July 2006

एटमी करार का मकसद?

परमाणु ऊर्जा के बिना भी देश चल रहा था। अमेरिका ने इंदिरा गांधी के जमाने में परमाणु परीक्षण के बाद तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को ईंधन की सप्लाई बंद करवा दी, तब भी देश चल रहा था। वाजपेयी ने इन प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए देश को पूरी तरह परमाणु संपन्न देश बनाने के लिए आखिरी परमाणु परीक्षण कर डाला। लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद परमाणु ऊर्जा की इतनी जरूरत क्यों आन पड़ी जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिना वैज्ञानिकों की सलाह लिए अमेरिका की ऐसी-ऐसी शर्तें मान लीं, जो नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी ने भी कभी नहीं मानी थी।

सरकार से खफा देश की तीन सर्वोच्च शक्तियां

आजादी के इतिहास में यह पहला मौका आया है जब देश की तीन सर्वोच्च शक्तियां मौजूदा परिस्थितियों से बेहद खफा हैं। राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम इस वजह से बेहद खफा बताए जाते हैं कि जब उन्होंने लाभ के पद संबंधी 36 सांसदों की छानबीन का काम चुनाव आयोग को भेज दिया था, तो न्याय प्रक्रिया में बाधा डालते हुए यूपीए सरकार ने सोनिया गांधी और सोमनाथ चटर्जी समेत उन 36 सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए कानून में फेरबदल करने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और बाकी जज भी इस बात के लिए खफा हैं कि अदालत जो भी अच्छा फैसला करती है उसे मौजूदा यूपीए सरकार या तो लागू नहीं करती या फैसले को नेस्तनाबूद करने के लिए कानून में संशोधन कर देती है।

ब्रेकिंग न्यूज

भारत का विजुअल मीडिया बार-बार इमेच्योर साबित होता है। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में सारी मर्यादाएं ताक पर रखी जा रही हैं और ऐसी खबरें प्रसारित की जा रही हैं, जो इतने बड़े पैमाने पर प्रसारित होने लायक ही नहीं होती। विजुअल मीडिया ने हाल ही में क्राइम न्यूज को बड़े पैमाने पर प्रसारित करना शुरू किया है, जिससे मुझे वह जमाना याद आता है, जब धर्मयुग, रविवार, दिनमान, सारिका छपा करती थी। उन्हीं दिनों में अपराध जगत की मनोहर कहानियां, सत्य कथाएं, सच्ची कहानियां आदि छपा करती थी। आज इन निजी चैनलों को देखकर मुझे उनमें से कोई भी धर्मयुग, रविवार या सारिका नहीं लगता।

वी पी सिंह की सचाई

वीपी सिंह से इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई रामबहादुर राय की किताब मार्केट में नहीं आई। मार्केट में आने से पहले ही किताब के परखचे उड़ गए। इसलिए किताब की भूमिका को उसके लेखक वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय प्रभाष जोशी ने जनसता में छाप दिया है, ताकि लोग कम से कम भूमिका तो पढ़ सकें। दो टुकड़ों में छपी इस भूमिका में मांडा के राजा वीपी सिंह को राजनीति में साधु के तौर पर परिभाषित किया गया है। हालांकि पूरी किताब किसी के पढ़ने में नहीं आई, क्योंकि वह मार्केट में आई ही नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में जहां-जहां छपी, उसे ही पढ़ पाए हैं।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट