October 2007

  • strict warning: Non-static method view::load() should not be called statically in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/views.module on line 906.
  • strict warning: Declaration of views_handler_argument::init() should be compatible with views_handler::init(&$view, $options) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_argument.inc on line 744.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_validate() should be compatible with views_handler::options_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 607.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_submit() should be compatible with views_handler::options_submit($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 607.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter_boolean_operator::value_validate() should be compatible with views_handler_filter::value_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter_boolean_operator.inc on line 159.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_style_default::options() should be compatible with views_object::options() in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_style_default.inc on line 24.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_row::options_validate() should be compatible with views_plugin::options_validate(&$form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_row.inc on line 134.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_row::options_submit() should be compatible with views_plugin::options_submit(&$form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_row.inc on line 134.
  • strict warning: Non-static method view::load() should not be called statically in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/views.module on line 906.

देवगौड़ा की टेढी चालें

पिछले दो सालों में एचडी देवगौड़ा ने घाघ राजनीतिज्ञ की छवि भले ही बनाई। मक्कार राजनीतिज्ञ का लेबल भी खुद पर चिपका लिया। कब कौन सी राजनीतिक चाल चलेंगे, कब कौन सी करवट ले लेंगे। इसे समझना आसान नहीं। शुक्रवार को पुराने साथी एमपी प्रकाश को कांग्रेस से गठबंधन करने की हरी झंडी दी। शनिवार को बीजेपी को समर्थन की चिट्ठी दे दी। बीजेपी इस चिट्ठी से फूली नहीं समाई और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

गवर्नर की गुहार पर आज तो टला टकराव

अपने रामेश्वर ठाकुर बेहद मुश्किल में। एसेंबली भंग करने का कांग्रेसी दबाव मानें। या डेमोक्रेसी का ख्याल रखें। डेमोक्रेसी के लिहाज से सोचें। तो येदुरप्पा के पास बहुमत से सोलह एमएलए ज्यादा। एसेंबली भंग हो गई होती। तो यह टंटा ही खड़ा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही हालात के लिए फैसला दिया- 'सरकार बनाने की गुंजाइश रहे। सो पहले सस्पेंड की जाए।' इसी नजरिए से गवर्नर ने दिल्ली में कहा था- 'कोई गठबंधन सामने आए। तो सरकार बनने की गुंजाइश बरकरार।'

सोनिया ही करेंगी कर्नाटक का फैसला

पिछले दिनों आपने भी वह खबर देखी होगी। पति-पत्नी में तलाक का मुकदमा तीन साल चला। पर जब तलाक हुआ। तो तीसरे दिन दोनों ने फिर शादी कर ली। तलाक के बाद दोनों को एक-दूसरे से दूरी का अहसास हुआ। हू-ब-हू यही हाल कर्नाटक में बीजेपी-जेडीएस का।  तलाक हुए अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ। दुबारा शादी के मंडप पर जा बैठे। येदुरप्पा सेहरा बांधकर घोड़ी पर बैठ गए। दुल्हन ने सहमति दे दी। पर पंडित फेरे करवाने को तैयार नहीं। पर पहले दुबारा शादी की रामलीला सुन लो।

'तहलका' मोदी पर, नींद कांग्रेस की उड़ी

अपन सीएनबीसी टीवी-18 देख रहे थे। मुद्दा था- राजनीति में असभ्य भाषा। बात कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद की। जिनने गुजरात में जाकर कहा- 'नरेंद्र मोदी को तो अपने बाप का भी पता नहीं।' इसे अपन मां की गाली कहेंगे। कोई राजनेता पब्लिक मीटिंग में मां की गाली देगा। वह भी उस गुजरात की भूमि पर जाकर। जहां गांधी और पटेल हुए। भारत में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता। पर यह सब हुआ। तो चैनल पर बहस में करन थापर ने जयंती नटराजन से पूछा। वह झेंपती हुई बोली- 'मैं होती, तो ऐसा नहीं कहती।' करन ने पलटकर कहा- 'आपने भी तो आडवाणी को लौह पुरुष की जगह लो (घटिया)पुरुष कहा।' जयंती शर्मसार नहीं हुई।

यूपीए को तलाक यूएनपीए से हनीमून

अपन एक बार फिर याद करा दें। एटमी करार का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो अपन ने सबसे पहले इसे देश के खिलाफ कहा। अपना शुरू से मत रहा- करार से अपना फायदा कम, अमेरिका का ज्यादा। पीएम और कांग्रेस यह बात अब तक नहीं मान रहे। मनमोहन-सोनिया से एक सवाल तो वाजिब ही होगा। अगर करार अपने हक में। तो अमेरिका इतना बेचैन क्यों? निकोलस बर्न्स की इसी साल वाली ताजा धमकी क्यों? आडवाणी से अमेरिकी राजदूत डेविड मल्फर्ड की गुहार क्यों। अमेरिका मनमोहन की मदद पर क्यों उतर आया। अपन को यह समझने में कोई दिक्कत नहीं। फायदा अमेरिका का न होता। तो वह अपन को जूते की नोंक पर रखता। लेफ्ट से बात नहीं बन रही। तो बीजेपी पर डोरे।

बीता दिन संगीन मामलों में अदालती फैसलों का

वैसे तो बुधवार का दिन अदालतों के नाम रहा। चार बड़े मशहूर केसों में साठ जनों को उम्रकैद हुई। चारों केसों में जानी-मानी हस्तियां। यों तो हफ्ते की शुरूआत फिल्मी हस्तियों पर चाबुक से हुई। सोमवार को संजय दत्त जेल में गए। मंगल को आमिर खान के गैर जमानती वारंट निकले। बुध को सलमान खान अदालत की चौखट पर पहुंचे। संजय दत्त का मामला मुंबई के दंगों से जुड़ा। आमिर खान का राष्ट्रीय ध्वज के अपमान से। सलमान का चिंकारा शिकार मामले से। तीनों संगीन मामले। पर तीनों के हिमायतियों की कमी नहीं। कानून तोड़ने वालों की बात छोड़िए। अपने यहां तो आतंकियों के भी हमदर्द। अफजल की फांसी वाला मामला लटकना इसका सबूत।

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की पांचवीं मीटिंग के बाद मंगलवार को लेफ्ट की तीसरे मोर्चे से गुफ्तगू साफ संकेत। तीसरे मोर्चे में अब फिलहाल चौटाला, चंद्रबाबू और मुलायम। तीनों के साथ प्रकाश करात और एबी वर्धन ने संसद सत्र की रणनीति बनाई। पंद्रह नवंबर को शुरू होने वाला सत्र संभवत: आखिरी होगा। संभवत: करार पर लेफ्ट-यूपीए की अगले दिन होने वाली मीटिंग भी आखिरी होगी। करार की खामियां समझने का काम पूरा हो चुका। लेफ्ट का रुख पहले से ही स्पष्ट।

करार पर किरकिरी होगा पूर्ण जनादेश का एजेंडा

एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट चख-चख अब आखिरी दौर में। अपने मनमोहन तो उम्मीद छोड़ चुके। भले ही अमेरिका ने अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी। मंगलवार को व्हाइट हाऊस के प्रवक्ता टोनी फ्रेटो बोले- 'अभी से निराशा जाहिर करना जल्दबाजी होगा।' अब अपन को नहीं पता। मनमोहन ने पंद्रह अक्टूबर को बुश से क्या कहा। पृथ्वीराज चव्हाण बता रहे थे- 'एटमी करार पर बात नहीं हुई।' तो नाइजीरिया में संजय बारू ने जो  बताया था। वह क्या था? चव्हाण ने मुंह फेर लिया। हू-ब-हू यही बात अमेरिका में भी हुई। टोनी फ्रेटो बोले- 'बुश-मनमोहन बात की सही-सही जानकारी मुझे नहीं।' पर बात मनमोहन के निराश होने की।

मनमोहन का अमेरिका से इमोशनल रिश्ता ?

अपन कुत्ते-बिल्ली का खेल कहें। तो कोई बुरा मान लेगा। सो अपन इसे कछुए और खरगोश की दौड़ कहेंगे। कभी कछुआ आगे, कभी खरगोश। कभी मनमोहन आगे, कभी प्रकाश करात। कौन कछुआ, कौन खरगोश। अपन यह भी नहीं जानते। पर यह चिख-चिख अब बहुत बेढंगी हो गई। कानों को नहीं सुहाती। कभी करात की धमकी। कभी एबी वर्धन की। तो कभी मोहलत बढ़ाना। कभी मनमोहन का चुनौती देना। तो कभी वापस लेना। पता नहीं यह नौटंकी कब तक चलेगी। पहले कहा था- 'पांच अक्टूबर को आर या पार होगा।' फिर कहा- 'नौ अक्टूबर को इधर या उधर होगा।' फिर कहा- 'दुर्गा पूजा-दशहरे के बाद।' रावण दहन के बाद का नाम सुन यूपीए बेहद डर गया।

सवाल करार का नहीं, विदेश नीति का

वामपंथी दलों की मुख्य चिंता भारत-अमेरिका एटमी करार की नहीं, अलबत्ता विदेश नीति को लेकर है। एटमी करार के जरिए अमेरिका ने जिस तरह की रणनीति अख्तियार की है, उससे भारत की विदेश नीति में बदलाव होना स्वाभाविक है। मौजूदा सरकार कितना भी कहे कि भारत की विदेश नीति कतई प्रभावित नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिह का यह कथन विश्वसनीय साबित नहीं होता। खासकर ईरान को लेकर अमेरिका के भारत पर पड़ रहे दबाव के कारण यह स्पष्ट हो जाता  है कि महाशक्ति के असली इरादे क्या हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाइन का समझौता न हो, इसीलिए उसने भारत के सामने एटमी ऊर्जा का प्रस्ताव रखा था।