January 2007

रूस और अमेरिका दोनों के लिए भारत सिर्फ मार्केट

बीते हफ्ते चौदहवीं लोकसभा के मध्यावधि सर्वेक्षणों की धूम रही। दो निजी चैनलों और उनके प्रिंट मीडिया ने सर्वेक्षण एजेंसियों के साथ मिलकर मध्यावधि सर्वेक्षण करवाए। दोनों औद्योगिक घरानों का मकसद सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था। अगर एक चैनल अपना जन सर्वेक्षण जारी कर दे और टुकड़ों-टुकड़ों में जारी कर दे, तो उसे लगातार टीआरपी में बढ़ोतरी मिलती है। प्रतिद्वंदी चैनल को भी जवाबी तैयारी करनी ही पड़ती है। राजेंद्र यादव ने जनवरी के 'हंस' का विशेषांक विजुअल मीडिया की टीआरपी लड़ाई पर ही निकाला है। इस विशेषांक में खुद विजुअल मीडिया के पत्रकारों ने अपनी टीआरपी की भूख मिटाने के लिए किए और किए जा रहे कुकर्मो का खुलासा किया है।

सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से बढ़ती दूरियां

मनमोहन सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कारगुजारियों की अगर समीक्षा की जाए, तो पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के मुकाबले बहुत कमजोर साबित होती है। मनमोहन सिंह इस बात का दावा ठोक रहे हैं कि उन्हाेंने परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करके भारत का 33 साल से चला आ रहा अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार खत्म करवाने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैसे अमेरिका के परमाणु ऊर्जा ईंधन के निर्यात संबंधी कानून की धारा वन-टू-थ्री के तहत जब समझौता सिरे चढ़ेगा, तभी माना जाएगा कि उन्होंने कोई सफलता हासिल की है। मेरा मानना हैं कि इस समझौते में अभी बहुत अड़चने हैं, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन यह समझौता अमेरिकी कांग्रेस की ओर से पास किए गए कानून के दायरे में रहकर ही कर सकता है।

निठारी गांव से मिलने वाला सबक

छब्बीस दिसंबर को जब पायल नाम की एक लड़की के लापता होने और उसके मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव के पास नोएडा की कोठी डी-5 में जाकर रुक गई, तो कोठी के मालिक मोनिन्द्र सिंह को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। तब तक किसी ने सोचा तक नहीं था कि पायल के मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव से गायब हो रहे बच्चों की गुत्थी सुलझा देगी। मोनिन्द्र सिंह के बाद उसके नौकर सतीश उर्फ सुरेंद्र को अल्मोड़ा के पास मंगरुकखाल गांव से गिरफ्तार किया गया तो गुत्थी सुलझती चली गई। मोनिन्द्र सिंह सारा ठीकरा सुरेंद्र के सिर फोड़ रहा है तो सुरेंद्र सारा ठीकरा मोनिन्द्र के सिर।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट