November 2006

संसदीय प्रणाली पर चोट करने का स्टिंग ऑपरेशन

देश बड़ी बेसब्री से ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है। तेरह जनवरी को चीफ जस्टिस वाई के सभ्रवाल रिटायर हो जाएंगे। उससे पहले फैसला आना स्वाभाविक है। लेकिन माना यह जाना चाहिए कि 15 दिसम्बर को सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों से पहले फैसला आना चाहिए। वैसे अगर फैसला शीत सत्र से पहले या शीत सत्र के दौरान आ जाता, तो अच्छा रहता। पिछले एक साल से लोकसभा के दस सांसदों ने सदन का मुंह नहीं देखा। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी सांसदों के क्षेत्रों में चुनाव करवाने पर भी रोक लगा दी थी। मेरा शुरू से यह मत रहा है कि संसद को संविधान के किसी प्रावधान में सांसदों को बर्खास्त करने का हक नहीं दिया।

करजई-मनमोहन चाहें, तो मुशर्रफ होंगे मुश्किल में

पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज मोहम्मद खान इस बार भारत आए, तो काफी डरे हुए थे। इसकी ताजा वजह यह है कि बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉवींस में जंग--आजादी एक बार फिर मुंह बाए खड़ी है। पाकिस्तान के विदेश सचिव इस्लामाबाद लौटे ही थे, कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद करजई शिमला से होते हुए दिल्ली पहुंच गए। बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर का भारत से शायद उतना नाता नहीं है, जितना अफगानिस्तान से है। पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा विवाद का मुद्दा बना दिया, लेकिन खुद उसने बिना बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस से कोई बात किए इन दोनों सीमांत राज्यों पर बलात कबजा किया था।

सद्दाम को फांसी से पहले बुश का बंटाधार

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डबलयू बुश ने 2003 में इराक पर हमला करने के बाद अपने देश में भारी विरोध के बावजूद जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था, तो ऐसा लगता था कि रिपबिलकन पार्टी का दबदबा राष्ट्रपति पद पर अगले चुनाव तक रहेगा। लेकिन जॉर्ज बुश की दूसरी आधी अवधि भी अभी पूरी नहीं हुई कि अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट दोनों में रिपबिलकन पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। कानून बनाने वाले इन दोनों ही सदनों में जॉर्ज बुश और उनकी रिपबिलकन पार्टी का कबजा नहीं रहा, अलबता दोनों ही जगह डेमोक्रेट्स का बहुमत हो गया है। डेमोक्रेट्स पार्टी के बिल क्लिंटन जब तक राष्ट्रपति रहे, खूब लोकप्रिय रहे। लेकिन जैसे ही उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हुआ, डेमोक्रेट्स अपने नए उम्मीदवार को विजय नहीं दिला पाए।

भारतीय सड़कों पर वीआईपी आतंक

राजस्थान हाईकोर्ट ने वीआईपी मूवमेंट के दौरान जनता को होने वाली परेशानी पर एक अहम फैसला सुनाया है। पर हाईकोर्ट के इस फैसले पर कितना अमल हो पाएगा, मुझे आशंका है। हू--हू ऐसा ही फैसला पहले दिल्ली हाईकोर्ट भी दे चुकी है। लेकिन दिल्ली में वीवीआईपी मूवमेंट के समय ट्रैफिक जाम करने की पुलिस की ढींगामुश्ती खत्म नहीं हुई। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने इस मामले में कुछ नियम बनाए थे। इन नियमों के मुताबिक सिर्फ एक तरफ का टै्रफिक रोका जाता था, जबकि दूसरी तरफ का टै्रफिक चलता रहता था। लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद जनता पर नेताओं और पुलिस की मिलीजुली ढींगामुश्ती फिर शुरू हो गई। वीआईपी सुरक्षा की वजह से आम जनता को जो परेशानी झेलनी पड़ती है, उसका कोई जवाब नहीं।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट