September 2006

संस्कृति, सभ्यता, संविधान और हिंदू

हाल ही में अल कायदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को सलाह दी कि अगर वह बचना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए। इससे भी पहले एक खबर आई कि एक ईसाई महिला पत्रकार का अपहरण किया गया और उसका धर्म परिवर्तन करवा कर मुक्त कर दिया गया। उसे धमकी दी गई कि वह अब मुस्लिम के तौर पर ही रहेगी। ईरान और अफगान से आए मुगलों ने हिंदुस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़ी थी, इसी वजह से कश्मीर में ज्यादातर आबादी मुस्लिम हो गई, जबकि वहां सौ फीसदी आबादी ब्राह्मणों की थी। कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर ही गुरु तेगबहादुर ने बलिदान दिया और उसके बाद सिख मत का उदय हुआ।

विकास के लिए जरुरी राजनीतिक स्थिरता

झारखंड में सता परिवर्तन के बाद मौजूदा संविधान पर एक बार फिर गौर करने का वक्त आ गया है। कई बार लगता है कि अमेरिका का संविधान भारत के संविधान से कहीं बेहतर है। शायद इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक स्थिरता कायम रहती है और विकास की गति मंद होने के सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत के बारे में कहा जाता है कि या तो चुनाव हो रहे होते हैं, या चुनावों की तैयारी हो रही होती है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सरकारों को इतना कमजोर और अस्थिर बना दिया है कि कोई भी निर्दलीय विधायक सरकार को गिराने की स्थिति में होता है। बड़े राजनीतिक दलों का जमीनी आधार खिसकने के बाद इस स्थिति ने विकराल रुप धारण कर लिया है।

मालेगांव से सबक लें मुसलमान

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था- 'फटा हुआ बम अपने शिकार का धर्म या जाति नहीं पूछता।' मालेगांव में हुए बम धमाकों से यह बात सही साबित हो गई। इससे पहले आतंकवादी सिर्फ उन्हीं जगहों को निशाना बनाते थे, जहां हिंदू बहुल आबादी हो। पहली बार ऐसा हुआ है कि बम ऐसी जगह पर फटे हैं जो मुस्लिम बहुल आबादी वाला क्षेत्र है। हालांकि इस घटना के फौरन बाद किसी भी नतीजे पर पहुंचना नादानी होगा, लेकिन देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने कई घंटों की समीक्षा और गुप्तचर एजेंसियों से मिली रिपोर्ट के बाद आतंकवादियों की वारदात कहकर उन अफवाहों को निराधार कर दिया, जिन्हें फैलाकर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने की शुरुआत हो चुकी थी।

विपदाओं पर राजनीतिक रोटियां

राजस्थान में आई बाढ़ ने उस राजनीति की याद फिर ताजा कर दी, जो एनडीए सरकार के समय देखने को मिली थी। सोनिया गांधी उस समय विपक्ष की नेता थी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। सोनिया गांधी बार-बार राजस्थान में जाकर केंद्र पर सूखा राहत में भेदभाव का आरोप लगा रही थी। यह आरोप मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में लगाए जाते थे, इसलिए जनता का एक बड़ा तबका इन आरोपों को सही मानता था। लेकिन दिल्ली में बैठे एनडीए सरकार के कर्ताधर्ताओं ने सोनिया गांधी के आरोपों की आंकड़ों के साथ धाियां उड़ाना शुरू किया, तो खुद गहलोत सरकार कटघरे में खड़ी हो गई थी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट