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October 2007

देवगौड़ा की टेढी चालें

पिछले दो सालों में एचडी देवगौड़ा ने घाघ राजनीतिज्ञ की छवि भले ही बनाई। मक्कार राजनीतिज्ञ का लेबल भी खुद पर चिपका लिया। कब कौन सी राजनीतिक चाल चलेंगे, कब कौन सी करवट ले लेंगे। इसे समझना आसान नहीं। शुक्रवार को पुराने साथी एमपी प्रकाश को कांग्रेस से गठबंधन करने की हरी झंडी दी। शनिवार को बीजेपी को समर्थन की चिट्ठी दे दी। बीजेपी इस चिट्ठी से फूली नहीं समाई और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

गवर्नर की गुहार पर आज तो टला टकराव

अपने रामेश्वर ठाकुर बेहद मुश्किल में। एसेंबली भंग करने का कांग्रेसी दबाव मानें। या डेमोक्रेसी का ख्याल रखें। डेमोक्रेसी के लिहाज से सोचें। तो येदुरप्पा के पास बहुमत से सोलह एमएलए ज्यादा। एसेंबली भंग हो गई होती। तो यह टंटा ही खड़ा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही हालात के लिए फैसला दिया- 'सरकार बनाने की गुंजाइश रहे। सो पहले सस्पेंड की जाए।' इसी नजरिए से गवर्नर ने दिल्ली में कहा था- 'कोई गठबंधन सामने आए। तो सरकार बनने की गुंजाइश बरकरार।'

सोनिया ही करेंगी कर्नाटक का फैसला

पिछले दिनों आपने भी वह खबर देखी होगी। पति-पत्नी में तलाक का मुकदमा तीन साल चला। पर जब तलाक हुआ। तो तीसरे दिन दोनों ने फिर शादी कर ली। तलाक के बाद दोनों को एक-दूसरे से दूरी का अहसास हुआ। हू-ब-हू यही हाल कर्नाटक में बीजेपी-जेडीएस का।  तलाक हुए अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ। दुबारा शादी के मंडप पर जा बैठे। येदुरप्पा सेहरा बांधकर घोड़ी पर बैठ गए। दुल्हन ने सहमति दे दी। पर पंडित फेरे करवाने को तैयार नहीं। पर पहले दुबारा शादी की रामलीला सुन लो।

'तहलका' मोदी पर, नींद कांग्रेस की उड़ी

अपन सीएनबीसी टीवी-18 देख रहे थे। मुद्दा था- राजनीति में असभ्य भाषा। बात कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद की। जिनने गुजरात में जाकर कहा- 'नरेंद्र मोदी को तो अपने बाप का भी पता नहीं।' इसे अपन मां की गाली कहेंगे। कोई राजनेता पब्लिक मीटिंग में मां की गाली देगा। वह भी उस गुजरात की भूमि पर जाकर। जहां गांधी और पटेल हुए। भारत में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता। पर यह सब हुआ। तो चैनल पर बहस में करन थापर ने जयंती नटराजन से पूछा। वह झेंपती हुई बोली- 'मैं होती, तो ऐसा नहीं कहती।' करन ने पलटकर कहा- 'आपने भी तो आडवाणी को लौह पुरुष की जगह लो (घटिया)पुरुष कहा।' जयंती शर्मसार नहीं हुई।

यूपीए को तलाक यूएनपीए से हनीमून

अपन एक बार फिर याद करा दें। एटमी करार का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो अपन ने सबसे पहले इसे देश के खिलाफ कहा। अपना शुरू से मत रहा- करार से अपना फायदा कम, अमेरिका का ज्यादा। पीएम और कांग्रेस यह बात अब तक नहीं मान रहे। मनमोहन-सोनिया से एक सवाल तो वाजिब ही होगा। अगर करार अपने हक में। तो अमेरिका इतना बेचैन क्यों? निकोलस बर्न्स की इसी साल वाली ताजा धमकी क्यों? आडवाणी से अमेरिकी राजदूत डेविड मल्फर्ड की गुहार क्यों। अमेरिका मनमोहन की मदद पर क्यों उतर आया। अपन को यह समझने में कोई दिक्कत नहीं। फायदा अमेरिका का न होता। तो वह अपन को जूते की नोंक पर रखता। लेफ्ट से बात नहीं बन रही। तो बीजेपी पर डोरे।

बीता दिन संगीन मामलों में अदालती फैसलों का

वैसे तो बुधवार का दिन अदालतों के नाम रहा। चार बड़े मशहूर केसों में साठ जनों को उम्रकैद हुई। चारों केसों में जानी-मानी हस्तियां। यों तो हफ्ते की शुरूआत फिल्मी हस्तियों पर चाबुक से हुई। सोमवार को संजय दत्त जेल में गए। मंगल को आमिर खान के गैर जमानती वारंट निकले। बुध को सलमान खान अदालत की चौखट पर पहुंचे। संजय दत्त का मामला मुंबई के दंगों से जुड़ा। आमिर खान का राष्ट्रीय ध्वज के अपमान से। सलमान का चिंकारा शिकार मामले से। तीनों संगीन मामले। पर तीनों के हिमायतियों की कमी नहीं। कानून तोड़ने वालों की बात छोड़िए। अपने यहां तो आतंकियों के भी हमदर्द। अफजल की फांसी वाला मामला लटकना इसका सबूत।

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की पांचवीं मीटिंग के बाद मंगलवार को लेफ्ट की तीसरे मोर्चे से गुफ्तगू साफ संकेत। तीसरे मोर्चे में अब फिलहाल चौटाला, चंद्रबाबू और मुलायम। तीनों के साथ प्रकाश करात और एबी वर्धन ने संसद सत्र की रणनीति बनाई। पंद्रह नवंबर को शुरू होने वाला सत्र संभवत: आखिरी होगा। संभवत: करार पर लेफ्ट-यूपीए की अगले दिन होने वाली मीटिंग भी आखिरी होगी। करार की खामियां समझने का काम पूरा हो चुका। लेफ्ट का रुख पहले से ही स्पष्ट।

करार पर किरकिरी होगा पूर्ण जनादेश का एजेंडा

एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट चख-चख अब आखिरी दौर में। अपने मनमोहन तो उम्मीद छोड़ चुके। भले ही अमेरिका ने अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी। मंगलवार को व्हाइट हाऊस के प्रवक्ता टोनी फ्रेटो बोले- 'अभी से निराशा जाहिर करना जल्दबाजी होगा।' अब अपन को नहीं पता। मनमोहन ने पंद्रह अक्टूबर को बुश से क्या कहा। पृथ्वीराज चव्हाण बता रहे थे- 'एटमी करार पर बात नहीं हुई।' तो नाइजीरिया में संजय बारू ने जो  बताया था। वह क्या था? चव्हाण ने मुंह फेर लिया। हू-ब-हू यही बात अमेरिका में भी हुई। टोनी फ्रेटो बोले- 'बुश-मनमोहन बात की सही-सही जानकारी मुझे नहीं।' पर बात मनमोहन के निराश होने की।

मनमोहन का अमेरिका से इमोशनल रिश्ता ?

अपन कुत्ते-बिल्ली का खेल कहें। तो कोई बुरा मान लेगा। सो अपन इसे कछुए और खरगोश की दौड़ कहेंगे। कभी कछुआ आगे, कभी खरगोश। कभी मनमोहन आगे, कभी प्रकाश करात। कौन कछुआ, कौन खरगोश। अपन यह भी नहीं जानते। पर यह चिख-चिख अब बहुत बेढंगी हो गई। कानों को नहीं सुहाती। कभी करात की धमकी। कभी एबी वर्धन की। तो कभी मोहलत बढ़ाना। कभी मनमोहन का चुनौती देना। तो कभी वापस लेना। पता नहीं यह नौटंकी कब तक चलेगी। पहले कहा था- 'पांच अक्टूबर को आर या पार होगा।' फिर कहा- 'नौ अक्टूबर को इधर या उधर होगा।' फिर कहा- 'दुर्गा पूजा-दशहरे के बाद।' रावण दहन के बाद का नाम सुन यूपीए बेहद डर गया।

सवाल करार का नहीं, विदेश नीति का

वामपंथी दलों की मुख्य चिंता भारत-अमेरिका एटमी करार की नहीं, अलबत्ता विदेश नीति को लेकर है। एटमी करार के जरिए अमेरिका ने जिस तरह की रणनीति अख्तियार की है, उससे भारत की विदेश नीति में बदलाव होना स्वाभाविक है। मौजूदा सरकार कितना भी कहे कि भारत की विदेश नीति कतई प्रभावित नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिह का यह कथन विश्वसनीय साबित नहीं होता। खासकर ईरान को लेकर अमेरिका के भारत पर पड़ रहे दबाव के कारण यह स्पष्ट हो जाता  है कि महाशक्ति के असली इरादे क्या हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाइन का समझौता न हो, इसीलिए उसने भारत के सामने एटमी ऊर्जा का प्रस्ताव रखा था।

बेनजीर और नवाज शरीफ का पाकिस्तान

बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान वापसी ने परवेज मुशर्रफ की मुश्किलें कम करने की बजाए बढ़ा दी हैं। तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन करके परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में अपनी हकूमत की मियाद तो बढ़ा ली। लेकिन परवेज मुशर्रफ की अपनी साख लगातार घट रही है। पाकिस्तान समेत दुनियाभर का आम मुसलमान अमेरिका को इस्लाम विरोधी मानता है और जो भी मुस्लिम नेता अमेरिका का साथ देता है, उसे इस्लाम विरोधी मानने लगता है। यह  धारणा अब परवेज मुशर्रफ के बारे में भी बन चुकी है, इसीलिए इस्लामिक कट्टरवादियों ने उन पर तीन बार कातिलाना हमला किया।

तालिबान-आईएसआई गठजोड़ बुश पर भारी

अपन ने कल जब लिखा- 'मुशर्रफ अब एलानिया अमेरिकी एजेंट। पाक में कोई साख नहीं। सो जो मुशर्रफ से सौदा करे। वह भी अमेरिकी एजेंट। बेनजीर की वापसी से ठीक पहले तालिबान ने धमकी दी।'  तो अपनी आशंका साफ थी- हो, न हो तालिबानी फिदायिन हमला जरूर करेंगे। तालिबानी बेतुल्ला महमूद ने कह दिया था- 'बेनजीर का स्वागत फिदायिन करेंगे।' आखिर बेनजीर के काफिले पर फिदायिन हमला हो ही गया। अपन को रायसिना रोड का वह मंजर याद आया।

बुश ने बनाया बेनजीर को मुशर्रफ की ढाल

बेनजीर भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसी। तो अदालती फैसले से ठीक पहले इंग्लैंड भाग गई। बेचारे पति आसिफ अली जरदारी ने जेल की हवा खाई। बेनजीर दुबई-इंग्लैंड में दुबकी रही। हां, जरदारी के लिए दुआ करने अजमेर शरीफ जरूर आई। यों भी बेनजीर का अपने राजस्थान से गहरा रिश्ता। पर पहले आठ साल बाद लौटने पर कराची में हुए स्वागत की बात। अपनी बेटी के स्वागत में सारा शहर सड़कों पर आ गया। बेनजीर पहले उसी जिन्ना की मजार पर गई। जहां जाकर अपने आडवाणी संघ परिवार में अछूत हो गए थे। आडवाणी-बेनजीर दोनों सिंधी। अब राजस्थानी रिश्ते की बात। बेनजीर के दादा थे जूनागढ़ के वजीर-ए-आजम सर शाहनवाज भुट्टो। शाहनवाज की दूसरी पत्नी रतन बाई अपने जोधपुर की थी।

मार्केट सुधारने पर जोर राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर

शेयर बाजार को अपन ज्यादा नहीं जानते। अलबत्ता जानते ही नहीं। सो अपन कभी इस पचड़े में नहीं पड़े। पर जब कभी शेयर बाजार ने भूचाल मचाया। अपन को भी क-ख-ग समझना पड़ा। वाजपेयी के वक्त तब सिर्फ एक बार बवाल मचा। जब सिंगापुर रूट से मार्केट में उछाल आया। यशवंत सिन्हा की बेटी सिंगापुर में थी। सो संसद में ऊंगली सिन्हा पर उठी।

करार टला, सरकार पर खतरा नहीं

तीन अगस्त को वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो उसके बाद अपन बार-बार लिखते रहे- लेफ्ट सिर्फ न्यूक-डील पर सरकार नहीं गिराएगा। साथ में आर्थिक मुद्दे भी जोड़ेगा। अब जब एटमी करार ठंडे बस्ते में पड़ गया। तो कांग्रेस खेमे में भले ही मातम। लेफ्ट में किला फतेह होने पर कोई खुशी नहीं। असल में लेफ्ट को अभी भी कांग्रेस की नियत पर शक। सो लेफ्ट ने मंगलवार को जो नए तेवर दिखाए। उनका जिक्र अपन बाद में करेंगे। पहले अमेरिका में छाए मातम की बात कर लें। करार ठंडे बस्ते में पड़ने से बुश बेहद खफा।

अपने मंत्री रूस की ओर, सोनिया चीन की तरफ

अपन ने यहीं पर बारह अक्टूबर को वह ब्रेकिंग न्यूज दी। जिसमें अपन ने लिखा- 'आईएईए-एनएसजी समझौते तीन महीने ठंडे बस्ते में पड़ेंगे।' जब आप लोग यह पढ़ चुके। तो उसी दिन मनमोहन-सोनिया के एचटी सम्मेलन में भाषण का लब्बोलुआब था- 'सरकार वक्त से पहले गिराने का इरादा नहीं। एटमी करार भले ही ठंडे बस्ते में पड़े।' यही अपन ने तेरह अक्टूबर को लिखा।

जमीनी हकीकत ने बदली चुनावी रणनीति

लोकसभा पर मंडराए बादल फिलहाल छंट गए। एटमी करार को ठंडे बस्ते में डाल मनमोहन इतवार को पांच  दिन की विदेश यात्रा पर रवाना होंगे। नेहरू के बाद मनमोहन द्विपक्षीय  बातचीत के सिलसिले में नाइजीरिया जाने वाले पहले पीएम होंगे। नेहरू 1962 में नाइजीरिया गए थे। वाजपेयी 2003 में नाइजीरिया जरूर गए, पर कामन वेल्थ सम्मेलन के सिलसिले में। मध्यावधि चुनाव टालने के बाद सोनिया भी मंगलवार को रायबरेली रवाना होंगी।

मुसीबत जेटली की

अरुण जेटली ने जिस भी राज्य में चुनाव की बागडोर संभाली, सफलता हासिल की। गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब के अलावा 1998 का हिमाचल चुनाव और 2006 का दिल्ली नगर निगम चुनाव भी इसका उदाहरण। राजनाथ सिंह ने अरुण जेटली को गुजरात का प्रभार नहीं देकर उनका कद घटाने की कोशिश की, लेकिन जब खुद नरेंद्र मोदी ने उन्हें ही विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाने की मांग की तो पार्टी अध्यक्ष के पास कोई चारा नहीं था। अरुण जेटली भी यही चाहते थे, आखिर यह एक तरह से राजनाथ सिंह की हार थी। लेकिन चुनाव प्रभारी बनने के बाद अरुण जेटली के सामने म

यूपीए की तिकड़ी भारी पड़ी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उम्मीद थी कि अमेरिका से एटमी करार के मुद्दे पर सोनिया गांधी आखिर तक उनका साथ देंगी। इसलिए उन्होंने दस अगस्त को कोलकाता के टेलीग्राफ अखबार को इंटरव्यू देकर वामपंथियों को खुली चुनौती दे दी थी। सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का दो महीने तक पूरा साथ दिया। पहले छह अक्टूबर को प्रधानमंत्री की इफ्तार पार्टी में और अगले दिन हरियाणा की एक रैली में एटमी करार का विरोध करने वाले कम्युनिस्टों को खुद चुनौती दी। लेकिन जब यूपीए के घटक दलों के तीन बड़

ज्योतिरादित्य की ताजपोशी

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हिंदुस्तान टाइम्स सम्मेलन में केंद्रीय मंत्रिमंडल के फेरबदल का संकेत देकर कांग्रेसियों में भगदड़ मचा दी है। अब तक मंत्री पद से वंचित रहे कांग्रेसी सांसद इसे आखिरी मौका मानकर सिर-धड़ की बाजी लगाने पर उतर आए हैं। लेकिन सोनिया गांधी के करीबी दावा कर रहे हैं कि इस बार के फेरबदल में सिर्फ युवाओं को ही मौका मिलेगा। अगर ऐसा ही हुआ तो ज्योतिरादित्य का नंबर लगना तय है। युवा सांसदों में उन्होंने अपनी छवि अलग तरह की बनाई है, वह संसद में

हिमाचल कांग्रेस में दहशत

भाजपा आरोप लगाती रही है कि चुनाव आयुक्त नवीन चावला हर खबर सोनिया गांधी को लीक करते हैं। लेकिन चुनाव आयोग की ओर से अचानक हिमाचल प्रदेश के चुनाव समय से दो महीने पहले कर दिए जाने की कांग्रेस को भनक तक नहीं लगी। अगर जरा सा भी संकेत मिलता तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपना अमेरिका दौरा रद्द करके आचार संहिता लागू होने से पहले-पहले कुछ चुनावी घोषणाएं कर देते। जब चुनाव की घोषणा हुई तो वीरभद्र सिंह अमेरिका में थे। हड़बड़ाए सारे कांग्रेसी मंत्री दिल्ली पहुंच गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें।

मायावती का डर

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह को नेस्तनाबूद करके मायावती के मुख्यमंत्री बनने पर भी कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हो रहा है। अलबत्ता  हालात और विकट हो गए हैं। मुलायम सिंह की हैसियत उत्तर प्रदेश  से बाहर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की नहीं थी। लेकिन मायावती की हैसियत अब बाकी राज्यों में पांव फैलाकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की हो गई है। शुरूआती मीठी-मीठी बातों के बाद मायावती ने अब कांग्रेस के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया है। मायावती ने चुनाव में साथ देने वाले उत्तर प्रदेश के ब्राह

ताजा अक्ल, करार पर चुनाव अक्लमंदी नहीं

मिड टर्म चुनाव हुए। तो बीस महीने पहले देश पर तीन सौ करोड़ का बोझ। यह तो सरकारी खर्च। कोई दस गुना राजनीतिक दलों का खर्च समझ लो। देश पर सवा तीन हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा। तो महंगाई का अंदाजा लगा लो। वैसे भी महंगाई और कांग्रेस का चोली-दामन का साथ। आजकल प्याज से सेब सस्ता। सो इस महंगाई में चुनाव जितने दिन टलें। उतना अच्छा। गुरुवार को लालू-पवार ने चुनाव टलने की बात कही। तो शुक्र को खुद सोनिया-मनमोहन ने चुनाव से तौबा की। वैसे अपन को बजट के बाद अब भी चुनाव का अंदेशा।

तो रूस से एटमी करार तोड़ेगा लेफ्ट से गतिरोध

मनमोहन-अल बरदई गुफ्तगू हो गई। डेढ़ घंटा सिर्फ खाना तो नहीं खाया होगा। या सौफे पर बैठे भारत-आस्टे्रलिया मैच तो नहीं देख रहे होंगे। जरूर रिएक्टरों की निगरानी पर बतियाए होंगे। पर लेफ्ट को क्यों बताएं। लेफ्ट ने पहले ही कह दिया था- 'बात की तो देख लेंगे।' बुधवार को प्रणव-बरदई मुलाकात हुई। तो बताया गया- 'सिर्फ एटमी ऊर्जा की जरूरत पर बात हुई। रिएक्टरों की निगरानी पर नहीं।' यों यूएन की इंटरनेशनल एटमी एनर्जी एजेंसी के प्रमुख बरदई कोई अमेरिकी एजेंट नहीं।

मिड टर्म से पहले राहुल का टर्मिनल

अपन ने सितंबर में लिखा- 'यूपीए सरकार चार महीनों की मेहमान।' मंगलवार को यूपीए-लेफ्ट में युध्द विराम की नौटंकी ही हुई। युध्द विराम नहीं। यों तो लेफ्टिए धर्म-कर्म के विरोधी। पर दुर्गापूजा पर वोटरों को लुभाने में विघ्न न पड़े। सो दशहरे तक की मोहलत दी। अपने मुख्तार अब्बास नकवी की नजर में तो यह युध्द विराम में कमर्शियल ब्रेक। जो दोनों ने अपना कमर्शियल फायदा देखकर लगाई। तब तक कांग्रेसी हुकमरान अल बरदई से बतिया लेंगे।

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देश की राजधानी दिल्ली में 29 वर्ष से पत्रकारिता में। इस दौरान 10 वर्ष तक पंजाब केसरी,जनसत्ता, दैनिक जागरण में डेस्क पर काम करने के बाद 1992 से 2011 तक दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में विशेष संवाददाता से शुरूआत कर के राजनीतिक संवाददाता के रूप में पत्रकारिता। दैनिक नवज्योति का दिल्ली ब्यूरो प्रमुख। राजस्थान पत्रिका का राजनीतिक संपादक और 2010 से ईटीवी के राष्ट्रीय इनपुट हैड। दिसंबर 2011 से दिसंबर 2014 राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग , उत्तराखंड के चेयरमैन। राजनीतिक लेखन के अतिरिक्त विदेश मामलों मे विशेष दिलचस्पी। 13 वर्ष तक दैनिक

दिल्ली की नौटंकी शुरू कर्नाटक का नाटक खत्म

अपन को लगता था- अल बरदई भारत आएंगे। तो लेफ्ट आपे से बाहर होगा। पर लेफ्ट के नेता लालू से गलबहियां डाले बाहर निकले। प्रणव दा के माथे पर कोई शिकन नहीं दिखी। अलबत्ता बुढ़ापे में जैसे जोश आ गया हो। वैसे भागते हुए मीटिंग से बाहर निकले। ऐसे, जैसे कोई मोर्चा फतह कर लिया हो। बाहर तो हंसते हुए चेहरे दिखे। पर अंदर ऐसी बात नहीं थी। कुमारस्वामी ने साबित किया।

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कर्नाटक का नाटक अब दिल्ली में भी शुरू

ट्वंटी-20 विश्व कप आखिरी मैच में जैसा हुआ। हू-ब-हू वही चंडीगढ़ में हुआ। जहां अपने धोनी ने आस्ट्रेलिया को धो डाला। भले ही दो मैच हार कर धोया। पर बात ट्वंटी-20 के आखिरी मैच की। जो भारत-पाक में हुआ था। आखिरी ओवर ने खेल बदल डाला। हारता-हारता भारत जीत गया। जीत के करीब पहुंचकर पाक हार गया। अब कर्नाटक के ट्वंटी-20 में आखिरी ओवर रोमांचक। एक पल लगा बीजेपी-जेडीएस मैच फिक्स हो जाएगा। दूसरे पल लगा। बीजेपी-जेडीएस शादी टूटनी तय।

गेंद अब जल्द ही होगी गवर्नर के पाले में

अब दिल्ली की कवायद एकदम बेकार। अपन ने तो शुरू में ही लिख था- 'येदुरप्पा-कुमारस्वामी की बेमेल जोड़ी कब तक?' बात तो तभी से साफ थी। बेंगलूर में जब बीजेपी की वर्किंग कमेटी हुई। तभी ही दिखने लगा था- कुमारस्वामी अपनी पारी पूरी करते ही पलट जाएंगे। सितंबर में बातें साफ होनी शुरू हो गई। देवगौड़ा परिवार को तब तक बीजेपी में कोई खोट नहीं दिखा। न ही येदुरप्पा में कोई खोट दिखा। जब तक तीन अक्टूबर नजदीक नहीं आ गई।

'मौकापरस्ती ही राजनीति' कुमारस्वामी उवाच

बीजेपी को अभी भी उम्मीद। देवगौड़ा की नौटंकी अब अनाड़ियों को भी समझ आ चुकी। पर बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड को समझ नहीं आई। जमीनी हकीकत से कितनी दूर चली गई बीजेपी। जब छोटी-छोटी राजनीतिक चालें समझ न आएं। तो पार्टी का मेंटल लेवल कितना गिर गया होगा। अपन को अंदाज लगाने में मुश्किल नहीं। चेन्नई आईआईटी के एक प्रोफेसर हैं इंद्रसेन। उनने एक थ्योरी दी।

कर्नाटक ट्वंटी-20 में बीजेपी लड़खड़ाई

अपन को येदुरप्पा का पंद्रह अगस्त वाला बयान नहीं भूलता। उनने कहा था- 'अगली बार बेंगलूर में झंडा मैं फहराऊंगा।' येदुरप्पा बहुत जल्दी में थे। पंद्रह अगस्त से भी पहले उनने बचकानी हरकत की। जब उनतीस जुलाई को विधानसभा में कहा- 'तीन अक्टूबर से मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठूंगा।' यह बात उनने बगल में बैठे कुमारस्वामी की मौजूदगी में कही। जैसे कुमारस्वामी को कुर्सी खाली करने के लिए चिढ़ा रहे हों। स्याने लोग इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाते।

कुर्सी के लिए मचलते कुमारस्वामी - येदुरप्पा

आम चुनाव दूर नहीं। रेवड़ियां बंटने लगीं। लेफ्ट ने हाथ न भी खींचा। तो कांग्रेस कोई और बहाना ढूंढेगी। अगले साल तक लटका। तो रेवड़ियां खत्म हो चुकी होंगी। अपन रेवड़ियों की गिनती बाद में करेंगे। पहले गांधी को याद कर लें। इस बार कांग्रेस को गांधी कुछ ज्यादा ही याद आए। प्रणव मुखर्जी संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में गए। तो सोनिया को साथ ले गए। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार गांधी के जन्मदिन को मान्यता दी। अब यह दिन दूनियाभर में 'अहिंसा दिवस' होगा।

जेटली के डिनर से बीजेपी में खलबली

अरुण जेटली का डिनर न्यौता चौंकाने वाला था। तीस सितंबर को न जेटली का जन्मदिन। न पत्नी संगीता का जन्मदिन। न शादी की सालगिरह। संगीता और अरुण के न्यौते ने बीजेपी में हलचल मचा दी।  हफ्ताभर लोग पूछताछ करते रहे। वेंकैया नायडू जब अध्यक्ष बने। तो उनने सालाना लंच-डिनर का सिलसिला शुरू किया। खास तेलुगू स्टाइल के व्यंजन। उससे पहले अपने रामदास अग्रवाल ही भोज राजनीति करते रहे। आडवाणी ने कभी भोज दिया हो। अपन को याद नहीं आता।