गुटबाजी पर भारी पड़ रहे गड़करी

Publsihed: 08.Feb.2010, 09:52

नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनते ही भारतीय जनता पार्टी की धोती उतर गई। राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू, जना कृष्णामूर्ति सब धोती वाले अध्यक्ष थे। सूटेड-बूटेड अध्यक्ष नितिन गड़करी ने अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में बदली हुई भाजपा के दर्शन करवाए। प्रेस कांफ्रेंस के बाद परोसे गए दोपहर भोज में मांसाहारी व्यंजनों ने सबको चौंकाया। भाजपा दफ्तर में मांसाहारी सार्वजनिक भोजन का आयोजन पहली बार हुआ था। इससे पहले मांसाहारी भोजन के शौकीन वेंकैया नायडू साल में एक बार अपने घर पर ही दोपहर भोज का आयोजन करते थे। जनसंघ के जमाने से भाजपा दफ्तर शुध्द ब्राह्मणवादी छुआछूत के अंदाज से चल रहा था।

बंटाधार कर गए नारायणन

Publsihed: 01.Feb.2010, 05:41

चिदंबरम को आंतरिक सुरक्षा का नया ढांचा तैयार करना पड़ रहा है जिसमें आंतरिक सुरक्षा सलाहकार की भूमिका विदेशी मामलों तक सीमित कर दी जाएगी।

एमके नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटाए गए। या उन्होंने खुद हटाने की गुजारिश की थी। इस रहस्य को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के सिवा कोई नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि पी चिदंबरम के गृहमंत्री बनने के बाद वह असहज थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार के नाते उनका ओहदा राज्यमंत्री का था। राज्यपाल बनकर वह मुख्यमंत्री या केबिनेट मंत्री से भी ऊपर हो गए। नारायणन की तरक्की हुई है। इसलिए राजनीतिक, कूटनीतिक और नौकरशाही में अफवाहें थम नहीं रही।

अब फहराया जा सकेगा हुबली में राष्ट्रीय ध्वज

Publsihed: 18.Jan.2010, 05:41

श्रीनगर के लाल चौक में आतंकवादियों ने और हुबली के ईदगाह मैदान में अंजुमन-ए-इस्लाम नाम के स्थानीय संगठन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मुखालफत की थी। इस गणतंत्र दिवस से पहले सुप्रीम कोर्ट ने ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की सारी अड़चनें दूर कर दी हैं।

अगले हफ्ते गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील इंडिया गेट पर आयोजित शानदार समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगी। राष्ट्रीय ध्वज फहराना क्या कभी अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो सकता है? ऐसा सोचने पर भी रूह कांप उठती है। गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसी दो घटनाओं को याद करना बेहद जरूरी होगा। बीस साल पहले 1990 में आतंकवादियों ने लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से बाहर निकालने की सफलता के बाद श्रीनगर के लाल चौक में पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया था। उन्होंने चुनौती दी थी कि कोई भी पाकिस्तानी ध्वज को उतारकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराकर दिखाए।

बांग्लादेश से मधुर संबंधों का वक्त

Publsihed: 11.Jan.2010, 10:05

पाक और भारत की अदालतों और राजनीतिज्ञों की मानसिकता एक सी। भारत और आस्टे्रलिया में अपराध एक से। कोपेनहेगन की गलती का एहसास धीरे-धीरे।

मेरे नाम और उल्फा उग्रवादी अनूप चेतिया के नाम में बहुत फर्क है। फिर भी 1991 में जब मैंने गुवाहटी जाने के लिए रेल टिकट आरक्षित करवाया, तो आईबी के लोग अगले दिन मेरे घर पहुंच गए थे। उन्हें लगा कि अनूप चेतिया ही नाम बदलकर टे्रन पर सफर कर रहा होगा। अब जबकि बांग्लादेश की नई प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आई हैं तो उनकी सरकार के एक मंत्री अशरफ उल रहमान ने खुलासा किया है कि कट्टरपंथी खालिदा जिया की सरकार के समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ जब ढाका आए थे, तो उन्होंने शैरटन होटल में अनूप चेतिया से मुलाकात की थी।

लोकतंत्र खड़ा चौराहे पर

Publsihed: 04.Jan.2010, 10:00

एक आईपीएस अफसर पूरे तंत्र को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा था। स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना, सीबीआई, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका सबको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है एक आईपीएस अफसर ने।

हमारा प्रशासनिक राजनीतिक ढांचा चरमरा रहा है। प्रशासनिक सुधार आयोगों की रिपोटें असली मर्ज को पहचानने की कोशिश भी नहीं करतीं। राजनीतिक नेता और नौकरशाही का मकड़जाल देश के लोकतंत्र को घुन की तरह खा रहा है। नौकरशाह देश को चूसने वाले गिध्द बन गए हैं और राजनीतिक नेता उन पर नकेल कसने की बजाए छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए उनके हाथों का खिलौना बन गए हैं। कई मुख्यमंत्रियों को निजी बातचीत में यह कहते सुना है कि ब्यूरोक्रेसी से काम लेना आसान नहीं।

अपराधियों का किला भेद रहा मीडिया

Publsihed: 28.Dec.2009, 09:50

साल 2009 बीत रहा है। यह साल मीडिया के लिए भी कई खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरा है। साल की पहली तिमाही में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर मीडिया के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। तो बाद में जरनैल सिंह एक सिख पत्रकार के तौर पर नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाले जुझारू पत्रकार के रूप में मशहूर हुए। एक जमाना था जब मीडियाकर्मियों और मीडिया को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाला मिशनरी माना जाता था। स्वतंत्रा संग्राम के आंदोलन में मीडियाकर्मियों की भूमिका इसलिए ज्यादा अहम थी। बाजारीकरण ने पिछले एक दशक में मीडिया की जुझारू छवि को धूल धूसरित कर दिया था।

तीसरी पीढ़ी के कंधों पर भाजपा की बागडोर

Publsihed: 21.Dec.2009, 09:54

मुखर्जी-उपाध्याय, अटल-आडवाणी के बाद अब सुषमा-गड़करी

मोहन भागवत ने भाजपा के नए नेतृत्व के चयन की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंपकर पिछले चार साल से चली गुटबाजी को विराम देने की कोशिश की है। आडवाणी की ओर से चुने गए पार्टी के तीनों नए नेता सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली अब पिछले चार साल की गलतियां सुधारने में जुटेंगे।

मौसम परिवर्तन को लेकर कोपेनहेगन में दुनियाभर के नेता कोई सर्वमान्य हल निकालने की मशक्कत कर रहे थे, लेकिन वहां कोई हल नहीं निकला। जबकि भारत में ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टी में मौसम परिवर्तन हो गया।

लघु ही सुंदर है

Publsihed: 14.Dec.2009, 09:31

पीएमके प्रमुख रामदौस भी राज्यों के विभाजन की दौड़ में शामिल हो गए हैं। तेलंगाना की मांग के हिंसक रूप लेने पर केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के बंटवारे की बात सिध्दांतत: मंजूर कर ली। केंद्र का यह फैसला मक्खियों के छत्ते में हाथ मारने जैसा साबित हो रहा है क्योंकि लगभग हर राज्य में बंटवारे की मांग खड़ी हो गई है। पीएमके प्रमुख रामदौस ने दस साल पहले तमिलनाडु के विभाजन का आंदोलन शुरू किया था, लेकिन चारों तरफ से विरोध का सामना हुआ तो चुप्पी साध ली थी। अब देशभर में राज्यों के विभाजन की मांग उठने पर उन्होंने छोटे राज्यों के पक्ष में अंग्रेजी की एक कहावत का सहारा लेकर कहा है- 'स्माल इज ब्यूटीफुल।'

वैसे संविधान के मुताबिक किसी राज्य का विभाजन करने के लिए वहां की विधानसभा से प्रस्ताव पास होना जरूरी नहीं है। ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड बनाते समय सरकार ने विधानसभा के प्रस्तावों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया था।

उल्फा के बहाने बात मूल निवासियों के हक की

Publsihed: 07.Dec.2009, 09:40

पूर्वोत्तर के कई राज्य ब्रिटिश भारत के मानचित्र में भी नहीं थे। अलग भाषा और नस्ल के कारण पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन तो था ही, विकास के असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 19 दिसम्बर को भारत आ रही हैं। उनके भारत आने से ठीक पहले बांग्लादेश सीमा से लगते असम राज्य  के अलगाववादी संगठन उल्फा के बड़े नेता गिरफ्तार कर भारत के सुपुर्द किए गए हैं। असम में बाहरी लोगों के खिलाफ लड़ाई के दो पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। पहला आंदोलन आसू ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ शुरू किया था। आंदोलन मूल आबादी का राज्य पर राजनीतिक अधिकार बनाए रखने का था।