी को बधाई देनी पड़ेगी। जिनके एक वाक्य पर चुनावी घमासान अटक गया। यह वाक्य था- 'गुजरात में शासन चलाने वाले मौत के सौदागर।' सोनिया ने दो काम किए। एक तो सारा चुनाव इसी के इर्द-गिर्द कर दिया। दूसरा- मोदी को मुद्दा बना दिया। वही चाहते थे मोदी। मोदी की बात चली। तो इस बार का खास नारा बताएं। नारा लगा- 'न दर्द चाहिए, न हमदर्द चाहिए। मोदी जैसा मर्द चाहिए।'

मोदी को अभिमन्यु की तरह घेरने की कोशिश

अपनी सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को नोटिस दिया। तो जयंती नटराजन बाग--बाग हो गई। बोली- 'अदालत पहले भी कई बार मोदी की निंदा कर चुकी। फासिस्ट मोदी गोधरा की लाशों पर सवार होकर सत्ता में पहुंचे।' लाशों की राजनीति पर अपने जावड़ेकर बोले- 'लाशों की राजनीति में कांग्रेस की महारत।' उनने याद कराया 1984 का चुनाव। उनने याद कराया 1991 का चुनाव। बात 1984 की चली। तो बता दें- बुधवार को अपने सिध्दू भाजी ने अमदाबाद में मनमोहन को 84 के दंगे याद कराए।

आडवाणी के नाम से मनमोहन क्यों परेशां

गुजरात का पहला दौर निपटा। कोई छप्पन फीसदी वोटिंग हुई। पचास फीसदी से कम होती। तो बीजेपी के तम्बू उखड़ते। छप्पन फीसदी से मोदी की बल्ले-बल्ले। पर जितने खुश बीजेपी महासचिव ओम माथुर। उतने ही कांग्रेस महासचिव बी के हरिप्रसाद। दोनों का डेरा गुजरात में। बी के हरिप्रसाद बोले- 'मंगलवार को सौराष्ट्र-कच्छ ने मोदी को नकार दिया।' अपन ने माथुर से पूछा, तो बोले- 'जिन 87 सीटों पर चुनाव हुआ। उनमें 54 बीजेपी के पास थी। ज्यादा नहीं, तो 54 बरकरार रहेंगी।'

आडवाणी-शेखावत देंगे सोनिया को चुनौती

ताकि सनद रहे, सो याद कराएं। अपन ने बारह सितम्बर को लिखा था- 'आडवाणी ताकतवर होकर मुम्बई से लौटे।' दस दिसम्बर को बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड ने एलान किया- 'आडवाणी होंगे पीएम पद के दावेदार।' वैसे यह एलान सितम्बर में ही होता। पर कई आडवाणी विरोधी जल-भुन गए थे। जिसकी झलक अपन ने 25-26 सितम्बर को भोपाल में देखी। जब राजनाथ ने पहले ही दिन अटल की चिट्ठी का पैंतरा चल दिया। जिन्ना प्रकरण से कईयों के मुंह में पानी था।

संसद की कारगुजारी से चुनावी आहट

एटमी करार पर हुई बहस के बाद वामपंथी, तीसरे मोर्चे और राजग के सांसदों ने वाकआउट करके यूपीए सरकार को अल्पमत में दिखा दिया है। भले ही वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बातचीत करने की हरी झंडी दे दी है, लेकिन संसद में दिखाए गए तेवरों से चौदहवीं लोकसभा पर अभी भी तलवार लटकी हुई है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम 2008-09 का बजट तैयार कर रहे हैं, संसद पर लटकी तलवार के कारण माना जा रहा है कि मौजूदा सरकार का यह बजट ही आखिरी हो सकता है। इसलिए तय है कि यह बजट लोकलुभावन होगा।

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आयोग की निष्पक्षता सवालों के घेरे में

शीत सत्र का भोग पड़ गया। यानी सत्रावसान हो गया। सत्रावसान के वक्त पीएम गायब थे। लोकसभा के नेता प्रणव दा भी होते। तो गनीमत थी। पर वह भी गायब। राज्यसभा में तो मनमोहन के साथ विपक्ष के नेता जसवंत सिंह भी गायब। संसद की ऐसी अनदेखी अपन ने पहले नहीं देखी। मनमोहन शाम को गुजरात जाते। तो पहाड़ नहीं टूट पड़ता। वैसे भी मनमोहन वोटरों को कितना प्रभावित करेंगे। किसी से छिपा नहीं। पर गुजरात की बात चली। तो बता दें- मनमोहन ने वहां क्या कहा।

स्वर्गीय श्री सोहराबुद्दीन के कटघरे में मोदी

अपन चुनाव आयोग की मजबूरी नहीं जानते। पर नरेंद्र मोदी को भेजा गया नोटिस अपने गले नहीं उतरा। अपन ने शाम सवा सात बजे ओम माथुर से बात की। तो नोटिस अभी उन्हें मिला ही था। नोटिस अरुण जेटली को थमाते हुए उनने अपन से बात की। चुनाव आयोग से निपटने में जेटली की महारत। पर कोई अपन से पूछे। तो इससे मोदी को राजनीतिक फायदा ही होगा। आयोग जितना कड़ा रुख अपनाएगा। मोदी उतने फायदे में।

लेफ्ट ने गलती सुधारी लोस पर लटकी तलवार

एटमी करार पर बहस देर रात तक चली। मनमोहन भी शौरी-सिब्बल को सुनने बैठे रहे। यों तो राज्यसभा में सिब्बल-जेटली की नोंक-झोंक मजेदार होती। पर करार के एक्सपर्ट शौरी। वैसे भी जेटली गुजरात के मोर्चे पर। गुजरात की बात चली। तो बता दें- कांग्रेस का अपना सर्वेक्षण 85 का। बीजेपी के खाते में 95 सीटें। कांटे की लड़ाई का अहसास दोनों को। सो सोनिया ने पूरा जोर लगा दिया। मोदी ने भी तलवार म्यान से निकाल ली। मंगल की रात सिब्बल गुजरात छोड़ राज्यसभा में लेफ्ट से जूझ रहे थे। तो मोदी ने सोहराबुद्दीन का मुद्दा उठा दिया।

नंदीग्राम के जख्म फिर उधड़े

बुध्ददेव भट्टाचार्य नंदीग्राम कांड पर माफी मांगकर कोलकाता लौटे। तो ममता बनर्जी लोकसभा में लौट आईं। पिछले दिनों उन्होंने दूसरी बार इस्तीफा भेजा था। बुध्ददेव कोलकाता लौटे, ममता दिल्ली आई। इस बीच नंदीग्राम से जुड़ी दो बड़ी खबरें आ गई। पहली खबर- सीपीएम के खुन्नस निकालने की शैली से संबंधित। सीपीएम ने महिला फिल्मोत्सव का उद्धाटन अपर्णा सेन से करवाने पर एतराज किया है।

नटवर के कटघरे में खड़े मनमोहन

संसद की बहस का स्तर कितना गिर गया। यह अपन ने मंगलवार को राज्यसभा में देखा। पीएम जब कटघरे में खड़े हुए। तो पर्सनल अटैक पर उतर आए। फिर लालू यादव क्यों पीछे रहते। सो वे भी अपनी पर आ ही गए। देखते-देखते राज्यसभा गली-मोहल्ला दिखने लगा। एटमी करार पर बहस शुरू हुई। तो यशवंत सिन्हा ने पीएम पर बमबारमेंट शुरू कर दी।

मौत का सौदागर मोदी या अफजल? नया सवाल

यह तो अपन को पहले से पता था-'मोदी पर जहर बुझे तीर चलाएगी सोनिया।' पर अपन को भरोसा था-सोनिया चक्रव्यूह में नहीं फसेगी। भले ही अनारी कितनी ऊट-पटांग बाते लिखकर थमाएं। पर अपना भरोसा टूट गया। जब सोनिया ने चिकली में मोदी को बेइमान और मौत का सौदागर कह दिया। साथ में गांधी के गुजरात को गोडसे से जोड़ बलंडर किया।

क्या होगा परवेज मुशर्रफ का

आठ जनवरी को होने वाले पाकिस्तान के चुनावों के लिए चीन से बनवाई गई मतदान पेटियां पहुंच चुकी हैं। चुनावों से पहले अमेरिका ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के सामने वर्दी उतारने और आपातकाल हटाने की शर्तें रखी थीं। इनमें वर्दी उतारने की पहली शर्त पूरी हो चुकी है। और आपातकाल हटाने की दूसरी शर्त सोलह दिसंबर को पूरी करने का वादा है। वर्दी उतारते समय परवेज मुशर्रफ बहुत असहज महसूस कर रहे थे, जिससे स्पष्ट था कि उन्हें कितनी मजबूरी में यह करना पड़ रहा है।

कमाल के हैं कलाम

माना- मनमोहन की गठबंधन सरकार। पर छोटे-छोटे दलों की ऐसे बंधक बनेगी। अपन ने नहीं सोचा था। वेणुगोपाल के मामले में हैल्थ मिनिस्टर रामदौस ने जो किया। उससे मनमोहन की छवि भी कोई अच्छी नहीं बनी। रामदौस पहले दिन से एम्स डायरेक्टर वेणुगोपाल को हटाने पर आमादा।