August 2006

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क्रीमीलेयर के लिए ही बिल बनाती सरकार

संविधान निर्माताओं ने जब अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का फैसला किया, तो बहुत लंबा चौड़ा विचार विमर्श हुआ था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने और सदियो सदियों से पिछडे दोनों समुदायों को आरक्षण का फैसला बाकी समाज में लाकर खड़ा करने की सोच का नतीजा था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने का फैसला तो स्पष्ट है, इसलिए हुआ था, क्योंकि मुसलमानों ने अपना पाकिस्तान धार्मिक आधार पर ही बनाया था। जबकि भारत में जितने भी इसाई है, वे सभी के सभी पहले हिंदू अनुसूचित जाति और जनजाति के थे और धर्मांतरण की मुख्य वजह भी यही बताई जाती रही कि उनके साथ हिंदू समाज में बराबरी का व्यवहार नहीं होता था।

नियंत्रण रेखा को बार्डर बनाना बेहतर हल

दो साल सात महीने पहले जनवरी 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के नाते इस्लामाबाद में हुए सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने गए थे, तो दिल्ली से गई प्रेस टीम में मैं भी मौजूद था। करीब हफ्ते भर के पाकिस्तान दौरे के समय मेरे कई भ्रम टूटे थे। मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि पाकिस्तान का आवाम भारत के साथ न सिर्फ दोस्ताना संबंध रखने का इच्छुक है अलबत्ता ले-देकर कश्मीर समस्या को हमेशा के लिए हल करने का भी पक्षधर है। लेकिन पाकिस्तान की समस्या यह है कि थोड़ी-छोड़ी देर बाद लोकतंत्र खत्म हो जाता है और सैनिक शासन पाक के गले पड़ जाता है। उन दिनों मेरी वहां के पत्रकार हमीद मीर से लंबी बातचीत हुई थी,

वोल्कर रपट और मित्रोखिन दस्तावेज

देश में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के किस्से सामने आए, लेकिन राजनीतिज्ञों को सजा नहीं मिली। अगर सजा मिली तो सिर्फ इतनी कि जब बवाल खड़ा हुआ तो कुर्सी खिसक गई, इसके अलावा कुछ नहीं हुआ। मेरा मानना है कि वोल्कर तेल घोटाले के मामले में भी ऐसा ही होगा। वोल्कर तेल घोटाला कुछ-कुछ मित्रोखिन दस्तावेजों जैसा ही है। इतिहास बताता है कि सोवियत संघ किस तरह दुनिया भर में अपने राजनीतिक समर्थकों को घूस दिया करता था। मित्रोखिन दस्तावेजों में इन्हीं बातों का खुलासा किया गया था। मित्रोखिन दस्तावेजों के मुताबिक भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और कांग्रेस पार्टी के अलावा कुछ ऐसे बड़े नेता भी शामिल थे, जिन्हें सोवियत संघ से पैसा आता था।

भ्रष्टाचार और लोकतंत्र

राजनीतिक भ्रष्टाचार देश को कोढ़ की तरह खाए जा रहा है। कितनी ही बार राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ। कई सुखरामों, जयललिताओं, मायावतियों के शयन कक्षों और बाथरूमों मे नोटों की प्लास्टिक के बैगों में भरी गड्डियां मिल चुकीं। कई लालू यादवों, ओम प्रकाश चौटालाओं के आमदनी से ज्यादा जायदाद के सबूत मिल चुके। लेकिन कभी किसी बड़े राजनीतिज्ञ को सजा होते नहीं दिखी। सबसे पहले जब किसी नेता का कोई घोटाला सामने आता है तो उस नेता की पार्टी और नेता खुद आरोपों को बेबुनियाद, बेसिरपैर के, झूठे कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं।