October 2006

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दो दशकों में बदल गया मीडिया

करीब एक साल पहले वीर सिंघवी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख में दावा किया था कि सोनिया गांधी कभी भी देश की प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थी। उनका दावा था कि सोनिया गांधी ने 1999 में भी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा नहीं किया था। बाद में इसी अखबार में लीड के तौर पर इससे मिलती जुलती खबर छपी, जिसमें कहा गया कि 2004 चुनाव नतीजों के फौरन बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला कर लिया था। इन दोनों ही खबरों की के आर नारायणन के जीवित रहते किसी ने पुष्टि नहीं की। हालांकि 2004 का इतिहास बहुत पुराना नहीं हुआ और मेरे जैसे दर्जनों पत्रकार उस पूरे घटनाक्रम के गवाह हैं कि सोनिया गांधी के घर हुई बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री की शपथ लेने के लिए नेता चुना गया था।

सेना का आधुनिकीकरण रोकने की साजिश

जॉर्ज फर्नाडिज के खिलाफ दायर एफआईआर के गुण दोष पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं, जो जॉर्ज फर्नाडिज को भ्रष्ट मानते हैं, लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं, जो उन्हें जुझारू और सच्चा देश भक्त मानते हैं और इस केस को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित समझते है। डीआरडीओ की आपत्ति को जॉर्ज के खिलाफ एफआईआर का मुख्य आधार बनाया गया है। कहा गया है कि डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष अबदुल कलाम ने राजग सरकार को यह कहते हुए बराक मिसाइल खरीदने से रोका था कि एक तो वह पूरी तरह सक्षम नहीं है और दूसरा डीआरडीओ जल्द ही त्रिशूल बनाकर सेना को सौंप देगा।

कूटनीति की किरकिरी

अगर नेपाल के साथ भारत की प्रत्यार्पण संधि नहीं होती है तो मनमोहन सरकार कूटनीति के मामले में आजादी के इतिहास के बाद देश की सबसे नकारा साबित होगी। अगर नेपाल के साथ प्रत्यार्पण संधि होगी तो नक्सलवादियों का वहां हिंसा फैलाकर भारत में आकर खुले घूमना और भारत में हिंसा फैलाकर नेपाल में भाग जाना बंद हो जाएगा। मनमोहन सरकार को समर्थन दे रही दोनों वामपंथी पार्टियां ऐसा नहीं चाहती, इसलिए उनके दबाव में नेपाल के गृह मंत्री कृष्ण प्रसाद सितौला का आखिरी समय में प्रत्यार्पण संधि के लिए भारत आना टला। चीन सरकार और भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के षडयंत्र के तहत नेपाल पहले ही अपना हिंदू राष्ट्र का दर्जा खत्म करके खुद को सेक्युलर देश घोषित कर चुका है, हालांकि अपने पड़ोसी देश नेपाल में हुआ यह घटनाक्रम कूटनीति के लिहाज से बिलकुल ठीक नहीं है, लेकिन वामपंथियों के दबाव में मनमोहन सरकार चुप्पी साधकर बैठी रही।